प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

भारतीय धार्मिक विविधता में एकता और उर्दू शायरी
- फरीद अहमद फरीद


धार्मिक विविधता भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषता है। अनेक कारणों से भारत में भिन्न-भिन्न धर्मों और अनुयायियों में विविधता व एकता पायी जाती है। भारतीय संस्कृति की धार्मिक विविधता व एकता को बनाये रखने में उर्दू शायरी का विशेष योगदान रहा है। उर्दू भाषा भारतीय सरकारी भाषाओं में से एक भाषा है, जो कि हिन्द आर्या भाषा है। भारतीय भाषा की एक मानकीकृत रूप है, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्द व अरबी-फ़ारसी के तत्भव शब्दों के साथ-साथ पंजाबी, बांग्ला, गुजराती, सिंधी आदि भाषाओं के अनेक शब्द सम्मलित हैं।
उर्दू ही एकमात्र ऐसी भाषा है, जिसने भारतीय संस्कृति की विविधता में एकता के वाक्य को अपनी शायरी के माध्यम से एक सूत्र में पिरोया है। उर्दू शायरी की कोई भी विधा ग़ज़ल, नज़्म, मसनवी, कसीदा, नात आदि में भारतीय संस्कृति, धार्मिक विविधता, एकता, परम्पराओं का सजीव चित्रण मिलता है।

उर्दू-खड़ी बोली के महान शायर अबुल हसन यमीनुद्दीन 'अमीर ख़ुसरो' (1253-1325 ई.) की शायरी में भारतीय संस्कृति, दर्शन, क्षेत्रीय बोली, रीति-रिवाज़ तथा परम्पराओं की छवि प्रदर्शित होती है। हिन्दू धर्म की मान्यताओं और परम्पराओं को अमीर खुसरो ने अपनी शायरी में विशेष स्थान दिया।


छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके
प्रेम भटी का मदवा पिलाइके

मतवारी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
गोरी गोरी बईयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ

बईयाँ पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
बल बल जाऊं मैं तोरे रंग रजवा

अपनी सी रंग दीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
खुसरो निजाम के बल बल जाए

मोहे सुहागन कीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके 1


उर्दू शायरी में 'परमेश्वर की आवाज़' कहे जाने वाले शायर मीर तकी 'मीर' (1723-1810 ई.) धार्मिक विविधता का सुन्दर प्रयोग करते हुए 'काबा' और 'सोमनाथ' मंदिर का चित्रण करते हैं-

उसके फ़रोगे-हुस्न से चमके है सबमें नूर
शमा-ए-हरम हो, या दीया सोमनाथ का 2


‘मीर’ ने हिन्दू धर्म के रीति-रिवाज़, संस्कार, संस्कृति को अपनी शायरी में उचित अर्थ के साथ प्रस्तुत किया हैं। अपने महबूब की वेश-भूषा का सजीव चित्रण करते हुए ‘मीर’ कहते है–

आये हैं मीर क़ाफ़िर हो कर ख़ुदा के घर में
पेशानी पर है क़श्क़ा* जुन्नार* है कमर में 3


(क़श्क़ा- हिन्दू धर्म में माथे पे लगाये जाने वाला तिलक
जुन्नार- हिन्दू धर्म में हाथ में पहने जाने वाला धागा)


उर्दू नज़्म के पितामह सय्यद वली मोहम्मद ‘नज़ीर अकबराबादी’ (1735-1830 ई.) जनवादी कवि के रूप में जाने जाते हैं। उनका काव्य जितना सरल है, उतना ही उनका स्वभाव भी सरल था। उन्होंने लगभग समस्त भारतीय सामाजिक व धार्मिक विविधता, आम जीवन, ऋतुओं, त्योहारों, फलों, सब्जियों आदि विषयों पर खूब  लिखा। भाषा के क्षेत्र में भी वे उदार हैं, उन्होंने अपनी शायरी में जन-संस्कृति का, जिसमें हिन्दू संस्कृति भी शामिल है, दिग्दर्शन कराया है और हिन्दी के शब्दों से परहेज़ नहीं किया। नज़ीर अकबराबादी अपनी शायरी के माध्यम से धर्म-निरपेक्षता वा आपसी सोहार्द को पेश करते हुए कहते हैं–


जिन मैल दिल से मिर्जा माधो का धो दिया
हिंदू, तुरक का भेद दिलो-जां से खो दिया

झगड़ा न करे मिल्लतो-मज़हब का कोई यां
आशिक तो कलंदर है, न हिंदू न मुसलमां 4


नज़ीर अकबराबादी इसी भाव में आगे कहते हैं-

जाता है हरम में कोई कुरआन बगल मार
कहता है कोई दैर में पोथी के समाचार
पहुँचा है कोई पार भटकता है कोई ख्वार
बैठा है कोई ऐश में फिरता है कोई जार
हर आन में, हर बात में, हर ढंग में पहचान
आशिक है तो दिलबर को हर इक रंग में पहचान 5


'नातिया क़सीदे' में मोहसिन काकोरवी (1837-1905 ई.) का सर्वश्रेष्ठ स्थान है। मोहसिन काकोरवी ने इस्लाम धर्म के जनक पैगम्बर मौहम्मद साहब के जन्म का चित्रण करते हुए क़सीदे लिखा है, जिसे पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि मोहम्मद साहब अरब के वासी न होकर भारत के जल थल, धरती में जन्मे हैं।

सिम्त-ए-काशी से चला जानिब-ए-मथुरा बादल
तैरता है कभी गंगा, कभी जमुना बादल
खबर उड़ती हुई आई है महाबन में अभी
कह चले आते हैं तीरथ को हवा पर बादल


क़सीदे में कहीं-कहीं ‘श्रीकृष्ण’ और ‘इंद्र देव’ का भी ज़िक्र सुनने को मिलता है। इसी क़सीदे का अगले भाग में वरण करते हैं-

सिम्त-ए-काशी से चला जानिब-ए-मथुरा बादल
ब्रज में आज श्री कृष्ण हैं काला बादल

खूब छाया है सरे गोकुल-ओ-मथुरा बादल
रंग में आज कन्हैया के है डूबा बादल

राजा इंद्र हैं पारी खाना-ए-मय का पानी
नगमा-ए-मय का श्रीकृष्ण कन्हैया बादल 6


उर्दू ग़ज़ल के सबसे चर्चित और प्रख्यात शायर मिर्जा असदउल्लाह खां 'ग़ालिब' (1797-1869 ई.) भारतीय संस्कृति की धार्मिक विविधता को जोड़ते हुए कहते हैं-

वफादारी, बर्दाश्त अस्तवारी असल इमां है
मरे बुत खाने में तो काबे में गाडूं बरहमन को 7


उर्दू 'मर्सिया' के महान शायर मीर बाबर अली 'अनीस' (1803-1874 ई.) ने इमाम हुसैन व उनके परिवार के लोगों का ऐसा चित्रण प्रस्तुत किया कि प्रतीत होता है कि ईमाम हुसैन का परिवार अरब घराने का न होकर शुद्ध भारतीय परिवार हो। उनकी वेश-भूषा, रहन-सहन और वार्तालाप में भारतीय संस्कृति नज़र आती है। इमाम हुसैन की पत्नी सहर बानो का चित्रण पूर्णरूप से भारतीय संस्कृति के अनुसार किया गया है। 'मांग में सिंदूर' और 'गोद भरी रहना' अरब संस्कृति नहीं, भारतीय संस्कृति है जिसको 'अनीस' ने अपने मर्सिया में प्रस्तुत किया है।

बानुवे नैक नाम की खेती हरी रहे
संदल से माँग, बच्चों से गोद भरी रहे 8


उर्दू के मशहूर व मारूफ शायर व सहाफी, भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलान के शीर्ष  सेनानी, भारतीय संविधान सभा के सदस्य, पूर्ण स्वराज तथा इन्कलाब ज़िन्दाबाद का नारा देने वाले आज़ादी के सच्चे सिपाही 'सैयद फ़ज़्लुल्हसन, ‘मौलाना हसरत मोहानी’(1875-1951 ई.) ने कृष्ण भक्ति को हिन्दुस्तान की सभ्यता की प्रतीक माना तथा दुनिया को सेकुलरिज़्म का पाठ पढ़ाया। हसरत मोहानी कृष्ण को प्रेम और मथुरा को प्रेमनगर का प्रतीक मानते हुए कहते हैं–

मथुरा कि नगर है आशिक़ी का
दम भर्ती है आरज़ू उसी का

हर ज़र्रा-ए-सरज़मीने गोकुल
दारा है जमाल ए दिलबरी का

बरसाना-ओ-नंदगाँव में भी
देख आए हैं जलवा हम किसी का

पैग़ामे-हयाते-जावेदा था
हर नग़मा कृष्ण बांसुरी का

वो नूरे-सियाह था कि हसरत
सरचश्मा फ़रोग़-ए-आगही का 9


'शायर-ऐ-मशरिक' कहे जाने वाले उर्दू के महान शायर और दार्शनिक डॉ. मोहम्मद इक़बाल (1877-1938 ई.) ने अपनी शायरी के माध्यम विभिन्न धर्मों, संप्रदायों को एक डोर में पिरोने का कार्य सफलतापूर्वक किया।

चिश्ती ने जिस ज़मीन में पैगाम-ए-हक़ सुनाया
नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया

तातारियों ने जिसको अपना वतन बनाया
जिसने हिज़ाजियों से दश्त-ऐ-अरब छुड़ाया
मेरा वतन वो ही है , मेरा वतन वो ही है  10


डॉ. मोहम्मद इक़बाल भारतीय संस्कृति और धार्मिक विविधता की दृष्टिगत भगवन राम को भारत के ही नहीं अपितु समस्त संसार के भगवान के रूप में प्रस्तुत करते हुए श्रद्धा भाव प्रकट करते हुए कहते हैं-

लबरेज़ है शराब-ए-हक़ीक़त से जाम-ए-हिन्द
सब फ़लसफ़ी हैं ख़ित्ता-ए-मग़रिब के राम-ए-हिन्द।

यह हिन्दीयों के फ़िक्र-ए-फ़लक रस का है असर
रिफ़अत में आसमां से भी ऊँचा है बाम-ए-हिन्द।

इस देस में हुए हैं हज़ारों मलक-ए-सरश्त
मशहूर जिनके दम से है दुनिया में नाम-ए-हिन्द। 11


उर्दू के प्रमुख पूर्वाधुनिक शायर सय्यद काजिम अली  'जमील मज़हारी' (1904-1979 ई.) भारतीय संस्कृति अनुसार भारत भूमि को माँ मानते हुए अपनी श्रद्धा अर्पित करते हुए कहते हैं-

ओ माता ओ भारत माता
तुझ पे ख़ुदा की रहमत माता

सुन्दर तू हरयाली तू है
धानी अंचल वाली तू है

जग देता है तुझको दुआएँ
हम तेरा गन किस तरह न गाएँ" 12


पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध कवि व शायर मोहम्मद शफी खां 'बेकल उत्साही' (1928-2016 ई.) धार्मिक विविधता बनाये रखने हेतु अपने आपको कृष्ण भक्त रसखान बनने की अभिलाषा रखते हैं-

माँ मेरे गूंगे शब्दों को
गीतों का अरमान बना दे
गीत मेरा बन जाये कन्हाई
फिर मुझको रसखान बना दे 13


'उर्दू शायरी में गीतांजलि' तथा ‘भगवद्गीता’ के अनुवादक, यश भारती से सम्मानित मशहूर शायर अनवार अहमद ‘अनवर जलालपुरी’ (1947-2018 ई.) की हमेशा यही कोशिश रहती थी कि हमारी इस गंगा-जमुनी तहज़ीब को किसी की नज़र न लगे और आपसी भाईचारे का जज़्बा परवान चढ़े। आपसी प्रेम तथा हम की भावना से प्रेरित अनवर जलालपुरी कहते हैं–

हम काशी काबा के राही, हम क्या जाने झगड़ा बाबा
अपने दिल में सबकी उल्फत, अपना सबसे रिश्ता बाबा

हर इंसां में नूर-ए-ख़ुदा है, सारी किताबों में लिखा है
वेद हो या इंजीले-मोक़द्दस, हो कुरान कि गीता बाबा 14








सन्दर्भ-सूची:
1. मासिक उर्दू दुनिया, दिल्ली, जुलाई 2014, शाइस्ता फाखरी, पृष्ठ- 16
2.
http://www.hamzabaan.in/2013/11/blog-post_9.html?m=1
3. https://www.rekhta.org/ghazals/aae-hain-miir-kaafir-ho-kar-khudaa-ke-ghar-men-mir-taqi-mir-ghazals?lang=hi
4. गुलजारे नज़ी- सलीम जफर, पृष्ठ- 151
5.
http://bharatdiscovery.org/नजीर _अकबराबादी
6. फरोग-ऐ-उर्दू, लखनऊ, जून-अप्रैल 1970, पृष्ठ- 22
7. डॉ. खालिद मुबशशिर असिस्टेंट प्रोफैसर जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्विद्यालय दिल्ली का लेख 'उर्दू और कौमी यकजहती'
8.
https://rekhta.org/couplets/vafaa-daarii-ba-shart-e-ustuvaarii-asl-iimaan-hai-mirza-ghalib-couplets?lang=Hi
9. कुल्लियाते इक़बाल (इंतेख़ाब) मकतबा अल-हसनात ,दिल्ली 2002 पृष्ठ- 28
10. कुल्लियाते इक़बाल (इंतेख़ाब) मकतबा अल-हसनात ,दिल्ली 2002 पृष्ठ- 59
11. मासिक उर्दू दुनिया, दिल्ली, जुलाई 2014, शादाब आलम, पृष्ठ- 20
12. मासिक उर्दू दुनिया, दिल्ली, जुलाई 2014, शादाब आलम, पृष्ठ- 17
13.
http://kavitakosh.org/kk/फिर_मुझको_रसखान_बना_दे_/_बेकल_उत्साही
14. http://thewirehindi.com/30520/remembering-renowned-urdu-poet-anwar-jalalpuri/


- फ़रीद अहमद फ़रीद
 
रचनाकार परिचय
फ़रीद अहमद फ़रीद

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