प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2018
अंक -39

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

मुद्राराक्षस के उपन्यासों में स्त्री और दलित विमर्श
- आनन्द दास



समकालीन साहित्य की असाधारण प्रतिभा मुद्राराक्षस साहित्य की सभी विधाओं में शिखर की उपलब्धियों के लिए विख्यात हैं। वे हमेशा दबे-कुचले, अभावग्रस्त, शोषित-पीड़ित, अधिकारहीन व्यक्तियों के पक्ष में खड़े हुए दिखाई पड़ते हैं। मुद्राराक्षस का जन्म स्वर्णकार परिवार में 21 जून सन् 1933 ई. को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से बीस किलोमीटर दूर बेहटा ग्राम में हुआ था। ग्रामीण परिवेश और वहाँ की स्वच्छंद प्राकृतिक सुषमा का प्रभाव मुद्राराक्षस के बाल्य जीवन पर पड़ा जिसके परिणामस्वरूप इनके व्यक्तित्व में ग्रामीण जीवन के प्रति गहरी आस्था और स्वच्छंद प्रकृति के प्रति प्रेम प्रभूत मात्रा में दिखाई पड़ता है। इनके घर में सोने-चाँदी का काम होता था लेकिन फिर भी परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। मुद्रा जी का परिवार गरीब जरूर था लेकिन घर में खाने-पीने की कभी कोई कमी नहीं थी लेकिन फिर भी वर्तमान समय की भाँति न तब उतने संसाधन मौजूद थे और न ही आज की तरह उपभोक्तावादी समाज था। घर, गृहस्थी और कामकाज के दबाव में तब बच्चों को उतना दुलार नहीं मिल पाता था। पर्याप्त स्नेह और दुलार न मिल पाने के बावजूद भी मुद्राराक्षस के व्यक्तित्व निर्माण में माता-पिता द्वारा दिए गए संस्कारों का योगदान है। लोक संस्कृति के प्रति प्रेम और साहित्यिक संस्कार इन्हें विरासत में, तथा स्वभाव का खरापन और स्पष्टवादिता का गुण अपनी माता से मिला। साहित्यिक संस्कार और स्पष्टवादिता के मिश्रण से इनका व्यक्तित्व इस प्रकार बना कि ये आज भी साहित्य जगत में अपनी धाक जमा ले जाते हैं। बस परिवार का इतना सा ही स्नेह पाकर इनके पूरे व्यक्तित्व का निर्माण हुआ है।

भारत के परिवर्तित सामाजिक परिदृश्य में समाज को लेकर विभिन्न विचार प्रस्तुत किए जाते हैं और उनका सीधा सम्बन्ध भारतीय सामाजिक व्यवस्था से होता है। वर्तमान भौतिकवादी युग में समाज निरंतर परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजर रहा है। समाज की संरचना बहुत जटिल और परिवर्तनशील है इसीलिए प्रतिदिन नए समूह बनते बिगड़ते रहते हैं। साहित्य को समाज सापेक्ष माना जाता है इसीलिए समाज में घटने वाली घटनाओं पर साहित्यकार की दृष्टि अवश्य पड़ जाती है वह चाहे जिस रूप में हो। समाज से ही प्रभाव ग्रहण करके रचनाकार अपने अमूर्त विचारों को मूर्त रूप देता है। रचनाकार द्वारा समाज व्यवस्था पर डाली गयी सजगतापूर्ण दृष्टि उसकी सामाजिक संवेदना के विभिन्न स्तरों को निरूपित करती है। असमानता और उत्पीड़न पर आधारित सामाजिक संचनाओं के उद्भव और विकास के इतिहास की तरह ही स्त्रियों के उत्पीड़न और दासता का इतिहास भी उतना ही पुराना है। आज साहित्य में कमजोर वर्गों यथा नारी या दलित वर्गों के प्रति जो संवेदना मिलती है वह प्रशंसनीय है। आज की स्त्री अपने अस्तित्व की पहचान कर रही है तथा अपनी स्वतंत्रता के प्रति अधिक सजग हुई है। समाज के प्रचलित मान्यताओं से टकराती आज की स्त्री का मुक्ति संघर्ष घर-परिवार से शुरू होता है। समाज की मुख्यधारा में प्रवेश करने के दौरान ही स्त्री अपनी सृजनात्मकता की पहचान करती है तथा वैचारिक, राजनीतिक, आर्थिक आदि क्षेत्रों में वह अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। स्त्रियों की मुक्ति को लेकर लेखिकाओं ने तो बिगुल बजाया ही है लेखक भी पीछे नहीं है। स्त्री मुक्ति को लेकर साहित्यकारों का वैचारिक सरोकार बहुत विस्तृत है। स्त्रियाँ समाज में अपनी निज की पहचान को कायम करने के लिए उत्साहित हैं क्यों कि- "स्त्री की स्वतंत्रता का प्रश्न सभी उत्पीड़ितों की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है। स्त्री जहाँ भी जिस वर्ग का हिस्सा है, वहाँ पर पुरूषों द्वारा भेदभाव और उत्पीड़न की शिकार होती है। यही नहीं यदि वह मौजूदा राजसत्ता का हिस्सा भी बन जाती है तो भी वह उस पुरूष वर्चस्ववादी मानसिकता को चुनौती देने की स्थिति में नहीं होती।"1 स्त्रियों की ऐसी स्थिति और संघर्ष को मुद्राराक्षस अपने कथा-साहित्य में अत्यन्त संवेदनात्मक तरीके से प्रस्तुत करते हैं।

नारी संवेदना का कारूणिक और अत्यन्त संवेदनशील दृश्य विधान मुद्राराक्षस ने अपने उपन्यास ‘भगोड़ा’ में किया है। मंगल बहोरी की हत्या हो जाने के बाद उसके शवदाह के अवसर पर उसकी पत्नी मंगली को गाँव के लोगों द्वारा सती हो जाने के लिए बाध्य करने में एक कारूणिक प्रसंग उभरकर सामने आता है। उपन्यास में चित्रित गांव की परम्परा के अनुसार उस प्रत्येक स्त्री को सती होना पड़ता था जिसका पति उसके जीवित रहते ही मृत हो जाय। ऐसा ही कारूणिक अवसर मंगली के जीवन में आता है जब उसके पति मंगल बहोरी की हत्या हो चुकी है उसकी लाश के साथ ही मंगली को भी सती होने के लिए बाध्य किया जाता है। मंगली के मना करने पर उसे जबरदस्ती चिता पर धकेल दिया जाता है। ऐसे दृश्य के प्रति कथाकार की संवेदना बहुत ही कारूणिक है- "हालांकि वहाँ धुंआ काफी था, लपटों में जलता एक शरीर तड़पकर नीचे कूद रहा है। उस शरीर ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए हुए थे।...कूदता हुआ वह शरीर चिता की किसी लकड़ी पर फिसला और गिरा। दो आदमियों ने फुर्ती के साथ बांसों की मदद से उस जलती हुई आकृति को दुबारा चिता पर धकेल दिया।"2
‘हम सब मंसाराम’ उपन्यास में मंसाराम और उसकी बूढ़ी माँ के प्रसंग में माता-पिता और संतान विषयक संवेदना अभिव्यक्त हुई है। मंसाराम चैलपुर के चुनावी रंग में स्वयं को व्यस्त रखना चाहता है लेकिन उसी समय उसकी बूढ़ी माँ की तबियत खराब हो जाती है। मंसाराम तेज बुखार से कराहती उसकी बूढ़ी माँ सहसा चुप हो गयी। बूढ़ी माँ के सहसा चुप हो जाने पर मंसाराम की पत्नी उससे कहती है कि माँ को जूड़ी बुखार है। इस बात को सुनकर वह पुनः कहता है- "अरे हकीम साहब तो धतूरा दे देंगे। मैं जो काम कर रहा हूँ उसे भाड़ में झोंक दूँ और अब काढ़ा-जुशान्दा बीनता फिरूँ। यही न ! यही काम रह गया है करने को?"3 और गुस्से की सीमा में ही पत्नी से इस तरह की छोटी-मोटी शिकायतों को उससे न कहने की हिदायत भी दे डाली। इस उपन्यास के विभिन्न प्रसंगों में माता-पिता और वृद्ध जीवन के प्रति संवेदनाएँ अभिव्यक्त हुई हैं। ‘शांतिभंग’ उपन्यास के ‘नशबन्दी शिविर में, मुरारीलाल खरे और कचैड़ी वाले की पत्नी के प्रसंग में, हरीराम वैद्य की पत्नी और पुत्रियों रत्तों और बत्तों के प्रसंग में, सदानंद शर्मा और त्रिलोचन पाण्डे के वार्तालाप में तथा बिम्मो महराजिन और मुहल्ले की स्त्रियों के आपसी बातचीत में स्त्री संवेदना के विभिन्न स्तर खुलकर सामने आते हैं। इसके अतिरिक्त ‘अचला एक मनःस्थिति’, ‘शोक संवाद’, व्यंग्यात्मक उपन्यास, ‘प्रपंचतंत्र’, ‘एक और प्रपंचतंत्र’ तथा ‘नारकीय’, ‘अर्द्धवृत्त’ और ‘मेरा नाम तेरा नाम’ उपन्यास में नारी संवेदना की अभिव्यक्ति हुई है।


सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा धार्मिक सभी क्षेत्रों में दलित समाज ऊँच नीच के भेदभाव का शिकार होता रहा है। उसने अपने जीवन में भयानक त्रासदी का दंश झेला है। हजारों-हजारों वर्षों की दासता और संताप को मूक होकर झेला है। आर्थिक क्षेत्र में दलित वर्ग सवर्णों की क्रूर व्यवस्था का शिकार होता रहा है। सवर्णों की क्रूर व्यवस्था में पिसते हुए दलित समाज ने अपनी आवाज को बुलंद किया है जिसके परिणामस्वरूप उनकी दशा में कुछ गुणात्मक सुधार हुए हैं। साहित्य की लगभग सभी विधाओं में दलित लेखन हो रहा है। मुद्राराक्षस के कथा-साहित्य में दलितों के प्रति जो संवेदनाएँ प्राप्त होती हैं उनमें ये पूरी प्रामाणिकता देने का प्रयास करते हैं। दलित प्रश्नों की मुखरता एवं चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में मुद्राराक्षस का नाम सुपरिचित ही नहीं बल्कि प्रख्यात भी है। इन्होंने दलित प्रश्नों के प्रति पूरी जिम्मेदारी से लिखने और कहने का काम बहुत ही बेबाक ढंग से किया है।मुद्राराक्षस के दो उपन्यासों ‘हम सब मंसाराम’ और ‘दंड विधान’ को दृष्टिपथ में रखते हुए इनकी दलित संवेदना को देखा जा सकता है। इन दोनों उपन्यासों में मुद्राराक्षस की गहन संवेदनात्मक दृष्टि दिखायी पड़ती है। दलित विमर्श के विषय में ये वर्ण या जाति को दोषी मानते हैं। ‘हम सब मंसाराम’ उपन्यास में इन्होंने शोषित मनुष्य का जीवंत चित्र खींचा है। इनका शोषित मनुष्य समाज में कुत्ते से भी बदतर जीवन जीने के लिए विवश है अपनी इसी विवशता के कारण वह दिनों-दिन खंूखार होता चला जाता है। ऐसे ही मनुष्य की प्रतिक्रिया को मुद्राराक्षस ने बड़ी शिद्दत के साथ प्रस्तुत किया है- "कुत्ता तो पैदायशी कुत्ता होता है। उसे खूंखार होना ही होता है। लेकिन कभी जब आदमी उन हालात में जीने लगता है जिनमें वह आदमी और कुत्ता, दोनों से ही अपने को नीचे खड़ा पाए तो वह दूना खूंखार हो जाए, इस बात के पूरे इम्कानात होते हैं।"4 ऐसे ही समाज जिसमें सत्ता और सामंतों के आपसी गठजोड़ ने सामान्य मनुष्य को कुत्ते से भी बदतर जिन्दगी जीने के लिए विवश किया हो उसके सही तस्वीर को मुद्राराक्षस प्रस्तुत उपन्यास में दिखाते हैं। सामंतों के शोषण और अत्याचार का शिकार दलित समाज उनके द्वारा बनायी गयी अमानुषिक व्यवस्था द्वारा कुचला जाता है। इस अमानवीय व्यवस्था को हटाने के लिए विद्रोह आवश्यक था लेकिन इस आवश्यक कार्य को वह कर नहीं सका क्योंकि पिटना ही उनकी नियति बन गयी। मंसाराम जाति का हरिजन है। चैलपुर गांव के एक छोर पर उसकी झोपड़ी है जिसके आस-पास उसकी ही विरादरी के छेदी और पाँचू चैधरी भी रहते हैं। इनका व्यवसाय और काम दोनों ही मरे हुए जानवरों की खाल और अतंड़ियों को निकालकर बेचना है। चुनाव के प्रति तीव्र लालसा मंसाराम के मन में घर करती गयी उसे देखकर पाँचू चैधरी और  छेदी भी राजनीति के तिकड़म में स्वयं व्यस्त रहने की कोशिश करने लगे थे। दलित समाज के प्रति लेखक की संवेदना को छेदी के प्रसंग में देखा जा सकता है-"छेदी भाग नहीं पाया। भागने का उसे अभ्यास नहीं था। जिस जाति से वह संबंधित था उसके सभी लोगों की यह नियति थी। अगर गुस्से से कोई उन्हें पीटे तो पिटना होता था चुपचाप ही पिट लेना होता था।"5 ठाकुर गजराज सिंह के यहाँ से एक जोड़ा सफेद पुराना कुर्ता-पायजामा पाकर मंसाराम उस सवर्णवादी मानसिकता को धारण करता है जिससे वह भद्रजनोचित आदर और सम्मान को प्राप्त कर सके। मंसाराम को सफेदपोश देखकर उसके गाँव के लोग उसे आदर-सम्मान देने के बजाय मंसवा, नेतवा या साले मंसवा के नाम से पुकारते रहे। राजनीति के प्रति मंसाराम ही उत्कट अभिलाषा और जागरूकता को मुद्राराक्षस ने बड़ी संजीदगी के साथ प्रस्तुत किया है-"यह मंसाराम है साहब..............चैलपुर में रहता है। हरिजन है मगर बड़ा जागरूक है। हमेशा आपका ही समर्थन करता है। अच्छा कार्यकर्ता है।"6 इस बात को कहते हुए गजराज सिंह का सहायक मंसाराम के कई बार पिट जाने का भी जिक्र करता है। मंसाराम के पिटने का सबसे बड़ा कारण राजनीति के तिकड़म को पूरी तरह से न समझ पाना है। दलित मंसाराम के प्रति लेखक की संवेदना सहायक के कथन में दिखाई पड़ती है- "यह भोला-भाला, गंवार आदमी है। हर बार कुछ ऊटपटांग हरकत कर बैठता है। राजनीति का सिरे से पता नहीं रहता इसे। आपकी मीटिंग में गलत नारे लगा देता है।"7 मुसहर और अन्य अन्त्यज जातियों के आवास, रहन-सहन, वस्त्र और भोजन का वर्णन मुद्राराक्षस अपने उपन्यास ‘दण्डविधान’ में करते हैं। खेतों में चूहों के शिकार करते समय चूहों के बिल से एकत्र किए हुए अन्न को भी वह अपना नहीं मान सकता है। प्रताड़ना, तिरस्कार और लांक्षन सहने की जिसकी नियति हो गयी  हो वह व्यक्ति यदि बदल जाय या जबरदस्ती उसे बदलने का प्रयास किया जाए तो जिस व्यक्ति को बलात् बदला जाएगा, उसका प्रतिक्रियावादी होना स्वाभाविक है। मुद्राराक्षस ‘दण्डविधान’ नामक उपन्यास में बाबा जीवनदास और मास्टर भूरेलाल जैसे सजग नेतृत्व का विकास करते हैं जो दलितों को उनकी जड़ता तोड़ने और अन्याय के विरूद्ध संघर्ष के लिए कटिबद्ध करते हैं। और साथ ही भद्रा गाँव के आसपास के पासी, चमार, मुसहर, कंजर, कोरी, धोबी और मल्लाहों के जनसमूह को जनयुद्ध के लिए ललकारते हैं। मुद्राराक्षस के इन दोनों उपन्यासों में दलितों के प्रति गहरी संवेदना की अभिव्यक्ति हुई है। अत: साहित्य सृजन में समाज की प्रेरक भूमिका रही है। साहित्य हमेशा समाज को प्रेरित और प्रमाणित करता रहा है। साहित्य को समाज का प्रतिबिम्ब माना जाता है इसीलिए उसके अध्ययन से मनुष्यों की भावनाओं के रूप, विचारों की गति और जीवन की दशाओं का बोध होता है। साहित्य का मुख्य कार्य है भावों को मूर्त रूप में व्यक्त करना। यदि किसी कृति में महत्त्वपूर्ण भावों की जितनी बेहतर अभिव्यक्ति होगी, साहित्य में उसका स्थान उतना ही ऊँचा होगा। अर्थात् साहित्य में तत्कालीन समय की सभी परिस्थितियों और उनका प्रभाव दिखाई पड़ता है।




 
सन्दर्भ-सूची:
1. युद्धरत आम आदमी, संपादक- रमणिका गुप्ता, जनवरी-मार्च, 2004 पृ.सं.- 4
2. भगोड़ा, पृ.सं.- 35
3. हम सब मंसाराम, पृ.सं.-27
4. हम सब मंसाराम, पृ.सं.-10
5. हम सब मंसाराम, पृ.सं.- 51
6. हम सब मंसाराम, पृ.सं.- 124
7. हम सब मंसाराम, पृ.सं.-124-125


- आनन्द दास
 
रचनाकार परिचय
आनन्द दास

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