प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए

साथ अपनों का


अपने हॉस्पिटल में काउंसलर के रूप में काम करते हुए मुझे कई साल हो गए थे। काफी देर तक बैठकर मरीज देखने के बाद जब थकने लगी तो सोचा एक चक्कर कॉरिडोर का लगाकर आऊँ। बस यही सोचकर चेम्बर से बाहर निकल आई। तभी आई.सी.यू. के बाहर एक मरीज की परिचिता को तेजी से अंदर प्रविष्ट होते हुए देखा, जिसके हाथ में छः से आठ माह का बच्चा था और उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ती हुई दिखाई दीं। मेरे दो-तीन बार के उधर से गुज़रने में ही मैंने उसको बदहवास हाल में तीन-चार चक्कर सीढ़ियों से ऊपर नीचे लगाते हुए देख लिया था। वह हाथों में दवाइयों का बैग पकड़े ड्यूटी पर उपस्थित नर्सिंग स्टाफ से बात करती हुई नज़र आई और तभी डॉक्टर को सामने पाकर उनसे आग्रह करने लगी-
"डॉक्टर प्लीज! कुछ भी करिये इनको बचा लीजिये। प्लीज बचा लीजिये।"
कहते-कहते उसकी रुलाई भी फूट पड़ी। उसको इस हाल में देख मेरा मन पसीज गया। तेजी से उसके पास पहुँचकर उसको सब ठीक हो जाने का दिलासा देकर अपने चैम्बर में साथ लेकर आ गई।


"क्या नाम है तुम्हारा?" मैंने पूछा।
"जी, कनिका। चार दिन पहले मेरे पति का मोटर साईकल पर एक्सीडेंट हो गया। जैसे-तैसे लोगों ने मोबाइल से मुझे सूचित किया और मेरे पहुँचने पर हॉस्पिटल शिफ्ट करवाने में मदद की। मेरे पति निखिल आई.सी.यू.में हैं। अब डॉक्टरों का कहना है कि वो सीरियस हैं। कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूँ!"
बातचीत के दौरान बच्चे के लगातार रोने से वह और भी झुंझला रही थी। शायद नन्ही-सी जान भूख से बेहाल था। उसको पानी पिलाकर मैंने उसे बच्चे को तसल्ली से दूध पिलाने को कहा और साथ ही साथ पूछा- "अकेले ही रहते हो इस शहर में? निखिल या तुम्हारे परिवार के कोई सदस्य नहीं रहते साथ में?"
मेरे प्रश्न पूछते ही सुबकने लगी थी वो और सुबकते-सुबकते ही बोली-
"मैम! मैं ही माँ-पापा को कहा करती थी मुझे ऐसे परिवार में शादी नहीं करनी, जहाँ सास-ससुर की ज़िम्मेवारी हो। मुझे किसी की भी रोक-टोक नहीं चाहिए थी। सो बहुत मुश्किल से यह रिश्ता मिला था पापा को, जिसमें लड़के के माँ-पापा साथ न रहते हो। मेरे पति निखिल की एक बहन भी है इसी शहर में। मेरी बेवकूफियों की वजह से मैंने उससे भी संपर्क नहीं रखा और आज इस मुसीबत के समय में अकेले दौड़ना मेरा अपना ही चयन है। परिवार के दूसरे सदस्य मेरे लिए बंधन थे, तभी आज के ये कष्ट भी अकेले मेरे ही है। मेरे परिवार में माँ की तबियत काफी खराब है। वो हॉस्पिटल में है सो उनको बताने का कोई मतलब नही था।"


"सूचित किया तुमने निखिल की बहन को या माँ-पापा को?"
"जी नहीं, हड़बड़ाहट में अपनी ही सुध खो बैठी हूँ। समझ ही नहीं आ रहा किसको क्या बोलूँ, क्या कहूँ! कुछ भी बोलने या कहने से पहले बहुत सारे प्रश्नों के उत्तर मुझे ख़ुद को और बाकी लोगों को भी तो देने होंगे।"

अक्सर ही अपनी संकीर्ण सोच की वजह से हम दूर तक की बातों को सोच ही नहीं पाते। जिनको हम बंधन मानते हैं वो सिर्फ हमारी सोच के दायरों में गाँठ बनकर हमारे सोचने के रास्तों को अवरुद्ध कर देते हैं, जिनका पछतावा किसी विपत्ति के समय या ज़रूरत के समय होता है। जो परिवार की महत्ता को नकारते हैं, ऐसी सोच के लोग अच्छे मित्र बनाने में भी उतने सफल नहीं होते, जितने कि रिश्तों की महत्ता समझने वाले लोग होते हैं।


"ठीक कह रही हो तुम कनिका। प्रश्नों के उत्तर तो देने होंगे ही। पर सच कहूँ, तुम दिल की उतनी ख़राब नही हो, बस थोड़ी नादान हो। चाहो तो अभी फ़ोन करके निखिल के माँ-पापा और बहन को सूचित करो क्योंकि निखिल भी किसी का बेटा और भाई है, उनको इस एक्सीडेंट की ख़बर मिलनी ही चाहिए।"
मेरी बात को सुन, बग़ैर कुछ अतिरिक्त सोचे उसने फ़ोन कर सबको सूचित किया और आने का आग्रह भी किया। इन विपरीत परिस्थितियों में शायद उसकी ना-समझ से दंभ को सिर्फ मेरे कहने के सहारे की ज़रूरत थी, जिसको तोड़ने के लिए बहुत जल्दी ही उसने स्वयं को स्वीकृति दे, सबसे संपर्क साधने के मानस बना लिया था।


तभी नर्स ने आकर निखिल के होश में आने की सूचना दी। हम दोनों ही आई.सी.यू.की तरफ दौड़ पड़े। निखिल के आँखें खोलते ही एक उम्मीद की किरण हम दोनों की ही आँखों में नज़र आई। कनिका ने बच्चे को भी दूध पिला दिया था सो वो भी शांत निश्चिंत उसके कांधे पर सिर रख गहरी नींद में सो रहा था। चूंकि निखिल से बात करना और आई.सी.यू. में ज़्यादा देर ठहरना संभव नहीं था और कनिका की आँखों में कुछ सुकून देख मैंने उसे चाय पीने के लिए अपने चेम्बर में बुला लिया।
उसको थोड़ा-सा शांत देखकर 'सब धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा' की सांत्वना देकर मैंने उसे विदा किया और हॉस्पिटल की भाग-दौड़ में ख़ुद का और बच्चे का भी ख़याल रखने की सलाह दे, मैं वापस अपने मरीज़ देखने में मशगूल हो गई पर जब भी बीच में समय मिलता एक सोच मुझे बराबर बहुत कुछ सोचने पर मज़बूर करती रही।

परिवार जीवन की अहम इकाई होते हुए भी आज क्यों उपेक्षित हो रहा है? क्या छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए इसके महत्व को कम करना विवेकपूर्ण है या इसकी महत्ता को महसूस करने के लिए किसी हादसे को घटित होना चाहिए? सोचकर देखिये तो! यही सोचनीय था कल भी, आज भी और हमेशा ही रहेगा।
यही ख़याल बराबर मेरे दिमाग़ पर जाने कब तक चोट करता रहा।


- प्रगति गुप्ता
 
रचनाकार परिचय
प्रगति गुप्ता

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