प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2018
अंक -39

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

नई डिज़ाइन

अरे जुमन मियाँ, जूती बेचना बन्द कर दिया क्या? आज यहाँ कैसे बैठे हो?
दस साल हो गए जोधपुर में रहते रहते। जोधपुर में मिलने वाली चमड़े की जूतियों ने ऐसा मन मोह लिया कि मैं और घरवाली दोनों बस यही पहनते हैं। जुमन मियाँ भले ही थोड़े पैसे ज़्यादा ले लें, पर जूती सब से टिकाऊ इनकी ही होती है। सस्ते के चक्कर में एक-दो बार दूसरी जगह से जूती ली थी मगर वो इनसे आधे समय भी चल नहीं पायी। आज किसी काम से इधर आना हुआ तो जुमन मियाँ को दूसरी दुकान पे देखकर दुआ-सलाम कर लिया।


"अरे साब इस उम्र में दूसरा कोई काम कर नहीं सकता और जूते बेचकर ही घर चलाता हूँ।"
सत्तर बसंत पार कर चुके जुमन मियाँ कांपती आवाज़ में बोले।
तुरंत उठकर अपनी दुकान की तरफ चल पड़े। मैं भी पीछे-पीछे चल दिया। दुकान के द्वार पर पहुँचते ही बोले- "आओ साब बैठो, देखो आज क्या लोगे? बड़गाँव की जूती, पीपाड़ की जूती, जोधपुरी जुती, बाड़मेरी जूती, भीनमाल की जूती, फलोदी की जूती, जालोर की जूती, फॉरेन की जूती, छपाट जुटी, बच्चों के लिए बचकानी जूती, राजपूती जूती, अपनी पत्नी के लिए पाकीजा जूती, पंजाबी जूती, मारवाड़ी जूती, नोंकदार जूती, मोजड़ी या बिंदोली?"


"अरे मियाँ लेना कुछ नहीं हैं, इधर से गुज़र रहा था तो सोचा दुआ-सलाम कर लूँ।" वाकई लेना कुछ नहीं था तो मैं टालते हुए बोला।
अच्छा रुको, इतना कहकर वो अंदर के कोटरे में गए और हाथ में एक चमचमाता जूतियों का जोड़ा लेकर लौटे और बोले- "इस उम्र में ज़्यादा काम होता नहीं है साब, फिर भी दो दिन पहले पूरी रात बैठ के ये नया डिजाइन तैयार किया, अपनी लुगाई के लिए ले जाओ, उनको बहुत पसंद आएगा, वो ख़ुश न हो जाएँ तो कहना।"


डिजाइन वाकई आकर्षक था, भले ही घरवाली को जूते दिलवाये अभी तीन महीने ही हुए थे पर ये वाली जूतियाँ अद्भुत थीं। खोली की सिलाई अंदर की तरफ न होकर के बाहर की तरफ थीं और बाहर उसको ज़्यादा बढ़ाकर उबड़-खाबड़ झलरी बनाई हुई थी। कसीदे के धागे भी महीन और रंग बिरंगे थे। सोचा ले ही लूँ पर फिर लगा ये फिजूल खर्च होगा, अभी तीन महीने पहले ही तो जूतियाँ ली हैं। मैंने पैसों का बहाना बनाया तो जुमान मियाँ बोले- "अरे साब आप तो ले जाओ बस, पसंद आये तो जब आओ तब पैसे दे देना और न आये तो जूतियाँ लेते आना। वैसे भी नया साल आ रहा है, कुछ तो नया दो घरवाली को"।
मैं अब टालने की हालत मैं नहीं था तो भारी मन से ले ही ली।


घरवाली तो जूतियाँ देखकर झूमने लग गयी। जूतियाँ वापस देने का तो सवाल ही नहीं रहा। चार दिन बाद वापस गया जुमन मियाँ के पास और कहा- "मियाँ कितने पैसे हुए?" "साब, डिजाइन नई थी, कीमत तो पहले वाली ही है अब तक।"
मैंने चुपचाप छः सौ रूपये दे दिए। बाहर निकलते हुए एक सवाल कर लिया जुमन मियाँ से।
"मियाँ आप हर बार घरवाली को पसंद आये ऐसे जूते ही बनाते हो, कभी हमारी पसंद भी परख लिया करो।"
"साब, आप तो यहीं आ जाते हो, ज़रूरत पड़ने पर भी बड़ी मुश्किल से लेते हो, फटी जूती की मरहम पट्टी करके दो-तीन महीने निकाल लेते हो, पर घरवाली के लिए जब जूतियाँ दूँ तो मैं ये मान लेता हूँ कि अब पैसे ही आएँगे, जूतियाँ वापस नहीं आएँगी।"
मेरा मुँह खुला का खुला रह गया, तभी जुमन मियाँ बाहर निकले तो मैंने अंदर के कोटरे में झाँक कर देखा, वहाँ उसी 'नई डिजाइन' की बहुत-सी जूतियाँ पड़ी थीं।


- कल्याण के विश्नोई
 
रचनाकार परिचय
कल्याण के विश्नोई

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कथा-कुसुम (2)