प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

अब और क्या माँगें

हमारी प्रीति के अक्षर,
तुम्हारे स्नेह के अक्षर,
मिले तो प्रेम परिभाषित हुआ,
अब और क्या माँगें!

सजे सोए हुए संगीत,
सहसा गीत फिर जन्मे।
अधर रख छेड़ दी इस बार,
मन की बाँसुरी तुमने।

सहज अभिव्यक्ति के अक्षर,
सहज अनुभूति के अक्षर,
मिले तो प्रेम अनुप्राणित हुआ,
अब और क्या माँगें!

लुटा दी तृप्ति इतनी,
प्यास जागी और जीने की।
जगा मन का पखेरू,
चाह है आकाश पीने की।

असीमित परिधि के अक्षर,
परिधि के पार के अक्षर,
मिले तो प्रेम अनुशासित हुआ,
अब और क्या माँगें!

तुम्हारी सहज स्वीकृति से,
मिला आधार जीवन को।
मिला विश्वास जीने का,
मिला अधिकार जीवन को।

सुलगती चाह के अक्षर,
तुम्हारे चाँदनी अक्षर,
मिले तो भाग्य अनुमानित हुआ,
अब और क्या माँगें!


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आज मन की बात कहना चाहता हूँ

ओ पवन!
कुछ पल हमारे पास ठहरो,
मैं तुम्हारे साथ बहना चाहता हूँ।
आज मन की बात कहना चाहता हूँ।

इस तरह कुछ आज तुमने छू लिया है,
जन्म-जन्मों बाद ज्यों जीवन मिला है।
टूट लेने दो हृदय का मौन दो पल,
एक पूरी आयु जो मन में पला है।

संचरित हो
तुम हृदय में, प्राण में तुम,
एक अंतर्द्वंद्व सहना चाहता हूँ।
आज मन की बात कहना चाहता हूँ।

पतझरों को है मिला मधुमास तुमसे।
तप्त मरुथल में जगा विश्वास तुमसे।
ये धरा, आकाश, नदियाँ और पर्वत,
पा रहे हैं आज सारे श्वांस तुमसे।

हैं पिपासित
ये अधर, तुम तृप्ति दे दो,
मैं तुम्हारे पास रहना चाहता हूँ।
आज मन की बात कहना चाहता हूँ।

कर दिए झंकृत हृदय के तार तुमने।
कर दिया है गीत का श्रृंगार तुमने।
जी सकूँगा बिन तुम्हारे किस तरह मैं,
कर दिया है मोह का विस्तार तुमने।

अंक में भर
गीत लूँ, जी भर तुम्हें मैं,
प्रीति का मकरंद गहना चाहता हूँ।
आज मन की बात कहना चाहता हूँ।


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सावन था या प्यार तुम्हारा

आज शाम जब बरसा सावन
भीगा अपना तन-मन सारा।
भ्रान्ति लिए बैठा हूँ अब तक,
सावन था या प्यार तुम्हारा।

कान्हा ने राधा से पूछा
तुम मुझको सच-सच बतलाना।
भली लगी कब तुम्हें बाँसुरी
और अधर तक उसका आना।

भीगे हम भी भीगे तुम भी
शायद था सौभाग्य हमारा।

कह देने से कम हो जाता
दुविधा में क्यों जीते-मरते।
तुम्हीं कहो उन सुखद पलों का
मूल्यांकन हम कैसे करते!

मनः पटल पर स्पर्शों का
बार-बार ही चित्र उतारा।

क्या जाने फिर कब बरसेगा
दूर हुए तो मन तरसेगा।
दिल की बात कहेंगे किससे
दिल का क्या यह तो धड़केगा।

जितना जो कुछ मिला भाग्य से
हमने तुमने है स्वीकारा।


- ज्ञानेन्द्र मोहन ज्ञान
 
रचनाकार परिचय
ज्ञानेन्द्र मोहन ज्ञान

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गीत-गंगा (1)