प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2018
अंक -39

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

भतीजी किक्की के लिए

तुम्हें बढ़ते हुए देखने से ज़्यादा सुखद
मेरे लिए और कुछ नहीं
परन्तु तुम ऐसे वक़्त में बड़ी हो रही हो मेरी बच्ची
जब मानवता की हांफनी छूटी जा रही है
और हर कोई यह सिद्ध करने में लगा है
कि मनुष्य के भीतर
पशुओं से ज़्यादा पशुता है
प्रेम के मोल में लगातार दर्ज की जा रही है गिरावट
और संवेदनशीलता हमारी वर्तनी से
निरंतर छिटकती जा रही है
सारी संवेदनाएँ हाशिये पर धकेल दी गयी हैं
और मुख्य धारा में ध्वंस की प्रतियोगिताएँ जारी हैं
आँसू महज़ अभिनय के वक़्त निकल रहे हैं
ग्लिसरीन के सहारे से
और हृदय की सीमा रेखा
तीव्र गति से सिकुड़ती जा रही है

मैं नहीं जानता कि तुम्हारा करुण हृदय
इस क्रूर समय के लिए अभी तैयार है भी या नहीं
या कभी हो भी पाएगा।

पर इन सबसे परे
तुम बढ़ रही हो अपने सपनों और तमाम इच्छाओं के साथ
और मैं तुम्हें देख रहा हूँ हँसती आँखों में
छिपी असुरक्षा की भीगी नज़रों से

साथ ही जैसे-तैसे पोस रहा हूँ अपने भीतर
उपजी उम्मीद की उस कोंपल को
जो फुसफुसा रही है
कि इस वक़्त से उलट तुम्हारे समय में
तुम बेफ़िक्री से देखोगी अपनी बच्ची को
बढ़ते हुए।


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ओढ़नी

शरीर जब थकता है
तो माँगता है एक नरम बिस्तर और थोड़ा आराम,
सूखा कंठ माँगता है-
ग्लास भर शीतल जल,
यात्रा से थके हुए पैर मांगते हैं कुनकुना
नमक घुला पानी,
दिनभर पोथियाँ पढ़कर थक चुका मस्तिष्क
माँगता है थोड़ी सी नींद,
कविता लिखने से पूर्व
कवि का शांत चित्त
माँगता है थोड़ी-सी बेचैनी,
समाज के बंधनों से बंधकर पृथक हुए दो प्रेमी
माँगते हैं थोड़ी-सी आज़ादी और आत्माओं का आलिंगन,
वर्षों के व्यभिचार से थक चुकी व्यभिचारिणी
माँगती है खाली बिस्तर और अपनी करवटें,
चार पहर के दिन में
दो रोटी से गुज़ारा करने वाला मज़दूर माँगता है-
एक और अदद रोटी,
कचड़े से भरी टाट की बोरी ढोते-ढोते
लगभग टूट चुके नाज़ुक काँधे
माँगते हैं मुलायम टेक और किताबों की ख़ुश्बू,
नाम और पैसे की लिप्सा में
स्वार्थ और प्रपंच में लिथड़ा ज़मीर माँगता है-
अंजुली भर ईमान का पानी

रोज़ ढलते जीवन की साँझ पर
मैं बस चाहूँगा
कविताओं की ओढ़नी
जिसे ओढ़कर चैन से सोया जा सके।


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घर

एक चिड़िया लौटकर आती है
और पाती है एक खाली कोना
वह देखती है उस कोने को, हर कोने से
इतने जतन के उपरान्त भी उसे नहीं मिल पाता
एक भी रेशा उसके घोंसले का।

मैं कई बार जब लौटकर आया हूँ अपने घर
मैंने हर बार ही पाया है उसे साबुत
पर देहरी के भीतर रखते ही पाँव
महसूस करता हूँ उस चिड़िया की पीड़ा,
उसकी बेचैनी

मेरे घर के सही सलामत होने के बावजूद
अचकचाता हुआ ढूँढता रहता हूँ वह रेशा
जिसे मैं पहचानता हूँ।


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स्मृति

कल शाम इच्छाओं की पोटली टटोली
तो हाथ लगी मुझसे भली भांति परिचित
एक लगभग भूला दी गयी इच्छा

रात एक नए सपने का बीज रोपने जब खोदता हूँ ज़मीन
तो खुदाई में पाता हूँ सपनों का ढेर सारा मलबा
जिसमें खुंसी पड़ी है तुम्हारी सेफ्टी पिन

मेज की दराज़ के कोने में तुम्हारे कोट का
धूल में लिथड़ा बटन मिला
जिस पर उँगलियाँ फिराते ही वह किसी परिचित
तारे की तरह चमका

मैं प्रार्थना करता हूँ ईश्वर से
कि मेरी स्मृतियों के पौधे पर उगे फूलों पर
बसंत हमेशा मेहरबां रहे
और काँटों पर चल जाए
पतझड़ का हंसिया

पर यह प्रार्थना भी
बाक़ियों की तरह रह जाती है उपेक्षित

स्मरण शक्ति का दुरुस्त होना भी एक दुर्भाग्य है
और दुर्भाग्यों का कोलाज
मेरी ज़िन्दग़ी की दीवार का श्रृंगार है।


- राहुल तोमर
 
रचनाकार परिचय
राहुल तोमर

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