प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

कोई आश्चर्य नहीं

यह कसूर मौसम का भी रहा
जिसने, यह नहीं बताया था
कि कुछ बीज
किसी भी सभ्यता में गीली ज़मीन पर भी
अपने पुराने फटे वस्त्र नहीं त्यागते हैं
और
यह मेरी ही ज़िद थी
कि एक बीज का अर्थ ही नया पौध बन जाना है

यह कसूर उस माली का भी रहा
जिसने यह नहीं बताया था
कि स्त्री को;
मनीप्लांट की तरह कुछ टूटी जड़ों के साथ नहीं
बल्कि
गुलाब की तिरछी कटी कलम की तरह
दूसरी जगह रोपना चाहिये

ताकि वह आजीवन ही
आत्मा पर चुभे काँटों को निकालने का हुनर
इस तरह पूर्ण विकसित कर सके
जैसे शिशु-जन्म के उपरांत गर्भनाल का सहज त्याग

यह कसूर मेरा भी रहा कि
हरी दूब के बार-बार उग आने को
उसकी जीवटता समझी
जबकि वह धरती को बाँझपन से बचाने को
पीली पड़ती जा रही थी

मुझे अपना यह कसूर स्वीकार करना ही होगा
कि मैंने हर पहली बार को अंतिम समझा
जबकि सच तो यह है
कि कोई भी घटना अंतिम बार नहीं होती है
वह पहली बार ही होती है
फिर बार-बार होती है

कोई आश्चर्य नहीं कि
अगली सभ्यता का शुभारंभ भी
कोई पीली पड़ती दूब ही करेगी!


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सत्य पर शंका

तटबंधों का टूटना
आकस्मिक नहीं होता है
कुछ पूर्वगत दवाब किसी बिंदु विशेष पर
नदी के उफान से षड्यंत्र रच चुके होते हैं

तूफ़ान का कहर बरपाना
असमय ही
किसी अराजक तत्व की घुसपैठ नहीं है
पूर्व में वह आँधी भेजकर
अपनी पृष्ठभूमि तैयार कर चुका होता है

देह में किसी विशेष व्याधि की
चिकित्सीय घोषणा से पहले
कोशिकाएँ भी कसमसाने लगती हैं
जैसे चेतावनी दे रही हों

इस नभ-धरा के मध्य
कुछ भी अप्रत्याशित नही है

हमने सदैव किसी तथ्य के
नकारात्मक पक्ष पर अधिक शंका जाहिर की
सत्यापित होने के बावजूद भी!
संसार में नियम फिर प्रतिनियम बनते रहना
महज़ स्वयं को
सत्यता के करीब रखने की कवायद भर नही है

यह स्वयं को यकीन दिलाने के लिये भी है
कि सत्य पर शंका करते रहना ही
नयी सम्भावनाओं को उर्वर रखता आया है


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अस्तित्व की जिजीविषा

राजपथ दृष्टा की भूमिका में है
सतत आवा-जाही रहने पर भी
घर सदैव प्रतीक्षारत है
प्रत्येक उपस्थिति के उपरांत भी

मुख्य-द्वार विलग है
आंतरिक शोर से
पृष्ठ-द्वार चौकस है
एकल -गमन से

द्वार भयभीत है
उलझी साँकल से
झरोखे उत्कंठित हैं
पगडंडी बन जाने के लिये

जन्म अवश्यम्भावी है
किसी प्रारब्ध के लिये
मृत्यु नितांत अकेली है
बिन किसी जन्मोत्सव के

शमशान लुप्तप्राय हो अनिद्रा का रोगी है
जलती चिताओं की अनुपस्थिति से।
गंगा सकल पुण्यदायिनी है
मुमुक्षु हृदय के लिये

संसार में प्राप्य निर्लिप्तता व संलिप्तता
किसी एक अस्तित्व की जिजीविषा है
जो किसी दूसरे के जीवनसंघर्ष में अंतर्निहित है


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रक्तिमकता का अर्थ

स्त्री की दुनिया बहुत संकीर्ण है, लेकिन
उसे सम्भावनाओं में ही जीवन का विस्तार दिखता है।

वह युद्ध-काल में गीतों को आँचल से बांधने में कुशल है
जिससे आने वाली नस्लें
बचा सकें कुछ गिने-चुने स्वर
और ऋतुओं को बता सकें कि
रक्तिमकता का अर्थ सदैव संहार नहीं होता!

शिशु-जन्म में रक्त करुणामयी हो;
फसलों को बिखरने का अर्थ बताता है।

उसे नदी होने से पहले बाँध का साहचर्य स्वीकार है
ताकि किनारे पड़े पत्थरों को यह भान होता रहे
कि उनके किसी घाट पर पूजे जाने से पहले;
उनका तराशा जाना कितना ज़रूरी है।

स्त्री, आज भी बहुत ज्यादा नये अर्थ नहीं तलाशती है
वह सम्भावनाओं में सन्धि-सी समाहित होकर;
धरती के हर टुकड़े के साथ
स्त्रीत्व की अविरल धारा को ज़िन्दा रखती है।


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सिद्धहस्त

कुछ पशु
जुगाली करने में इसलिये सिद्धहस्त हुए;
क्योंकि पागुर को पाचन-योग्य बनाना
उनकी प्रकृति-जन्य विवशता थी

मानव सर्वाधिक-विकसित प्राणी होने का
लाभार्थी यूँ हुआ है
कि अब वह
दूसरों के निवाले निगलने में भी निष्णात हो चुका है।
क्योंकि उसकी जुगलियाँ मुख से झाग नही फेंकतीं!

(पागुर--जुगाली के समय पशु-मुख में भोजन के बड़े टुकड़े)

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संसार की सबसे सुरक्षित बाड़

जब वह घूमती है
अपनी घर की चारदीवारी में
जैसे वह संसार की सबसे सुरक्षित बाड़ हो
तब मैं, उस बाड़ की समीप से टोह लेने लगती हूँ
कि अब इसके अधिक मजबूत होने की संभावना
कितनी और बाक़ी बची हुई है


- मंजुला बिष्ट
 
रचनाकार परिचय
मंजुला बिष्ट

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