प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2018
अंक -39

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे!
प्राप्तांक / पूर्णांक = शतांक !!
आखिर हम कब सीखेंगे “पेरेंटिंग”!!
 
एक वह दौर था जब कोलकाता विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित प्रेसीडेंसी कॉलेज की परीक्षा में एक प्राध्यापक ने प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू की उत्तर पुस्तिका पर लिखा गया था कि “Examinee is better than examiner’ और बिहार के ही एक बहुत ही प्रतिष्ठित प्राध्यापक चेतकर झा की उत्तर पुस्तिका पर टिप्पणी लिखी गयी थी इतने सटीक और विस्तृत उत्तर तो सिर्फ भगवान गणेश जी ही लिख सकते हैं।
उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आज के होनहार विद्यार्थियों ने अपनी मेधा और प्रतिभा का जो उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है वह सिर्फ काबिल-ए-तारीफ ही नहीं अपितु आश्चर्यजनक भी है।
आज जहाँ कुछ अभिवावक अपने बच्चों का परीक्षा-परिणाम विभिन्न सोशल मीडिया पर प्रदर्शित कर रहे हैं वहीँ कुछ अभिवावक अपने बच्चों के अच्छे परिणाम न आने पर मुँह छिपा रहे और अपनी हताशा और खीज शब्दों के द्वारा बच्चों और पत्नी पर कठोर प्रहार कर रहे हैं। बच्चों के कारण हीनता की दृष्टि से खुद को देख रहे हैं।
इतनी इन्फिरियटी काम्प्लेक्स, किसने पैदा की है? हमारे प्रथम होने की शिक्षा ने। क्यूंकि 30 विद्यार्थियों में एक ही प्रथम आएगा, 29 विद्यार्थी पीछे उसके बाद ही होंगें। एक विद्यार्थी को प्रथम लाने के लिए 29 विद्यार्थियों को हताश- निराश किया जा रहा है। 
 
जिंदगी बहुत छोटी है और प्रथम होना बहुत जरुरी है। क्यूंकि जगत उन्ही का गुणगान करता है जो सफल हैं। उनसे यह नहीं पूछा जाता कि वह सफल कैसे हुये, उनके प्रथम होने के पीछे क्या-क्या हुआ, क्यूंकि सफलता से प्रश्न नहीं किये जाते हैं।
ये जो सफल लोग होते हैं थोड़े से, इनके पीछे कितने असफल लोगों की पंक्तियाँ खड़ी हो जाती है, इस पर कभी हमने ध्यान दिया? और ये सफल दस-पांच लोग दुनिया नहीं बनाते हैं। दुनिया वे सब लोग मिल कर बनाते हैं, जो पीछे छूट गये हैं और असफल हो गए हैं। और जब उदास लोगों से दुनिया निर्मित होगी, तो वह स्वर्ग नहीं बन सकती है, नरक बनना निश्चित है। निश्चित ही हारे हुये लोगों से यह दुनिया जो बनेगी, तो वह दुनिया बहुत अच्छी नहीं ही होगी।
 
मनुष्य का विकास और उन्नति बिल्कुल ही कृत्रिम है, स्वाभाविक नहीं। जन्म लेने के पश्चात बोलने, चलने आदि की क्रियाओं से लेकर बड़े होने तक सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने हेतु उसे दूसरों पर ही आश्रित रहना पड़ता है, दूसरे ही उसके मार्गदर्शक होते हैं। आज जितना बुद्धि-वैभव और भौतिक उन्नति हमें नजर आती है, वह पूर्वजों की शिक्षाओं का प्रतिफल है। उसके लिए हम उन के ऋणी हैं। वे ही हमारे परोक्ष शिक्षक हैं। यह परम्परा अनादिकाल से चली आ रही है। अतः सामान्यतः कहा जा सकता है कि मानव की उन्नति की साधिका शिक्षा है अतः सृष्टि के आदि, वेदों के आविर्भाव से लेकर आज तक मानव को जैसा वातावरण, समाज व शिक्षा मिलती रही वह वैसा ही बनता चला गया, क्योंकि ये ही वे माध्यम हैं, जिनसे एक बच्चा कृत्रिम उन्नति करता है और बाद में अपने ज्ञान तथा तपोबल के आधार पर विशेष विचारमन्थन और अनुसन्धान द्वारा उत्तरोत्तर ऊँचाइयों को छूता चला जाता है। यदि शिक्षा समाज में रहकर दी जा रही है तो उसका प्रभाव शिक्षार्थी पर पड़ना अवश्यम्भावी है। वह वैसा ही बनता है जैसा समाज है।
लेकिन हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था प्रेम पर नहीं, प्रतियोगिता पर आधारित है। जहाँ प्रतियोगिता होगी वहां प्रेम कैसे हो सकता है। प्रतिस्पर्धा तो इर्ष्या का रूप है। एक बच्चा प्रथम आ जाता है तो दुसरे बच्चे से कहते हैं देखो तुम पीछे रह गए और वह तुमसे आगे निकल गया। आखिर हम-आप क्या सिखा रहे है बच्चों को? हम अहंकार सिखा रहे है कि जो आगे है, सफल है वह बड़ा है और जो पीछे छुट गया वह छोटा है। लेकिन किताबों में लिख रहे हैं कि प्रेम करो; और हमारी पूरी व्यवस्था सिखा रही है घृणा करो, इर्ष्या करो, और आगे निकलो और आपकी पूरी व्यवस्था उनको पुरस्कृत कर रही है जो आगे निकल गए। जो आगे निकल गये उनको गोल्ड मैडल दे रही है, उनको सर्टिफिकेट दे रही है और अप्रत्यक्ष रूप से जो उनको अपमानित कर रही है जो पीछे खड़े हैं। 
 
प्रत्येक आदमी के दो चेहरे हैं और एक चेहरा वह है जो हमने तुलना में बना लिया है, किसी और के जैसा बना लिया है। हम कहते हैं, विवेकानंद जैसे बनो ! कोई कहता है, राम जैसे बनो ! कोई कहता है, कृष्ण जैसे बनो ! क्या आज तक कोई बन सका किसी के जैसा? हमें एक ऐसी शिक्षा पद्धति चाहिए जो एक-एक व्यक्ति को आनंद दे सके। उसे स्वीकृति दे सके, वह जैसा है वैसी स्वीकृति दे सके। माता–पिता अगर बच्चों को प्रेम करते हैं, तो प्रेम करने का एक ही मतलब है कि वह प्रेम तो दे, लेकिन बच्चों को ढांचों में ढालने की कोशिश न करे। आदमी सांचों में नहीं ढाला जा सकता। आदमी मशीन नहीं है। मारुति - होंडा की कारें एक जैसी हो सकती हैं, लाखों कारें एक जैसी हो सकती है, लेकिन आदमी एक जैसा नहीं हो सकता है। दुर्भाग्य होगा उस दिन जिस दिन हम एक जैसे आदमी ढालने में समर्थ हो जायेंगे। लेकिन हमारी कोशिश यही है कि एक जैसे आदमी हम ढाल दें। सब आदमी एक जैसे हो जायें।
अब तक की सारी शिक्षा महत्वकांक्षा, तुलना और दूसरे के प्रतिस्पर्धा पर खड़ी है। अगर शिक्षा की यह व्यवस्था अगले 50 वर्षों तक और चलती रही, धरती पर(विशेषकर भारत) पागलों की पूरी फौज खड़ी हो जायेगी।
 

- नीरज कृष्ण