प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फिल्म समीक्षा
महाभारत गाथा परमाणु परीक्षण के बहाने 
 
 
समीक्ष्य फिल्म : परमाणु: द स्टोरी ऑफ़ पोखरण
कलाकार : जॉन अब्राहम, डायना पैंटी, बोमन ईरानी, अनुजा साठे
डायरेक्टर : अभिषेक शर्मा
जॉनर : ऐतिहासिक, एक्शन, ड्रामा, देशभक्ति 
संगीत : सचिन-जिगर
 
90 के दौर में विकसित देश जहाँ एक और अपनी परमाणु ताकत को बढ़ाने में दिन रात काम कर रहे थे वहीं जब हिन्दुस्तान की सरकारों, वैज्ञानिकों ने ये काम करने की सोची तो अमेरिका (विकसित राष्ट्र) ने इसका पुरजोर विरोध किया तथा भारत पर अपने सेटेलाइट्स के माध्यम से उसकी हर गतिविधि पर नजर रखने लगा । हालिया रिलीज फिल्म ‘पोकरण : द स्टोरी ऑफ़ पोखरण’ इसी की बानगी है । जॉन अब्राहम, डायना पैंटी, बोमन ईरानी के अभिनय से सजी और फिल्मकार अभिषेक शर्मा के निर्देशन में बनी फिल्म 'परमाणु: द स्टोरी ऑफ पोखरण' लंबे वक्त तक रिलीज को लेकर सुर्खियों में भी बनी रही । फिल्म वर्ष 1998 में हुए पोखरण परमाणु परीक्षण पर आधारित है । जिसमें साल 1995 के असफ़ल प्रयोग को भी दर्शाया गया है । वर्तमान भारतीय सिनेमा का दौर भारतीय राजनीति से प्रभावित होकर राष्ट्रवादी, देशप्रेम को खुल कर बढ़ावा दे रहा है । हालांकि भारतीय सिनेमा पर भारतीय राजनीति का प्रत्यक्षत: एवं परोक्ष प्रभाव हमेशा से रहा है । 
 
परमाणु फिल्म की कहानी कुछ इस प्रकार है :-
 
कहानी की शुरूआत वर्ष 1995 से होती है आईएएस ऑफिसर अश्वत राणा (जॉन अब्राहम) भारत के परमाणु परीक्षण पर एक रिपोर्ट तैयार करते हैं और इसे एक सरकारी बैठक में मंत्रालय में मंत्रियों और सलाहकारों को सौंप देते हैं । लेकिन इस पर ज्यादा ध्यान न दिए जाने की वजह से यह मिशन पूरा नहीं हो पाता । बैठक के दौरान टेबल पर चीन के परमाणु परीक्षण की चर्चा चल रही होती है तथा  सलाहकार तरह-तरह की सलाह दे रहे होते  हैं । इसी बीच गंभीर माहौल एकदम से तब हल्का हो जाता है । जब एक सलाहकार मंत्री जी से कहता है ‘हम चीन पर प्रतिबंध लगा देंगे’। तभी कोने की कुर्सी पर बैठा अश्वत रैना (जॉन अब्राहम) दृढ़ता से कहता है कि हमें भी परमाणु शक्ति बनना होगा । इस पर उस कमरे में हंसी का एक फ़व्वारा छूटता है । जबकि एक अन्य अधिकारी कहता है ‘हम परमाणु परीक्षण पहले कर चुके हैं ।’ रैना कहता है ‘वह तो ऐसा हुआ कि गाड़ी की क्षमता गैरेज में ही देख ली, उसे चलाया ही नहीं ।’ बहस को रोकते हुए मंत्री जी कहते हैं :- इन्हे बोलने दो, चाय आने तक थोड़ा मनोरंजन हो जाएगा ।’ अश्वत रैना समझाता है कि इस प्लानिंग को किस तरह अंजाम दिया जाएगा और वह एक फ्लॉपी निकालकर भी उन्हें कहता है कि इसमें प्लानिंग सारी । कुछ देर बाद मंत्री जी चाय पीने के बाद उसी फ्लॉपी पर चाय का कप रख देते हैं ।’ बैठक के बाद उस पर एक संक्षिप्त रिपोर्ट भी बनाकर प्रधानमंत्री को दी जाती है इसी संक्षिप्तता एवं ज्यादा गंभीर न होने के कारण मिशन असफ़ल रहता है । इस मिशन के असफ़ल हो जाने के कारण अश्वत की जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आते हैं, जिसकी वजह से उन्हें अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ता है और वह दिल्ली से वापस मसूरी चले जाते हैं । लेकिन लंबे समय के बाद अश्वत की जिंदगी फिर से मोड़ लेती है जब सरकार बदलती है और एक दिन पीएम के प्रमुख सचिव हिमांशु शुक्ला (बोमन ईरानी) को विचार आता है कि उन्हें इस परमाणु टेस्ट पर काम करना चाहिए । बस फिर क्या था? जॉन को फिर काम पर लगाया जाता है और वह 5 सबसे बेहतरीन ऑफिसर्स को चुनकर एक टीम बनाते हैं, जिसका नाम 'पांडव' रखा जाता है । यहाँ आकर फिल्म में ऐतिहासिकता एवं मिथकीयता चरम छूने वाली लगती है । एक बारगी यह भी लगता है कि फिल्म परमाणु परीक्षण पर कम और महाभारत पर ज्यादा आधारित है।
 
अभिनय की बात करें तो अभिनय के मामले में फिल्म में जॉन अब्राहम ने अपने किरदार को बखूबी पर्दे पर पेश करने की कोशिश की है । हालांकि फिर भी उन्हें देखकर लगता है कि वह और इससे बेहतर कर सकते थे । वहीं डायना पैंटी एक ऑफिसर के किरदार में कुछ खास नहीं जँचती । इसके अलावा बोमन ईरानी के अभिनय की बात करें तो बात करें उन्होंने अपने किरदार के साथ पूरा इंसाफ किया है । बोमन ईरानी अभिनय के मामले में बॉलीवुड में एक सधे हुए एवं स्थापित कलाकार के रूप में अपनी पहचान रखते हैं ।
 
जॉन इससे पहले 'विक्की डोनर' और 'मद्रास कैफे' जैसी एक अलग कॉन्सेप्ट की फिल्मों को भी पेश कर चुके है । इस बार वह देश भक्ति के रंग में रंगी एक कहानी लेकर आए हैं । जिनसे इतिहास में हुई कुछ घटनाओं को देखने का शौक है तो यह फिल्म जरुर देखनी चाहिए । जॉन अब्राहम की ये फिल्म पोखरण परीक्षण से पहले की परिस्थितियों से प्रारम्भ होती है और आखिर में भारत की गर्व भरी उपलब्धि पर समाप्त होती है । पोखरण परीक्षण क्यों जरुरी था, उस वक्त देश की राजनीतिक परिस्थितियां क्या थी, अमेरिकन सेटेलाइट की आँखें हम पर क्यों लगी रहती थी, कैसे हम इस अभियान में सफल रहे, इन सब बातों का जवाब ये फिल्म बखूबी देती है ।
 
फिल्म का क्लाइमैक्स अद्भुत ढंग से बनाया गया है । चार बजकर पैंतालीस मिनट पर जैसे ही पोखरण की धरती हिलती है, सब कुछ फ्रीज़ हो जाता है और इस दौरान भारत के उस गर्व को इस ‘स्टील शॉट’ में महसूस किया जा सकता है । इसके अलावा फिल्म का सकारात्मक पक्ष है फिल्म में रियल फुटेज का अच्छा इस्तेमाल । ख़ासतौर पर नेताओं के भाषण, अटल बिहारी वाजपेयी और ए० पी० जे० अब्दुल कलाम की तस्वीरों का फिल्म में इस्तेमाल । यह इसलिए भी नहीं अखरता क्योंकि परमाणु परीक्षण में इन दोनों की अहम भूमिका रही है और इससे फिल्म को रियल टच मिला है । इसके अलावा फिल्म का नकारात्मक पहलू है 1974 में हुए पोखरन टेस्ट का एक सीन ।  जिसका कोड नाम स्माइलिंग बुद्धा था, उसके बारे में फिल्म में ज्यादा कुछ नहीं बताया गया है जबकि उसके बारे में थोड़ा और बताया जाना चाहिए था । इसके बाद फिल्म में जबरदस्ती इस्तेमाल किए गए देशभक्ति वाले डायलॉग भी काफी बुरा असर छोड़ते हैं । हालांकि इस सबके बावजूद भी यह फिल्म आधुनिक भारत के इतिहास की सबसे अहम घटना को बखूबी दर्शाती है । 
 
फिल्म के गानों की बात करें तो फिल्म का म्यूजिक किसी भी सीन पर फिट नहीं बैठता उसमें गाने मिसफिट से दिखाई पड़ते हैं । फिल्म की एडिटिंग ठीक-ठाक है । 
 

- तेजस पूनिया