प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

अब के बिखरा तो मैं यकजा नहीं हो पाऊँगा
तेरे हाथों से भी वैसा नहीं हो पाऊँगा

मुझको बीमार करेगी तेरी आदत इक दिन
और फिर तुझसे भी अच्छा नहीं हो पाऊँगा

ये तो मुमकिन है कि हो जाऊँ तेरा ख़ैर अन्देश
हाँ, मगर उससे ज़ियादा नहीं हो पाऊँगा

अब मेरी ज़ात में बस एक की गुंजाइश है
मैं हुआ धूप तो साया नहीं हो पाऊँगा

यूँ तो मुश्किल ही बहुत है मेरा हाथ आना और
हाथ आया तो गवारा नहीं हो पाऊँगा

तू बड़ी देर से आया मुझे ज़िन्दा करने
अब नमी पा के भी सब्ज़ा नहीं हो पाऊँगा

मुझ में इतनी नहीं तासीर मसीहाई की
ज़ख़्म भर सकता हूँ, ईसा नहीं हो पाऊँगा

इन दिनों अक़्ल की चलती है हुकूमत दिल पे
मैं जो चाहूँ भी तुम्हारा नहीं हो पाऊँगा

इतना आबाद है तुझसे मेरे अंदर का शहर
तुझसे बिछड़ा भी तो सहरा नहीं हो पाऊँगा


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ग़ज़ल-

मैं ख़ाक हूँ सो यही ताज़्रिबा रहा है मुझे
वो शक्ल-ए-नौ के लिए रौंदता रहा है मुझे

उसे जो चाहिए मैं हूँ उसी की माफ़िक़ शै
वो मेरे जैसे की ज़िद में गँवा रहा है मुझे

मैं वो ही ख़्वाब-ए-सहर जो फ़िज़ूल था दिन भर
तवील शब में मगर देखा जा रहा है मुझे

इधर ये फ़र्दा खफ़ा है मेरे तग़ाफ़ुल से
उधर ख़ुलूस से माज़ी बुला रहा है मुझे

यही नहीं कि मैं ना-मुत्मईं हूँ दुनिया से
मेरा वजूद भी इक मसअला रहा है मुझे


- राहुल झा
 
रचनाकार परिचय
राहुल झा

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ग़ज़ल-गाँव (1)