प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लेख

माँ का रिश्ता सबसे अनमोल
- आकांक्षा यादव



माँ दुनिया का सबसे अनमोल रिश्ता है। एक ऐसा रिश्ता जिसमें सिर्फ अपनापन और प्यार होता है। माँ हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती है और माँ की वजह से हम आज इस दुनिया में हैं।माँ शब्द जुबान पर आते ही मन श्रद्धा से भर जाता है। दिल की गहराईयो में प्यार का सागर उमड़ने लगता है। माँ की हर सीख हमें याद आती है, जो उन्होंने हमें बचपन में सिखाई है। हर व्यक्ति को अपनी माँ बहुत अच्छी लगती है। सभी कहते हैं कि मेरी माँ के जैसा कोई नहीं है। क्योंकि हर बच्चे के शरीर में  माँ का रक्त प्रवाहित होता रहता है। माँ अपनी आयु के सुखद क्षणों को अपनी संतानों पर न्यौछावर कर देती है। उनका निःस्वार्थ स्नेह और समर्पण हमें हमेशा याद रहता है। माँ जन्मदात्री के साथ-साथ ज्ञान और शक्तिदायिनी भी है।

दुनिया में माँ का एक ऐसा अनूठा रिश्ता है, जो सदैव दिल के करीब होता है। हर छोटी-बड़ी बात हम माँ से शेयर करते हैं। जब भी कभी उलझन में होते हैं तो माँ से बात करके जो आश्वस्ति मिलती है, वह कहीं नहीं। दुनिया के किसी भी कोने में रहें, माँ की लोरी, प्यार भरी डांँट और चपत, माँ का प्यार, दुलार, स्नेह, अपनत्व व ममत्व, माँ के हाथ का बना हुआ खाना, किसी से झगड़ा करके माँ के आँचल में छुप कर अपने को महफूज समझना, बीमार होने पर रात भर माँ का जगकर गोदी में सर लिए बैठे रहना, हमारी हर छोटी से छोटी जिद को पूरी करना, हमारी सफलता के लिए देवी-देवताओं से मन्नतें माँंगना .....और भी न जाने क्या-क्या कष्ट माँ हमारे लिए सहती है। जब आपको चोट लगती है तो सबसे पहले जिसकी याद आती है वह कौन है? और किसे सुनाई थी आपने अपनी तोतली जुबान में पहली कविता? और कोई नही, वह  माँ ही तो है। जरा सोचिए, अगर माँ सुबह जल्दी आपको न उठाए तो आप स्कूल कैसे पहुँच पाएंगे। माँ ही तो है जो आपकी हर छोटी से छोटी जरूरत के लिए भी कई-कई बार टोकती है। एक दिन हम सफलता के पायदान पर चढ़ते हुए अपनी अलग ही जिदगी बसा लेते हैं। हम माँ की नजरों से दूर अपनी दुनिया में भले ही अलमस्त रहते है, फिर भी माँ रोज हमारी चिंता करती है। हम सोचते हैं कि हम बड़े हो चुके हैं, पर माँ की निगाह में तो हम बच्चे ही हैं। माँ की इबादत हर दिन भी करें तो भी उसका कर्ज नहीं चुका सकते। कहते हैं ईश्वर ने अपनी कमी पूरी करने के लिए इस धरा पर माँ को भेजा। इस धरा पर माँ ईश्वर का जीवंत रूप है। माँ को खुशियाँ और सम्मान देने के लिए पूरी जिंदगी भी कम होती है।

भारतीय परंपरा में मातृ शक्ति का विशिष्ट स्थान है। यहाँ मातृ पूजा की सनातन परंपरा रही है और हर जीवनदायिनी को माँ का दर्जा दिया गया है, फिर चाहे वह धरती हो या प्रकृति। यहाँ जननी को स्वर्ग से भी बढ़कर माना गया है। माता भूमिः पुत्रोहं पृथिव्याः (भूमि मेरी माँ है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ) कहकर पालन-पोषण करने वाली धरती को एवं मोक्षदात्री पतित पावनी गंगा को भी माँ कहकर सम्मानित किया जाता है। माँ वह ममतामय शब्द है, जिसकी झंकृति से ही नारी हृदय का रोम-रोम करूणा, ममता एसं वात्सल्य से पुलकित हो जाता है और मंदिर की भाँति पावन स्वर भरने वाली घंटियाँ बजने लगती हैं। ’मातृदेवो भव’ कहकर रोम-रोम में पृथ्वी पर ईश्वररूपी माँ के प्रति दैवीय भाव की भावना व्यक्त की गई है। नवरात्र जैसे पवित्र त्यौहार तो मातृ शक्ति को ही समर्पित होते हैं। भारतीय परम्परा में मातृ शक्ति के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए मातृ नवमी (श्राद्ध पक्ष में) की तिथि सुनिश्चित की गयी है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी देखें तो मातृ पूजा का इतिहास सदियों पुराना एवं प्राचीन है। माँ भगवान का बनाया एक ऐसा तोहफा है जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम ही है। अतुलनीय, अद्भुत, अकल्पनीय कुछ इससे भी बढ़कर है माँ! मातृ पूजा का रिवाज पुराने ग्रीस से उत्पन्न हुआ है, जो  ग्रीक देवताओं की मां स्य्बेले के सम्मान में मनाया जाता था। यह त्यौहार एशिया माइनर के आस-पास और साथ ही साथ रोम में भी वसंत विषुव के आस-पास मनाया जाता था। प्राचीन रोमवासी एक अन्य छुट्टी मनाते थे, जिसका नाम है मेट्रोनालिया, जो जूनो को समर्पित था, यद्यपि इस दिन माताओं को उपहार दिये जाते थे। यूरोप और ब्रिटेन में  कई प्रचलित परम्पराएं हैं जहाँ एक विशिष्ट रविवार को मातृत्व और माताओं को सम्मानित किया जाता था, जिसे मदरिंग सन्डे कहा जाता था। 16वीं सदी में इंग्लैण्ड का ईसाई समुदाय ईशु की माँं मदर मेरी को सम्मानित करने के लिए यह त्यौहार मनाने लगा। वस्तुतः ’मातृ दिवस’ मनाने का मूल कारण मातृ शक्ति को सम्मान देना और एक शिशु के उत्थान में उसकी महान भूमिका को सलाम करना है।

भारतीय संस्कृति माँ को सम्मान देने वाली संस्कृति है। लेकिन जिस ’मदर्स-डे’ को मई माह के दूसरे रविवार को सेलिबे्रट करते हैं, उसकी शुरूआत अमेरिका में वर्ष 1908 में हुई। वेस्ट वर्जिनिया के ग्राफ्टन शहर की रहने वाली अन्ना जारविस ने सबसे पहले अपनी माँ की याद में मदर्स डे मनाने का फैसला किया। अन्ना जारविस सिर्फ अपनी माँ के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया भर की माँओं को उनकी ममता का सम्मान देना चाहती थीं, जिसके लिए उन्होंने लगातार संघर्ष किया। अंततः 1912 में मई के दूसरे रविवार को “वल्र्ड मदर्स डे“ के तौर पर मनाया गया। मदर्स डे को आधिकारिक बनाने का निर्णय अमरीकी राष्ट्रपति वुडरो विलसन ने 8 मई, 1914 को लिया। 8 मई, 1914 को अन्ना की कठिन मेहनत के बाद तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाने और माँ के सम्मान में एक दिन के अवकाश की सार्वजनिक घोषणा की। वे समझ रहे थे कि सम्मान, श्रद्धा के साथ माताओं का सशक्तीकरण होना चाहिए, जिससे मातृत्व शक्ति के प्रभाव से युद्धों की विभीषिका रुके। तब से हर वर्ष मई के दूसरे रविवार को ’मदर्स डे’ मनाया जाता है।  अमेरिका में मातृ दिवस (मदर्स डे) पर राष्ट्रीय अवकाश होता है। अलग-अलग देशों में मदर्स डे अलग-अलग तारीख पर मनाया जाता है। 1920 तक आते-आते हाॅलमार्क आदि कंपनियों ने इस खास दिवस के लिए कार्ड और गिफ्ट आदि बाजार में उतार दिए और आज दुनिया भर में मदर्स डे बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। विश्व में कुछ जगहों पर लोग अपनी माँ के लिए लाल गुलाब खरीदते हैं तो वहीं जिनकी माँ अब इस दुनिया में नहीं हैं, वह उनकी याद में सफेद गुलाब खरीदते हैं।

अब भारत में भी पाश्चात्य देशों की तरह ’मदर्स डे’को एक खास दिवस पर मनाने का महत्व बढ़ रहा है। इस दिन माँ के प्रति सम्मान-प्यार व्यक्त करने के लिए कार्ड्स, फूल व अन्य  उपहार भेंट किये जाते हैं। माँ और ममता को सम्मान देने का दिन है ’मदर्स-डे’। ग्रामीण इलाकों में अभी भी इस दिवस के प्रति अनभिज्ञता है पर नगरों में यह एक फेस्टिवल का रूप ले चुका है। काफी हद तक इसका व्यवसायीकरण भी हो चुका है। लेकिन माँ को खुश करने के लिए महंगे तोहफों या सरप्राइज मैसेज की जरूरत नहीं होती, बल्कि वह तो खुश हो जाती है, आपकी छोटी सी ईमानदारी से भी।किसी एक खास दिन मदर्स-डे मनाना आसान लगता है पर माँ को याद करने से पहले जरा इन आंकड़ों पर भी गौर फरमाएंँ। हो सकता है कि इन्हें पढ़ते-पढ़ते आपकी आँखें नम हो जाएँ। नम आँखों  में इन आँकड़ों की कमी-बेशी के बीच भीप्यार और त्याग से सराबोर माँ का जीवन छुपा हुआ है।  अब जरा ठहरकर सोचें इस प्यार और त्याग के बदले में हम उसे क्या देते हैं?

माॅंँ आज भी गृहस्थी और कैरियर के बीच झूल रही है। बच्चों की परवरिश के बीच कैरियर की तमन्ना कब दम तोड़ जाती है, पता ही नहीं चलता। आंकड़े बताते हैं कि 77  फीसदी माँओं ने पहली संतान के बाद अपने सपने छोड़ दिये, वहीं 91 फीसदी माताएं बच्चों से ये सपने पूरा करने की उम्मीदें रखती हैं। पेशेवर जिंदगी की कठिनाइयांँ को लेकरप्यू रिसर्च सेंटर द्वारा 2012 में किये गये एक सर्वे पर गौर करें तो स्थति स्वतः स्पष्ट हो जाती है। आज भी 32 फीसदी माँएं ही फुल टाइम नौकरी की ख्वाहिशमंद हैं। 71 फीसदी माताओं के लिए तो  नौकरी करना आर्थिक मजबूरी है। 67 फीसदी माँएं घर रहकर ही काम करने की सुविधा चाहती हैं, वहीं 47 फीसदी माँएं पार्ट टाइम नौकरी करने में ज्यादा सहज करती हैं। 46 फीसदी माताएँं बच्चों के लिए कैरियर कुर्बान कर देेती हैं तो  29 फीसदी ने बच्चों की परवरिश के लिए नौकरी छोड़ दी। 60 फीसदी माँएं खुद से ज्यादा बच्चों के बीमार होने पर छुट्टियाँ लेती हैै।


इसी प्रकार जीवन की आपाधापी में सेहत के मोर्चे पर देखें तो माताएंँ रोजना रात को औसतन 2 घंटे नींद गँंवाती हैं। 88 फीसदी माँएं तनाव महसूस करती है। 44 फीसदी महिलाएं खानपान पर ध्यान नहीं दे पातीं वहीं 40 फीसदी हड़बड़ी में रहती हुई रंग-रूप पर ध्यान नहीं दे पातीं। 43 फीसदी माँए डिप्रेशन तो 19 फीसदी माइग्रेन से पीड़ित हैं।

घर-समाज में माताओं द्वारा इतना सब कुछ त्याग करने के बावजूद कई बार स्थितियांँ उनके लिये बेहद जिल्लत भरी होती हैं। हेल्पेज इंडिया-2011 सर्वे के अनुसार घर में भी 70 फीसदी माँएं बहू-बेटे का अत्याचार झेलती हैं तो 64फीसदी बहुएँ सास को प्रताड़ित करती हैं। 70 फीसदी बच्चे माँ-बाप से झगडे़ करते हैं तो 87फीसदी बुजुर्ग माँओं को उपेक्षा की शिकायत हैै। 23 फीसदी बूढ़ी माँएं काम करने को मजबूर हैं। 15,000 से ज्यादा बुजुर्ग महिलाएँ वृदावन में भीख मँगाकर गुजर-बसर करती हैं। इनमें से ज्यादातर बच्चों द्वारा छोड़ी गई माँएं हैं । यह स्थिति देख कर कोई भी असहज महसूस करेग।


ऐसे में रिश्तों पर हावी होती स्वार्थपरता और व्यवसायकिता के बीच यह भी सोचने की जरूरत है कि रिश्ते कहीं किसी दिन विशेष के मोहताज न हो जाएं । माँ तो जननी है, वह अपने बच्चों के लिए हर कुछ बर्दाश्त कर लेती है। पर दुःख तब होता है जब माँ की सहनशीलता और स्नेह को उसकी कमजोरी मानकर उसके साथ दोयम व्यवहार किया जाता है। माँ के लिए बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जाता है, यह कला और साहित्य का एक प्रमुख विषय भी है, माँ के लिए तमाम संवेदनाएं प्रकट की जाती हैं पर माँ अभी भी अकेली है। जिन बेटों-बेटियों को उसने दुनिया में सर उठाने लायक बनाया, शायद उनके पास ही माँ के लिए समय नहीं है। अधिकतर घरों में माँ की महत्ता को गौण बना दिया गया है। आज भी माँ को अपनी संतानों से किसी धन या ऐश्वर्य की लिप्सा नहीं, वह तो बस यही चाहती है कि उसकी संतान जहाँ रहे खुश रहे। पर माँ के प्रति अपने दायित्वों के निर्वाह में यह पीढ़ी बहुत पीछे है। माँ के त्याग, तपस्या, प्यार का न तो कोई जवाब होता है और न ही एक दिन में इसका कोई कर्ज उतारा जा सकता है। मत भूलिए कि आज हम-आप जैसा अपनी माँ से व्यवहार करते हैं, वही संस्कार अगली पीढ़ियों में भी जा रहे हैं।


- आकांक्षा यादव
 
रचनाकार परिचय
आकांक्षा यादव

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