प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते-स्वर

आपत्ति है

आपत्ति है
कुछ मित्रों को
मुझपे नहीं, मेरे शब्दों पर
उनके मिज़ाज पर,
उनके निहितार्थ पर
शब्दों की सामयिकता
सामर्थ्य पर
आपत्ति
हो सकती है
होनी ही चाहिए
क्योंकि आपत्ति ही
ज़िन्दा होने का सबसे बड़ा सबूत है

और वहीं से शुरू होती है
नये की संभावना
क्योंकि सहमति के आरामदेह वातानुकूलित कक्ष में
हृदय सिर्फ धड़कता है वक्ष में
आपत्ति ही क्यों?
मित्रो! संदेह भी करो
मुझपे नहीं, मेरे शब्दों पर
उनकी क्षमता पर
उनके ईमान, सत्य-निष्ठा पर
संदेह करो अवश्य
उनकी प्राण-प्रतिष्ठा पर
चरित्र पर भी
क्योंकि
संदेह के सूखे आकाश में ही
किसी दिन उमड़ेंगे
घनीभूत श्रद्धा के बादल
संदेह ही बताएगा
शब्दों में अर्थों के कितने चोर-दरवाजे हैं
या कि इनमें प्रजा कितनी है
कितने राजे-महाराजे हैं
संदेह ही बताएगा
फिर ज़रूरी है सवाल भी
मुझसे नहीं, मेरे शब्दों से
कविता से पूछो
अवश्य
लेकिन जवाब की गारंटी नहीं है
क्योंकि जवाब इतना आसान नहीं है
क्योंकि वास्तव में
कोई शाश्वत समाधान नहीं है
और सवाल भी हमेशा दरअस्ल वही नहीं है
और ये तो कविता है
ट्रीटमेंट पैकेज या टोना-टोटका नहीं
जीवित रखेगा हमें पानी, कोई वोडका नहीं
पानी
आत्मविश्वास का बढ़ता-बहता रहेगा
अहर्निश
अगर हम उत्तर ढूंढना रखेंगे जारी
कभी तो सवालों पर हम होंगे भारी
लेकिन पहले सवाल है ज़रूरी
मुझसे नहीं, कविता से

ये आपत्ति
संदेह
और सवाल
सूत्र हैं
संभावना, श्रद्धा एवं आत्मविश्वास जगाने के लिए
क्योंकि सिर्फ धूप काफी नहीं है
नर्म घास उगाने के लिए
और यह कोई नयी बात नहीं
सूत्र पुराने ही सही
सुपरीक्षित हैं अगर नये को जन्म देने के लिए
फिर से आजमाओ
समय मत गंवाओ
अभी भी बहुत आगे जाना है
सूरज को वापस बुलाना है
फिर कहेंगे
'शुभ प्रभात'।


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रोको


रोको
इसे रोको
इधर ही आ रहा है
हंगामेदार शोर

सुनामी-सा उठता हुआ
शोर को चीरकर लगातार
स्पष्ट होते नारे
जिंदाबाद ........मुर्दाबाद
खतम करो,  खतम करो
मंजूर नहीं, मंजूर नहीं
पूरी हों,  पूरी हों
अपने-अपने हथियार
अपनी-अपनी पसंद के
लाठी-डंडे,
डीजल पेट्रोल,
कीचड़, कालिख, टमाटर, अण्डे
तोड़-फोड़,
अपने-अपने आक्रोश के हिसाब से
इधर ही आ रही है
सड़क को जैसे दबाती-दबोचती
उमड़ती भीड़
इधर ही आ रही है।

कौन लोग हैं ये?
इतना आक्रोश?
ये क्या?
मूर्ति तोड़ दी?
बीच चौराहे पर
पुलिस बेबस, मूकदर्शक, निर्वाक्
इतनी नफरत?
कि नीचे गिरे टुकड़ों पर
कालिख पोत रहे हैं?
ये तो तय है
यह कोई महापुरूष था
लेकिन इस भीड़ का नहीं था
पहचान की अपनी कसौटी के मुताबिक
सालों पहले कभी इतिहास में
इस पुरूष ने
कुछ कहा-किया था ऐसा
भीड़ को लगा
आज अभी
सही मौका है
पुराने हिसाब चुकाने का
सही समय है सबको बताने का
कि लोकतंत्र में
विरोध सामूहिक प्रतिशोध का भी एक नाम है।

अरे! ये क्या?
वह नौजवान बोतल खोल
ख़ुद पर डाल रहा पेट्रोल
बोला- "आत्मदाह"

ज़बरदस्त उछाह
नारे चढ़े फिर परवान लगातार
भीड़ चिल्लाती है- शहादत..खून
और वह नौजवान
पूरी भीड़ के लिए अकेले मरना चाहता है
आज अभी
सबके लिए कुछ करना चाहता है
एक बूढ़ी औरत?
इसे भगाओ, मत आने दो इधर
यह उसकी माँ है-
छोड़ो मेरे बेटे को
क्यों मरेगा मेरा लाल?
मरेगा एक
बाकी सब उड़ाएंगे माल
और बुढ़ापे की लाठी खोकर खाएगी
दर-दर की ठोकर
बाद में
बाकियों के मज़े
इधर मुआवजे

लेकिन
ऊपर से आह्वान है
भारत बंद
ये ऐसे नहीं होगा
पहले चक्का जाम करो
इसी पे दौड़ता है आजकल भारत
तोड़ो शीशे दुकान के माॅल के
स्क्रीन सिनेमा हॉल के
इन्हीं से झाँकता है भारत
और ढूंढो कहाँ-कहाँ हो सकता है
स्कूल, अस्पताल, वाचनालय में
दुबक के बैठा भारत
बंद करो उसे वहीं-वहीं
ऊपर से आह्वान है
एक भी एम्बुलेंस पहुंचने न पाए अस्पताल
न ही बच्चे स्कूल या कॉलेज
न ही हरी सब्जी मछली दूध
बाजार मंडियों तक
पहुंचने न पाए ग्राहक रंडियों तक
ऊपर से आह्वान है
खोजो उसे
उपनिषद्, रामायण, गीता में
पुरुष-सूक्त, मनुस्मृति में तो ज़रूर मिलेगा
वहाँ पंक्तियों में नहीं तो
पंक्तियों के बीच खोजो
क्योंकि
जो खोजोगे मिलेगा वही
इसलिए ठीक से खोजो
भारत को
ऊपर से आह्वान है
उसे बंद रखो ग्रंथों -गुटिकाओं में
अन्यथा बेहतर है
कर लो आत्मदाह
ऊपर से आह्वान है
लेकिन
यहाँ इस बार उसकी माँ है
सामने खड़ी मोम
कोई समझाओ इसे
समय बदल गया है
दिल से नहीं
काम लो दिमाग से
बे-मतलब मत खेलो
भरी जवानी में आग से
मत देखो इतिहास के कन्फ्यूज्ड पन्ने
आका की नजरों से
मत चूसो
दूसरों के चूसे हुए गन्ने
और भी तरीके हैं अपनी भीड़ हेतु
कुछ करने के
अगर जवानी बचा सको
ढूंढो तरीक़े
उस भारत को नहीं
अक्सर जिसे ढूंढने में झोंक दिया गया है तुम्हें
और जिसे तुम्हें करने कहा गया है
बंद।


- दिलीप कुमार दर्श
 
रचनाकार परिचय
दिलीप कुमार दर्श

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उभरते स्वर (1)