प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

छन्द संसार

दोहा छन्द

माँ लोरी है साँझ की, माँ प्रभात का गीत।
गिर-पड़ चलना सीखते, उस छुटपन की मीत।।


कुदरत  के  वरदान  को, रहे  देख  सब  दंग।
माँ चन्दन के पेड़-सी, बेटा भले भुजंग।।


ताँता कष्टों का लगा, कभी न मानी हार।
दिखलाती उनको रही, माँ बाहर का द्वार।।


शीश झुकाकर टाँकती, लुगड़ी में पैबंद।
अनपढ़ अम्मा लिख रही, संघर्षों के छंद।।


माँज-माँज कर ठीकरे, हथली हुई कुरूप।
माँ के मुख छाई रही, मुस्कानों की धूप।।


धुआँ-धुआँ चूल्हा जले, बहे आँख से धार।
फिर भी टिक्कड़ थेपती, माँ कब माने हार।


ओर-छोर अज्ञात है, ऐसा पारावार।
जो डूबा वह तर गया, पा अम्मा का प्यार।।


गरमी में ठण्डी हवा, जाड़े मीठी धूप।
बारिश में छत-सी तने, माँ के कितने रूप।।


बया सरीखी माँ बुने, छोटे-छोटे ख़्वाब।
आना-पाई जोड़कर, रहती ढाँपे आब।।


पूजे पाथर देवता , तब पाए थे पूत।
अब बेटों के बीच में, माता हुई अछूत।।


- कुँअर उदयसिंह अनुज
 
रचनाकार परिचय
कुँअर उदयसिंह अनुज

पत्रिका में आपका योगदान . . .
छंद-संसार (1)