हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

छन्द संसार

कुण्डलिया छन्द


रत्नाकर सबके लिए, होता एक समान।
बुद्धिमान मोती चुने, सीप चुने नादान।।
सीप चुने नादान, अज्ञ मूंगे पर मरता।
जिसकी जैसी चाह, इकट्ठा वैसा करता।
'ठकुरेला' कविराय, सभी खुश इच्छित पाकर।
हैं मनुष्य के भेद, एक-सा है रत्नाकर।।




होता है मुश्किल वही, जिसे कठिन लें मान।
करें अगर अभ्यास तो, सब कुछ है आसान।।
सब कुछ है आसान, बहे पत्थर से पानी।
यदि खुद करे प्रयास, मूर्ख बन जाता ज्ञानी।
'ठकुरेला' कविराय, सहज पढ़ जाता तोता।
कुछ भी नहीं अगम्य, पहुँच में सब कुछ होता।।




थोथी बातों से कभी, जीते गये न युद्ध।
कथनी पर कम ध्यान दे, करनी करते बुद्ध।।
करनी करते बुद्ध, नया इतिहास रचाते।
करते नित नव खोज, अमर जग में हो जाते।
'ठकुरेला' कविराय, सिखातीं सारी पोथी।
ज्यों ऊसर में बीज, वृथा हैं बातें थोथी।।




चलते-चलते एक दिन, तट पर लगती नाव।
मिल जाता है सब उसे, हो जिसके मन चाव।।
हो जिसके मन चाव, कोशिशें सफल करातीं।
लगे रहो अविराम, सभी निधि दौड़ी आतीं।
'ठकुरेला' कविराय, आलसी निज कर मलते।
पा लेते गंतव्य, सुधीजन चलते-चलते।।





तिनका-तिनका जोड़कर, बन जाता है नीड़।
अगर मिले नेत्तृत्व तो, ताकत बनती भीड़।।
ताकत बनती भीड़, नये इतिहास रचाती।
जग को दिया प्रकाश, मिले जब दीपक, बाती।।
'ठकुरेला' कविराय, ध्येय सुन्दर हो जिनका।
रचते श्रेष्ठ विधान, मिले सोना या तिनका।।




बढ़ता जाता जगत में, हर दिन उसका मान।
सदा कसौटी पर खरा, रहता जो इंसान।।
रहता जो इंसान, मोद सबके मन भरता।
रखे न मन में लोभ, न अनुचित बातें करता।
'ठकुरेला' कविराय, कीर्ति-किरणों पर चढ़ता।
बनकर जो निष्काम, पराये हित में बढ़ता।।


- त्रिलोक सिंह ठकुरेला
 
रचनाकार परिचय
त्रिलोक सिंह ठकुरेला

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