प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

स्मृति

ऐ 'प्राण' कितना खाली-सा लगता है आसपास
जब आदमी को छोड़ के जाती है ज़िंदगी



कुछ समय पहले एक मेल के ज़रिए ग़ज़ल पर अच्छा कार्य करने के लिए प्रशंसा तथा शुभकामनाओं के साथ चयन में सावधानी रखने की बहुत अच्छी सलाह देकर 'ग़ज़ल-एप' और 'हस्ताक्षर' में प्रकाशनार्थ अपनी कुछ ग़ज़लें भेजीं लेकिन उनके प्रकाशन से पूर्व ही वे दुनिया को अलविदा कह गये। स्व. प्राण शर्मा जी का नाम कई सालों से सुनता आ था और उनसे संपर्क करने की कई बार कोशिश भी की, लेकिन सफल नहीं हो पाया। जब उनकी ग़ज़लें प्रकाशन के लिए आयीं थीं तब यह नहीं सोचा था कि इन्हें 'स्मृति' स्तम्भ में प्रकाशित करना पड़ेगा। लेकिन विधि के विधान के आगे किसका ज़ोर चला है! पिछले दिनों उनके कोमा में जाने और फिर दुनिया से रुखसती की ख़बर आयी। यह बुरी ख़बर अपने समय से बहुत पहले आयी लेकिन समय किसी की सुनता भी कहाँ है!
लंदन (ब्रिटेन) में रहते हुए लगातार ग़ज़ल लेखन और प्रशिक्षण में सक्रिय प्राण शर्मा जी ने अंतिम समय तक ग़ज़ल के उत्थान के लिए अपने आपको समर्पित रखा। ग़ज़ल-जगत उनके प्रति हमेशा आभारी रहेगा।

आपके यह शब्द हमेशा प्रेरणा देंगे-
"आप सराहनीय ही नहीं बल्कि उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। मेरी शुभ कामनाएँ आपके साथ हैं।"


- के. पी. अनमोल

 

ईश्वर उन्हें अपने चरणों में जगह दे। हस्ताक्षर परिवार की ओर से प्राण शर्मा जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।




ग़ज़ल-

ज़रा ये सोच मेरे दोस्त दुश्मनी क्या है
दिलों में फूट जो डाले वो दोस्ती क्या है

हज़ार बार ही उलझा हूँ इसके बारे में
कोई तो मुझको बताये कि ज़िंदगी क्या है

ख़ुदा की बंदगी करना चलो ज़रूरी सही
मगर इंसान की ऐ दोस्त! बंदगी क्या है

ये माना, आदमी की ज़ात है मगर तूने
कभी तो जाना ये होता कि आदमी क्या है

कभी तो बेबसी से सामना तेरा होता
तुझे भी कुछ पता चलता कि बेबसी क्या है

किसी अमीर से पूछा तो तुमने क्या पूछा
किसी ग़रीब से पूछो कि ज़िंदगी क्या है

नज़र में आदमी अपनी नवाब जैसा सही
नज़र में आदमी की 'प्राण' आदमी क्या है


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ग़ज़ल-

सीने में ऐसा भी कोई अरमान होता है
जैसे कि बाँध तोड़ता तूफ़ान होता है

उड़ते हैं इक क़तार में वे किस कमाल से
दिल सारसों को देख के हैरान होता है

मौक़ा मिले तो आप कभी जा के देखिये
घर में फ़क़ीर के सभी का मान होता है

हर ओर रौनकें हों ज़रूरी तो ये नहीं
फूलों भरा बगीचा भी सुनसान होता है

अपनी ही कहने वाला ये माने न माने पर
सच तो यही है वो बड़ा नादान होता है

पलड़ा हमेशा उसका ही भारी है दोस्तो!
यारों के बीच शख़्स जो धनवान होता है

ऐ 'प्राण' नेक बंदों की जग में कमी नहीं
इन्सान में भी देव या भगवान होता है


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ग़ज़ल-

घर में हर इक के धूम मचाती है ज़िंदगी
जब प्यारा-प्यारा रूप दिखाती है ज़िंदगी

रोती है कभी हँसती-हँसाती है ज़िंदगी
क्या-क्या तमाशे जग को दिखाती है ज़िंदगी

कोई भले ही कोसे उसे दुःख में बार-बार
हर शख़्स को ऐ दोस्तो! भाती है ज़िंदगी

दुःख का पहाड़ उस पे न टूटे ऐ राम जी
इन्सां की जान रोज़ ही खाती है ज़िंदगी

उस प्यार से ही उसको तू रखना सम्भाल के
जिस प्यार से जहान में आती है ज़िंदगी

ऐ 'प्राण' कितना खाली-सा लगता है आसपास
जब आदमी को छोड़ के जाती है ज़िंदगी


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ग़ज़ल-

चमचमाते, मीठे-मीठे संतरों जैसे
काश, होते घर सभी सुथरे घरों जैसे

भीड़ में भी वे अलग से दिखते हैं सबको
लोग होते हैं बहुत से तरुवरों जैसे

काश, सबके तन-बदन होते ज़माने में
तितलियों के रेशमी, सुन्दर परों जैसे

ज़िंदगी में खाना-पीना गर नहीं अच्छा
ढह ही जाते हैं बदन कच्चे घरों जैसे

पत्थरों को तोड़ना आसां नहीं होता
हाथ बन जाते हैं यारो पत्थरों जैसे

छोड़ते हैं वे हमेशा प्यार की ठण्डक
बसते हैं जो हर किसी में निर्झरों जैसे

वक़्त क्यों बीते सभी का नित उदासी में
मीत कुछ तो चाहिए ही मसख़रों जैसे

दूरियाँ ऐ 'प्राण' तू उससे सदा रखना
जो हमेशा काटते हैं मच्छरों जैसे


- प्राण शर्मा
 
रचनाकार परिचय
प्राण शर्मा

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