प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते-स्वर

कविता

कविता तुम न होती तो
वेदना कैसे कही जाती अंतिम मर्म तक
प्रेम की सारी अन्तर्ध्वनियाँ
कैसे झंकृत होती अनंत तक
कौन थामता उद्वगों को
कौन चित्र खींचता स्मृतियों के
कौन स्पर्श करता अन्तर्मन की
सारी अनकही तरंगों को
कौन देता शब्द अविराम
स्पन्दनों को

कैसे बँधती
संसार की सारी संवेदनाएँ
एक ही सूत्र में
कैसे कही जाती
पक्षियों, नदियों, समुद्रों, झरनों,
फूलों और आकाश की ध्वनियाँ
चाँद सौन्दर्य और प्रेम की
उपमाओं में उतर कर इतरा न पाता
कैसे चित्रित होतीं उसकी समस्त
कलाएँ तुम बिन

कैसे बँध पाती चंचल अपरिमेय
मन की चितवन
तुमसे ही है दुःख तरल
विरह प्रतीक अद्वैत का
तुम बिन न बरसे होते
कालिदास के अनंत मेघ
शांत न होता मीरा का
अधीर प्रिय विलीन चित्

नीर भरी दुःख की वह बदली
भरी रह जाती
पपीहे का अन्तरतर गान
प्रकृति में लीन होकर रह जाता


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तारे

देखा है बँटते
देह और रूह
जीजिविषा और जज़्बात
भावना और कर्तव्य
टुकड़ों के क्रम में
मरता है जीवन्त मन
अवसान से पहले
अदृश्य आग में जलता
मसान से पहले
अदम्य इच्छाओं भरी रूह
अपनी दुनिया में स्वतंत्र
फिर भी होती
मन के दुःख की  
ख़बर नहीं लेती
कभी नहीं दुलारती
भले ही बिना संदर्भ भी
किसी नमी में कभी
आँखों से बह जाती हो
शेष रह जाती यंत्र चलित देह,
बंधन की विवशता
सामंजस्य की परवशता
ऐसे ही जीवन असंख्य
बँट कर जीते देखा है
ठंडी हँसी में भस्म
होते देखा है
तारों की छाँव में
मृतप्राय: तन त्याग
रूह संग स्वप्निल
संसार मे संवरते देखा है
मेघ भरे आकाश में
चाँद की कतरन
तलाशते देखा है
तारों की बारात में
नव प्रभात के लिए
व्याकुल देखा है
जीवन नभ के अनगिनत
टूटते तारों में
ध्रुव-सी संभावना को
पलते देखा है।


- अमृता जायसवाल
 
रचनाकार परिचय
अमृता जायसवाल

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