प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

जिसे हर शय में रहमत ही छिपी मालूम होती है
अमावस में भी उसको चांदनी मालूम होती है

चलें इस ओर या उस ओर, पहुंचेंगे उसी दर पर
हर इक रस्ता हमें तेरी गली मालूम होती है

घुटन की हो चुकी आदत हवाएँ सह न पायेंगे
किसी कमरे में इक खिड़की खुली मालूम होती है

उसे हम सबने मिलकर मार डाला है हक़ीक़त में
भले क़ानून को वो ख़ुदकुशी मालूम होती है

मुहर्रम हो कि होली हो तुम्हारे बिन सभी यकसां
न कोई ग़म न अब कोई ख़ुशी मालूम होती है

किसी हीरे को देखा था 'अनिल' ने इक ज़माने में
अभी तक आँख में कुछ किरकिरी मालूम होती है


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ग़ज़ल-

लोग कहते हैं हर पल नया देखिये
आपको छोड़कर और क्या देखिये

उसके रहमो-करम का मज़ा देखिये
जो न माँगा था वो भी मिला देखिये

ज़िंदगी भर रहेंगे उरूज़ो-जवाल
सिर्फ़ मालिक की उसमें रज़ा देखिये

कुछ न पाया किसी ने गँवाये बिना
भूलिये क्या गया, क्या मिला देखिये

आगे बढ़ना ज़रूरी है माना मगर
पीछे मुड़कर कभी तो ज़रा देखिये

इस तरह से इबादत भी हो जायेगी
अपनी जानिब से सबका भला देखिये

कौन हैं आप कहने को अच्छा-बुरा
हर बशर में 'अनिल' बस ख़ुदा देखिये


- अनिल कुलश्रेष्ठ
 
रचनाकार परिचय
अनिल कुलश्रेष्ठ

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ग़ज़ल-गाँव (1)