प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

एक बेवा की ज़िन्दगी हूँ मैं

सूलियों पर टंगी हुई हूँ मैं,
एक बेवा की ज़िन्दगी हूँ मैं।

सारी दुनिया है एक सूना वन,
साथ है मेरे, मेरा सूनापन।
मेरे अन्दर भी कोई झाँके तो,
कितना टूटा हुआ है मेरा मन।
सिर्फ़ काँटों पे ही चली हूँ मैं।
एक बेवा की ज़िन्दगी हूँ मैं।।

कोई उम्मीद है न कोई क़रार,
कुफ़्र जैसा है गर करूँ सिंगार।
अपशकुन मुझको समझा जाता है,
कोई करता नहीं है मुझको प्यार।
हू-ब-हू इक चिता जली हूँ मैं।
एक बेवा की ज़िन्दगी हूँ मैं।।

कोई वारिस न है कोई वाली,
सबने मुझको समझ लिया ख़ाली।
इज़्ज़तो-एहतराम कुछ भी नहीं,
जिसने डाली, बुरी नज़र डाली।
सब हैं भँवरे तो इक कली हूँ मैं।
एक बेवा की ज़िन्दगी हूँ मैं।।

हो गया दश्त अब चमन मेरा,
जिसको देखो करे दमन मेरा।
आड़ में वैसे भी मुरव्वत के,
लोग छू लेते हैं बदन मेरा।
कितनी सस्ती अब हो गई हूँ मैं।
एक बेवा की ज़िन्दगी हूँ मैं।।

मेरा वारिस मरा है सोचो तो,
मैंने क्या खो दिया है सोचो तो।
क्या मैं सोचूँ कि जब मेरे नज़दीक,
ज़िन्दगी मसअला है सोचो तो।
मर गई फिर भी जी रही हूँ मैं।
एक बेवा की ज़िन्दगी हूँ मैं।।


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इश्क़ हूँ मैं

इश्क़ हूँ मैं मुझे लोगों ने है बदनाम किया,
मेरे म'आनी को बदल रुस्वा सरे-आम किया।

कह के लैला कभी गलियों से गुज़ारा मुझको,
क़ैस के नाम पे पत्थर से नवाज़ा मुझको।
तर्ज़ पे सोनी की दरिया में मुझे ग़र्क किया,
घर की इज्ज़त के लिए सबने मुझे तर्क़ किया।
इश्क पे ज़ुल्म हर इक दौर में ढाते क्यों हो!
जब बुरी शह हूँ तो फिर दिल में बसाते क्यों हो!
इश्क़ हूँ मैं मुझे लोगों ने है बदनाम किया,
मेरे म'आनी को बदल रुस्वा सरे-आम किया।
 
कोई भी दौर हो दुश्मन ये सियासत ही रही,
मुझको रुस्वा भी किया मेरी ज़रूरत भी रही।
मुझपे बाज़ारों में ऊँगली तो उठा आए हो,
आ के तन्हाई में फिर किसलिए पछताए हो!
वक़्त ने जब तुम्हें रहज़न की तरह लूटा है,
तुमने कोठों पे तवायफ़ के मुझे ढूँढा है।
इश्क़ हूँ मैं मुझे लोगों ने है बदनाम किया,
मेरे म'आनी को बदल रुस्वा सरे-आम किया।

साथ आदम के मैं जन्नत से ज़मीं पर आया,
बुद्ध-महावीर ने मुझको ही तो था अपनाया।
राम और कृष्ण ने पैकर में मुझे ढाला है,
फिर मोहम्मद औ' अली ने भी मुझे पाला है।
इक मसीहा हुआ नाम उसका हुसैन इब्ने-अली,
ज़िन्दगी जिसकी बदौलत मेरी आगे को चली।
इश्क़ हूँ मैं मुझे लोगों ने है बदनाम किया,
मेरे म'आनी को बदल रुस्वा सरे-आम किया।

दो दिलों का ही क्यों अरमान बनाकर छोड़ा,
क्यों नहीं तुमने मुझे रूह से लाकर जोड़ा!
छोड़ के मुझको बताओ तो किधर जाओगे,
मुझको पाओगे तो भगवान को पा जाओगे।
मेरी हर बात का अन्दाज़ जुदा मिलता है,
इक वसीला हूँ मैं जिससे कि ख़ुदा मिलता है।
इश्क़ हूँ मैं मुझे लोगों ने है बदनाम किया,
मेरे म'आनी को बदल रुस्वा सरे-आम किया।
 
आस्मां मैं हूँ ज़मीं मैं हूँ सितारा हूँ मैं,
बहती नदिया का मचलता हुआ धारा हूँ मैं।
दोस्त की दोस्ती और भाई की शफ़क़त मैं हूँ,
ज़िन्दा रहने के लिए ख़ास ज़रूरत मैं हूँ।
प्यार दोगे किसी बच्चे को तो खिल जाऊँगा,
माँ के जब पाँव दबाओगे तो मिल जाऊँगा।
इश्क़ हूँ मैं मुझे लोगों ने है बदनाम किया,
मेरे म'आनी को बदल रुस्वा सरे-आम किया।।


- फ़ानी जोधपुरी
 
रचनाकार परिचय
फ़ानी जोधपुरी

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