प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ख़ास मुलाक़ात
लेखन हमें चुनता है, न कि हम लेखन को- नीलम कुलश्रेष्ठ 
 
 
नीलम कुलश्रेष्ठ जी का मुस्कुराता चेहरा, मृदुल, संवेदनशील स्वभाव तो अपनी ओर आकर्षित करता ही है, साथ ही उनकी स्पष्टवादिता भी मन मोह लेती है। स्त्री विमर्श पर उन्होंने कई पुस्तकें संपादित की हैं तथा विविध साहित्यिक विधाओं पर भी उनकी लेखनी ख़ूब चली है। वे अलग-अलग राज्यों की संस्कृति से होकर गुजरती रहीं हैं और अपनी रचनाओं के माध्यम से वहाँ की विशेषताओं को हम तक पहुँचाती आई हैं। आप स्त्री स्वतंत्रता की पक्षधर हैं पर उसके नैतिक एवं पारिवारिक कर्त्तव्यों की ओर इंगित करना नहीं भूलतीं। समाज में बढ़ती विद्रूपताओं और विसंगतियों पर बेझिझक, खुलकर लिखती और बोलती आई हैं। 
उनके अहमदाबाद प्रवास के दौरान बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी, नीलम जी से 'हस्ताक्षर' की संस्थापक एवं संपादक प्रीति 'अज्ञात' की लम्बी बातचीत के अंश, हमारे पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हैं -
 
प्रीति 'अज्ञात' -  कुछ अपने बारे में कहें। आप किस तरह के परिवेश में पली-बढ़ीं? बचपन, शिक्षा, वातावरण, परिवार के बारे में हमारे पाठकों को जानकारी दें।
नीलम कुलश्रेष्ठ - मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के एक सुशिक्षित परिवार में हुआ। आज जो बच्चे छोटे परिवारों में जीवन का आनंद ले रहे हैं, मेरे समकालीनों को वो नसीब नहीं था। हम बहुत ठाठ-बाट से पल रहे थे।  मेरा सिर्फ़ एक भाई था। पापा बैंक मेनेजर व  मम्मी प्रधानाध्यापिका। आपको एक दिलचस्प बात बताऊँ कि हमारे नानाजी ने अलीगढ़ के घर के हॉल में सन 1950 के लगभग अपने बेटों के नाम के साथ अपनी सात बेटियों के नाम के पत्थर जड़वाए थे और मैं अपने घर आगरा में अपने भाई, अपने नौ वर्ष छोटे  मौसी के लड़के राहुल जो शेरवुड कॉलेज नैनीताल में पढ़ रहा था व अपने किरायेदार अंकल उपाध्यायजी के भतीजे जितेंद्र के साथ लड़-लड़कर बड़ी हुई थी। राहुल का चयन हुआ विदेशी प्रशासनिक सेवाओं  के लिए व जितेंद्र चुना गया वन्यजीवन प्रशासनिक सेवाओं के लिए यानि कि मैं  दो आई.एफ़.एस .के साथ लड़कर,बहस करके बड़ी हुई। आप ये कह सकतीं हैं कि भयंकर रूप से पुरुषासित प्रदेश में काम करने के लिए नियति ने मुझे तैयार कर दिया था क्योंकि कितनी बहसें, कितनी  राष्ट्रीय स्तर की लड़ाइयाँ मेरी राह देख रहीं थीं।
सच मानिये मुझे अपने जीवन की इन विशिष्टताओं का अहसास भी नहीं था। जब मैं सन 1998 के आसपास  स्त्री विमर्श की अपनी पुस्तक की भूमिका लिखने बैठी तो अहसास हुआ कि अरे! ये बातें तो औरों के जीवन से बेहद अलग हैं। मेरा प्रथम नारीवादी स्कूल तो मेरी मौसियां थीं जो उच्च पदों पर काम करके स्त्री होने के कारण विभिन्न मुसीबतों से लड़ रहीं थीं। गुलज़ार साहब ने कहा है कि "मुस्कराने के क़र्ज़ उतारने होंगे" तो उस चौबीस वर्ष के बेहद लाड़- प्यार से भरे सुरक्षित जीवन के बाद में क़र्ज़ चुकाने पड़े जिनमें से  एक बहुत बड़ा कारण था, हाथ में हिंदी की पुरुष व्यवस्था पर आग उगलती कलम।
 
प्रीति 'अज्ञात' - लेखन की ओर आपका झुकाव कब से हुआ एवं इसे सक्रियता कब मिली ? उन दिनों इसके प्रति सबका नज़रिया अलग ही था, कैरियर बनाने जैसा तो बिल्कुल ही नहीं! आपका अनुभव कैसा रहा?
नीलम कुलश्रेष्ठ - 'धर्मयुग' में प्रतिष्ठित महिलाओं के संस्मरण का एक स्तम्भ आता था, 'जब मैं सोलह साल की थी' तो उसमें कमला देवी चट्टोपाध्याय ने लिख दिया कि आजकल की लड़कियों में कुछ कर गुज़रने के जोश की कमी है। मैं  इसी बरस  से गुज़र रही थी इसलिए जोश में 'धर्मयुग' संपादक को पत्र लिख मारा। फिर इसी विषय पर एक अख़बार ने लेख मंगवाया। मेरी पहली कहानी 'कैक्टस! प्यासे नहीं रहो', कॉलेज पत्रिका में प्रकाशित होकर चर्चित भी हुई। 'कथादेश' के सम्पादक  श्री हरिनारायण जी ने दस बरस  बाद मुझे बताया था कि इसे किसी ने चुराकर आकाशवाणी से प्रसारित करवाया व बाद में इसी की पत्रिका में प्रकाशित भी हुई।
उन दिनों मेरी मित्र नौकरी के ख़्वाब  देखतीं थीं जबकि मैं नौकरी करतीं महिलायें घर में देख रही थी और कुछ बेहद अलग हटकर करना चाहती थी क्योंकि डॉक्टर, प्रोफ़ेसर, अध्यापिका व प्राचार्या मेरे घर में ही थीं।  शादी से पहले मैं हल्की  फुल्की पत्रकारिता करने लगी थी। मेरा दृढ़ संकल्प था कि मेरे दोनों बेटे आया के हाथों नहीं पलेंगे। उन दिनों 'मनोरमा' से सुप्रसिद्ध लेखक अमरकांत जी बिना जान पहचान के बहुत प्रोत्साहित करने लगे। कहानियाँ  प्रकाशित हुईं तो सन 1974 में कोलकत्ता की आनंद बाज़ार की पत्रिका 'यूथ टाइम्स' ने अपने कॉलम 'यंग न्यूज़ मेकर' के लिए इंटरव्यु लिया। चौबीस वर्ष में दिल्ली के लेखिका संघ से अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता का द्वितीय पुरस्कार डॉ कर्णसिंह जी हाथों मिला। जब मैं बड़ौदा शादी के बाद आई तो गुजरात की सांस्कृतिक व  सामजिक आत्मा बेहद आकर्षित करने लगी। मैंने निर्णय लिया कि मैं इस रोल मॉडल प्रदेश के विषय में लिखकर सारे भारत को जानकारी दूंगी। मेरा ऑबसेशन  बन गया था और रुकता, लिखता  सिलसिला चल निकला। उन दिनों 'थ्री ईडियट्स' का ज़माना नहीं था। मेरे पति के मित्र व कुछ लोग मज़ाक उड़ाते कि केमिस्ट्री में एम.एस सी. करने के बाद भी हिंदी लेखन कर रहीं हैं।
'धर्मयुग' जैसी पत्रिकाएँ लम्बे सर्वे प्रकाशित करके बंद हो चुकीं थीं। मेरे अपने जुनून के लिए व्यावसायिक पत्रिकाओं में जैसे दिल्ली प्रेस के लिए लिखना उतना ही ज़रूरी था जितना कि साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए। अपनी कठिनाइयों व स्त्री संस्थाओं के प्रभाव  के कारण मैं स्त्री विमर्श की लेखिका बनती जा रही थी इसलिए मेरी टकराहट राजेंद्र यादव जी व दिल्ली प्रेस के परेशनाथ जी से होनी थी। मेरे लिए वे बेहद ही कठिन दिन थे क्योंकि कोई समझ नहीं पा रहा था कि  गुजरात में ऐसे भी समाज को समर्पित लोग हैं या संस्थाएँ हैं, उसपर स्त्री विमर्श लेखन से नाराज़गी।और जब एक फ़ास्ट पत्रकारनुमा छवि में कैद होती जा रही थी तब मेरे इकलौते भाई हेमंत ने मुझे मेरे नाम के विज़िटिंग कार्ड प्रिंट करवा कर दिये कि तुम इंटरव्यु लेने जाती हो तो यह ज़रूरी है। आप इस बात से मेरे परिवार का शिक्षित वातावरण समझ सकतीं  हैं कि बरसों तक मेरा भाई ही मुझे विज़िटिंग कार्ड बनवाकर देता रहा।
 
प्रीति 'अज्ञात' - लेखक न केवल तरह-तरह के व्यक्तियों से मिलता ही है बल्कि उन पर लिखता भी है। तमाम विधाओं पर लेखन के साथ-साथ उसके कुछ निजी संस्मरण भी जमा होते जाते हैं। आपके पास भी ऐसे कई किस्से होंगे?
नीलम कुलश्रेष्ठ -लेखन और संस्मरण की मेरे पास भरमार है, कहाँ तक गिनाऊँ? उन दिनों बड़ौदा जैसे शहर में भी महिला पत्रकार होना एक अजीब बात थी। लोग पूछते,'आर यू मैरिड?' थोड़ा खुद भी डरी-सशंकित सी रहती थी इसलिए जल्दी से कहती, 'यस,वेरी वेरी मैरिड, आई गॉट टू संस।' यानि कि अम्मा टाइप भी हूँ।  
सन 1985 की बात है पति मृदुल जी ने मुझे आचार्य रजनीश की चेली आनंद माँ शीला, जो कि जर्मन जेल में थी;  के माता पिता का धर्मयुग के लिए इंटरव्यू  लेने उनके गाँव अकेले नहीं जाने दिया। वह बड़ा क्राइम थ्रिलर एक्सपीरिएंस था क्योंकि जिस स्थानीय अखबार से  शीला का पता मिला था, उसके सम्पादक ने कह दिया था कि आपको कुछ जानकारी नहीं मिलेंगे क्योंकि उनके पिता किसी पत्रकार से बात नहीं करते। दबी ढकी जानकारी ये भी मिली कि वे घर में वे कपड़े  पहनने का कष्ट भी नहीं करते। ख़ैर, उस दिन ग़नीमत ये हुई कि वे कपड़े पहने हुए थे।  उन्हें शीला के काले कारनामों की इतनी जानकारी नहीं थी इसलिए 'धर्मयुग' का नाम सुनकर वे प्रसन्न हो जानकारी व फोटोज़ भी देते रहे। शीला की माँ ने भोजन का आग्रह किया तो मैंने मना कर दिया कि मैं आपके घर का नमक नहीं खाऊँगी क्योंकि शीला के विरुद्ध लिखना है। इस सर्वे के प्रकाशन के बाद उनकी भावनाएं आहत होनी ही थीं। ये बात इसलिए लिख रहीं हूँ कि मैंने पूरी कोशिश की है कि हर बात में ईमानदार रहूँ।  
एक बार मुझे अपनी कलम के ताकतवर होने का अहसास हुआ। मेरे पति  रेलवे विभाग में काम करते थे। हुआ ये कि बड़ौदा के रेलवे स्टाफ़  कॉलेज में देश भर के रेलवे ज़ोन्स के जी एम की मीटिंग्स थी। उनके साथ उनकी पत्नियां भी आईं हुईं थी। उन दिनों मैं रेलवे महिला समिति के विषय में लिख रही थी तो मेरे लिए सुनहरा मौक़ा था कि रेलवे बोर्ड के चेयरमेन की पत्नी का इंटरव्यू इसमें शामिल करूँ क्योंकि वे अखिल भारतीय स्तर पर इन समितियों की अध्यक्ष होतीं हैं। रेलवे स्टाफ़ कॉलेज की प्रिंसिपल के घर सब जी एम वाइव्स का लंच  था। मैडम ने मुझे वहीं मिलने को कहा। मैं अपनी कलम डायरी लिए जा पहुँची। तब उम्र मेरी कम थी इतनी जी एम वाइव्स को देखकर मेरे अंदर ही अंदर पसीने छूट रहे थे। अध्यक्षा महोदया का इंटरव्यू लेने के बाद  मुझे लगभग चार पांच जी एम वाइव्स ने घेर लिया कि "आप ये भी लिखिए कि हम अपनी ज़ोन में क्या क्या करवाते हैं।" उन लोगों द्वारा दी जानकारी ख़त्म ही नहीं हो रही थी। तब हमारे मंडल प्रबंधक की पत्नी ने ही विराम लगाया, "प्लीज़ नीलम! अब बस करो।" मैं अपनी हँसी दबाती वहां से चल दी थी। 
 
प्रीति 'अज्ञात' - आपके लेखकीय जीवन का लम्बा समय गुजरात में व्यतीत हुआ है। एक अहिन्दी भाषी प्रदेश में काम कर पाना कितना आसान था?
नीलम कुलश्रेष्ठ - गुजरात में  मेरा काम करना इसलिये संभव हुआ क्योंकि मुझे लोगों का अपार सहयोग मिलता चला गया। तीन चार वर्ष तक भी ऐसे लेख प्रकशित नहीं होते थे लेकिन मेरी गुजरात की निरंतर शोधपरक यात्रा जारी रहती। मैं  लिखकर रखती जाती थी। बहुत वर्षों बाद ये सब पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगा। इन हर्डल रेस को पार करके मैंने आत्म संतोष पाया। मेरे ख्याल से दो-चार ही मेरे जैसे लेखक होंगे, जिन्हें भारत के इतने सारे अलग-अलग क्षेत्र में काम करने वाले अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त व्यक्तित्व से मिलने का मौका मिला हो। तभी मैं बड़ौदा को 'सिटी ऑफ़ इंटरनेशनल सोल्स' कहतीं हूँ। आप चाहे कितनी कोशिश कर लीजिये, अंधकार को प्रकाश से अलग नहीं कर सकते। हुआ ये कि मानवता वादी विचारों को खोजने निकली और मुठभेड़ हो गई. अँधेरे के उपासकों से। ये बातें लेखन में तो आ ही गईं हैं। मेरा लेखन निम्न वर्ग से लेकर उच्च वर्ग के पात्रों से जुड़ा हुआ है।
         
प्रीति 'अज्ञात' - आपकी बहुभाषी संस्था 'अस्मिता' की नींव कैसे पड़ी? इसकी कार्य-प्रणाली एवं उद्देश्यों के बारे में भी कहिए।
नीलम कुलश्रेष्ठ  -. एक महिला साहित्यिक मंच बड़ौदा में हो ये कल्पना लेकर सन 1990 में डॉ. रचना निगम अपनी एक मित्र के साथ मेरे पास आईं थीं क्योंकि गुजरात से मेरा ही नाम भारत में परिचित था। इस तरह हम तीनों ने इसकी स्थापना  की लेकिन दूसरी महिला ने इसे एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर लेकर वहाँ के एक संगठन की उपशाखा बना  दिया। तब मेरे नेतृत्व में वहाँ के अध्यक्ष को पत्र लिखकर अस्मिता को मुक्त करवाया गया। फिर मेरे सुझाव पर इसे बहुभाषी  बनाया गया। बाद में इसका नाम 'अस्मिता' रखा गया। इसका मुख्य उद्देश्य था, स्त्रियों की रचनाओं का प्रकाशन व उन्हें प्रोत्साहन देना। बड़ौदा में अम्ब्रेला एन.जी.ओ. है 'यूनाइटेड वे ऑफ़ बड़ौदा' जो कि अच्छा काम करने वाली संस्थाओं को आंशिक आर्थिक सहायता देती है। मैंने सन 1995 के आस पास अस्मिता को इसका सदस्य बनाया जिससे कारण हम लोगों ने वार्षिक कार्यक्रम करने की योजना बनाई। कल्पना कीजिये, सन 1995 में एक कवयित्री के नेतृत्व में वार्षिक कार्यक्रम में कवयित्री सम्मेलन आयोजित किया गया। वे कवयित्री मंच पर जाने से पहले तक कहतीं रहीं कि नीलम जी आप बहुत बड़ी गलती कर रहीं हैं, लोग मज़ाक उड़ायेंगे लेकिन हम लोग उन्नीस बरस तक लगातार ये कार्यक्रम करते रहे। नि:संदेह हम लोग साहित्य के प्रति चेतना जगाने के लिए छात्रों व गृहणियों के लिए प्रतियोगिता आयोजित करते थे। इसमें 'गृहशोभा' गुजराती, अहमदाबाद सेवा की 'आकाशगंगा' तथा कुछ और संस्थाओं ने साथ दिया।
बड़ौदा में गायकवाड़ राजकीय परिवार का बनवाया एक परिसर है 'अभिव्यक्ति',जहाँ किसी भी क्षेत्र के कलाकार मिल सकतें हैं, कला प्रदर्शनी लगा सकतें हैं। अहमदाबाद में गाँधी जी ने गुजरात साहित्य परिषद की स्थापना करके इसकी  एक इमारत बनवाई थी जिसके लिए रघुवीर चौधरी ने बहुत सहयोग दिया था। अस्मिता को इन दोनों शहरों में नि:शुल्क हर माह गोष्ठी करने की सुविधा मिली इसलिए मेरा इन लोगों को तहेदिल से आभार।
बड़ौदा की राजनीति जो मैंने झेली उसका सुखद फल मुझे अहमदाबाद में डॉ. रंजना अरगड़े व डॉ .मीरा रामनिवास के साथ अस्मिता की  स्थापना से मिला। मैं मुंबई होती हुई पूना आ गईं हूँ फिर भी अस्मिता के संपर्क में हूँ। मेरे लगाए पौधे को डॉ. सुधा श्रीवास्तव,डॉ. प्रणव भारती, निशा चन्द्रा व मल्लिका मुखर्जी सुचारू रूप से चला रहे हैं।        
       
प्रीति 'अज्ञात' -आपने कई 'साझा-संग्रहों' का संपादन किया है। इनके बारे में आपकी क्या राय है? प्रकाशक के अलावा इससे किसे लाभ मिलता है?
नीलम कुलश्रेष्ठ - ये सच है यदि अस्मिता न होती तो मेरे द्वारा सम्पादित पुस्तकें नहीं होतीं व गुजरात की प्रतिभावान रचनाकार इतनी जगह पुरस्कृत नहीं होतीं। मैं अक्सर अस्मिता की गोष्ठियों में हँसा करती थी कि ये साहित्यिक किट्टी पार्टी है लेकिन जब सदस्याएँ कविता पाठ करतीं तो कुछ कविताओं को सुनकर मैं चौंकने लगी। मुझे समझ में आने लगा, ये चौदह -पंद्रह महिलायें स्त्री पीड़ा ,यहाँ तक कि पौराणिक चरित्रों का जो  विश्लेषण प्रस्तुत कर रहीं  हैं, ये करोड़ों भारतीय स्त्रियों के मन का प्रतिनिधित्व है। मैंने रूपरेखा बनाई कि एक थीम कवयित्री समेलन आयोजित किया जाये 'प्राचीन पौराणिक स्त्री चरित्र; आधुनिक स्त्री के दृष्टिकोण से', इस प्रस्ताव का विरोध भी हुआ लेकिन आज यही भावना,  धर्म के स्त्री शोषण व पौराणिक चरित्रों के आज की  विचारधारा की सम्पादित पुस्तकों के कारण एक साहित्यिक आंदोलन के रूप में प्रसिद्ध हो चुकी है। प्रथम पुस्तक 'धर्म की बेड़ियाँ खोल रही है औरत' के चार संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। मैंने दो  कहानी संग्रह सम्पादित किये हैं। 'रिले रेस' की समीक्षा 'नया ज्ञानोदय' के मई अंक में प्रकाशित होने वाली है।
इनसे प्रकाशकों को फ़ायदा होता है। जब मैंने प्रकाशक महोदय को  अपने सम्पादित काव्य संग्रह 'घर की  मुँडेर से कूकती कलम' की  पांण्डुलिपि प्रेषित की, उन्होंने कहा कि "बस मैं  इसकी कुछ प्रति ही आपको दूँगा।" तब भी मुम्बई में गहरे मनोयोग से इस पुस्तक के सम्पादन में जुटी रही। मेरे ख़्याल से कुछ विशिष्ट, अर्थपूर्ण व समाज  को स्त्री जीवन के यथार्थ बताने की ललक मुझे पुस्तक संपादन करने के लिए प्रेरित करती रही है। 
 
प्रीति 'अज्ञात' - आप किस विधा में अपना लेखन सहज पाती हैं? लेखन से सम्बंधित परेशानियों का भी ज़िक्र करें। 
नीलम कुलश्रेष्ठ -  मैं मूलरूप से कहानी लेखिका हूँ, जिसके लिए  मन का एकाग्र होना आवश्यक है। हमें घंटों एकाग्र होकर बैठना पड़ता है। ज़िम्मेदारियों से एकाग्रता न मिल रही हो तो कोई सर्वे, रिपोर्ताज़, इंटरव्यू लिखा जा सकता है। ये तय है कि लेखन हमें चुनता है, न कि हम लेखन को; जिसे आप दिमाग़ में क्लिक होना कह सकतीं हैं। कभी छोटी  घटना भी क्लिक हो जाती है तो तुरंत कहानी बन जाती है। कभी बहुत बड़ा दुःख या घटना मन में चिपकी चलती रहती है और वर्षों बाद कहानी  लिखी जाती है। कभी कोई समाचार, किसी विशिष्ट व्यक्तित्व की जानकारी पत्रकारिता को प्रेरित करती है। एक समय में व्यंग्य लिखे उसके बाद लिख नहीं पा रही। गद्य की किसी भी विधा में अपने को सहज पातीं हूँ। मैं जब भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार  प्राप्त श्री रघुवीर चौधरी जी को अपनी गुजरात सम्बन्धी पुस्तक भेंट करने गई तो उन्होंने उसमें इंटरव्यू  देखकर कटाक्ष किया, "ऐसा काम साहित्यकार नहीं करते।" वे वरिष्ठ हैं इसलिए उत्तर नहीं दे पाई लेकिन अपनी एक मित्र द्वारा अपनी बात कहलवाई, "जब साइंस पढ़े लोग साहित्य में आएँगे, तो वे प्रैक्टिकल करके भी लेखन करेंगे। 
 
प्रीति 'अज्ञात' - लेखिकाओं को क्या दुश्वारियां होती हैं ? स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी दुश्मन है, इस बात पर आपके क्या विचार हैं?
नीलम कुलश्रेष्ठ - मेरी तो दुश्वारियां बहुत सी थीं। आप घर बैठकर कविता लिखिए या कहानी; कोई ख़तरा नहीं है। लोग मेरी गुजरात को समझने की तड़प या ज़िद को समझ नहीं पाते थे। बीच में दो तीन वर्ष तक कैरियर भी ख़राब किया गया। उन दिनों पत्रकारिता करने से, मैं जो एक घरेलू स्त्री थी, अजीब सी फ़ास्ट इमेज में कैद होती जा रही थी। ये बात मेरी 'जर्नलिज़्म' व 'साक्षात्कार' कहानियों में भी आई है।
  
प्रीति 'अज्ञात' - मंचों और पुरस्कारों की सांठ-गाँठ पर आपका क्या कहना है? एक लेखक के जीवन में विभिन्न संस्थाओं द्वारा प्राप्त सम्मानों की कितनी अहमियत है? 
नीलम कुलश्रेष्ठ - मैंने सुना है कि पुरस्कारों के लिए सांठ-गाँठ की जाती हैं लेकिन एक कोने में  रहने के कारण मुझे इसका ख़ास अनुभव नहीं है। बस पहली स्त्री विमर्श पुस्तक के प्रकाशक महोदय ने फ़ोन पर मुझे भारतेन्दु हरिश्चचंद्र पुरस्कार की जानकारी दी व कहा कि यदि मैं पुरस्कार आपको दिलवा दूँ तो आप कितना कमीशन देंगी? मैं तो फ़ोन पर ही चिल्ला उठी कि आप लोग रॉयल्टी तो दस प्रतिशत देतें हैं और पुरस्कार में से कमीशन मांग रहे हैं।आप समझ सकतीं हैं, वे मेरी दूसरी पुस्तक क्यों प्रकाशित  करते? कोई भी संवेदनशील लेखक पुरस्कार प्राप्त करने के लिए नहीं लिखता लेकिन ये तय है विभिन्न मंचों या संस्थाओं से पुरस्कार प्राप्त करके उसे संतोष अवश्य मिलता है। पाठक भी पुरस्कृत लेखक को पढ़ना अधिक पसंद करते हैं। अधिकतर पुस्तक प्रकाशकों से सुखद अनुभव नहीं होते। अनुबंध पत्र फ़ाइल्स में मुँह चिढ़ाते रह जाते हैं क्योंकि उनमें  एक शर्त होती है कि कोई लेखक मुकदमा करना चाहे तो वह दिल्ली में कर सकता है। कुछ प्रकाशक अपना अनुबंध निबाहते भी हैं.
 प्रीति जी! मैंने बरसों लिखकर व कड़ी मेहनत  करके स्वर्गीय धर्मवीर भारती  जी, अमरकांत जी, श्री मनमोहन सरल जी, मनोहर श्याम जोशी जी, राजेंद्र यादव जी व बाद के संपादक नमिता सिंह जी, श्री संजय सहाय जी व लीलाधर मण्डलोई जी,हीरालाल नगर जी आदि की रचनाओं के लिए स्वीकृति पाने की कोशिश की है। इंतज़ार किया है कि बिना रूपये  दिए मेरी पुस्तकें प्रकाशित हों क्योंकि मैंने अपने से एक वायदा किया था कि न मैं सरकारी अनुदान लूंगी और न अपनी पुस्तक प्रकाशन  के लिए पैसा दूंगी। कसमें कभी सोद्देश्य तोड़नी पड़तीं हैं क्योंकि गुजरात का मेरा शोधपरक कार्य को प्रकाशित करने में प्रकाशक हिचक रहे थे इसलिए मैंने 'गुजरात; सहकारिता,समाज सेवा और संसाधन' व 'वडोदरा नी  नार' को अपने आर्थिक सहयोग से प्रकाशित  करवाया।
 
प्रीति 'अज्ञात' - आपके अनुसार 'स्त्री' होने के क्या मायने हैं?
नीलम कुलश्रेष्ठ - स्त्री होना सीधे ही एक जीव की उत्पत्ति से जुड़ा हुआ है। जब एक जीव का जन्म दिया जाता  है तो उसे इस पृथ्वी पर सेटल करने तक की एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी उठाने का नाम है --स्त्री। मेरे अपने अनुभव बड़ौदा,अहमदाबाद, मुम्बई व बैंगलोर के ये रहे हैं कि आज की आधुनिक स्त्रियां भी अपने कैरियर में ब्रेक लेकर थोड़े समय तक बच्चे पाल रहीं हैं। कुछ 'ब्लाइंड कैरियरिस्ट' तो हैं ही। मुम्बई में तो मेरे पड़ौस की एक डेंटिस्ट अपनी नन्ही बच्ची  के कारण ऑनलाइन केटरिंग बिज़नेस करने लगी थी। मैं भारत के परिप्रेक्ष्य में कह रहीं हूँ -कोई भी स्त्री कितनी भी ऊंचाई पर उड़ ले लेकिन  घर की ज़िम्मेदारियों का जो केन्द्र उससे संचालित है, उसका  स्थान दूसरा कोई नहीं ले सकता। आज सुविधाएं भी बहुत हैं। वह दोनों नावों पर सवार होकर सफ़लता से जी रही है। दूसरे स्त्री होने का अर्थ  है 'शिकार', हर स्तर  की स्त्री अपने हिसाब से लड़ रही है। तीसरा इसका अर्थ है 'रसोई',भारत में कुछ ज़्यादा ही। एक कहावत है कि "जब एक गाय झुण्ड छोड़कर चलती है तो शेरों  की नज़र में आती है", तो विशिष्ट स्त्रियों की जो परेशानियाँ हैं, आप उनसे ही सुनिए कि किस तरह उन्हें हासिल करने के लिए षड्यंत्र किये जातें हैं। समस्त विश्व में गर्ल्स ट्रेफ़िकिंग ज़ोरों पर है।
 
प्रीति 'अज्ञात' - बीते दिनों एक प्रतिष्ठित लेखिका पर रचना चोरी का आरोप लगा और सिद्ध भी हो गया, उसके बावजूद बड़े नाम आज भी उनके साथ खड़े हैं? साहित्य में ऐसी क्या मज़बूरी है?
नीलम कुलश्रेष्ठ - जिस लेखिका की तरफ़ आपने इशारा किया है। वह मेरे लिए एक शोध थीं कि इस तरह की लेखिका कहाँ तक पहुँचती है। उन्होंने अहमदाबाद में जिस तरह से अपने को प्रमोट करना शुरू किया उसके परिणाम तुरंत आने लगे। जो लेखिका स्त्री विमर्श की ए बी सी डी नहीं जानती, उसका जयपुर दूरदर्शन ने इसी विषय पर इण्टरव्यू लिया। उनकी बेहयाई ये थी कि अपने प्रथम कहानी संग्रह में जयपुर में बड़े-बड़े बैनर लगवा दिए थे 'चर्चित कथाकार', राजस्थान हिंदी अकादमी की बेहयाई ये रही कि अन्य वरिष्ठों को छोड़कर उन्हें अकादमी का सदस्य मनोनीत कर लिया।
उनकी साहित्यिक चोरी के कारण मैंने उन्हें फ़ेसबुक से ब्लेक लिस्ट कर दिया। दूसरे क्यों नहीं बायकाट कर पा रहे उनसे पूछिए। 
 
प्रीति 'अज्ञात' - वर्तमान परिवेश में आप महिलाओं की स्थिति को किस रूप में देखती हैं?
नीलम कुलश्रेष्ठ - वर्तमान में महिलाओं की स्थिति अच्छी होती जा रही  है। मैं ये नहीं कह रही कि पुरुष व्यवस्था पूरी तरह बदल गई है लेकिन स्त्रियाँ मीडिया के कारण अपने अधिकार जानने लगीं हैं। इसके पंजे में जीने की कोशिश करतीं हैं, फिर जीने  भी लगतीं हैं। अपने लक्ष्य,अपनी ख़ुशी का अर्थ समझने लगीं हैं। 1974 में मेरे पापा की गाँव के बैंक में पोस्टिंग थी। हम स्थानीय लड़के के साथ गाँव से बाहर घूमने गए। उसने खेत के बीच में जली हुई घास फूस दिखाकर कहा कि यहां फ़लाने ने अपनी पत्नी जलाकर मार डाली थी। जो बैलगाड़ी वाला हमें लाया था। उस लम्बे नौजवान ने अपनी बीवी गलापाटी [दो डंडों के बीच गर्दन फंसाकर] करके मार डाली थी। आज का समय होता तो मीडिया कैमरा लेकर पहुँच गया होता। सारे भारत में जाने कितनी आसिफ़ा मौत के घाट उतार कर फेंक दी जाती रहीं होंगी लेकिन आज ऐसे पुलिस कर्मियों को तुरंत ही नौकरी से बेदखल कर दिया है। इस बदली हुई स्त्री की परिस्थितियां, शिक्षा व अपनी सोच है कि वह किस तरह स्त्री होने की क्रूर मुश्किलों से अपने को बचाती चलती है।
बहुत दुःख के साथ बता रहीं हूँ कि जिस तरह दुनिया बाज़ार के रूप में बदली है, उतनी ही तेज़ी से स्वेच्छा से  स्त्रियों की बहुत बड़ी संख्या देह व्यापार में लिप्त हो गईं हैं। पहले निम्नवर्ग की स्त्री का शोषण किया जाता था। आज वह दीमक की तरह घरों को चाट रही हैं। टूरिज़्म बढ़ा है तो सेक्स टूरिज़्म भी। मैं हर प्रदेश की बात लिख रहीं हूँ। इस देह व्यापार को अपराध से जोड़ दिया गया है। इस रोल को भी बखूबी स्त्री सीना ताने कर रही है तो उसे इस चर्चा से कैसे दूर रखें?  
 
प्रीति 'अज्ञात' -  क्या आप अपनी अब तक की लेखन यात्रा से संतुष्ट हैं? आगे क्या सोचा है?
नीलम कुलश्रेष्ठ - अपनी मौसी के सिखाये योग के कारण मैंने संतुलित जीवन जीया। मैंने जो बड़े निर्णय  लिए जैसे बच्चे पालने के लिए पत्रकारिता का निर्णय जिसके कारण लंबा संघर्षमय जीवन जीया, भयंकर मानसिक उथल पुथल झेली, कुंठा झेली  इतनी कि मैं अब सोचतीं हूँ कैसे वह समय पार कर गई लेकिन पारिवारिक व सामाजिक सुख उठाया। मैं अपने हिसाब से जीवन जी सकती थी, सम्पादकों से भिड़ सकती थी क्योंकि हर माह की तनख्वाह खोने का तो डर नहीं था। अब मैं  सच ही अपने जीवन से बहुत संतुष्ट हूँ क्योंकि बेटे अच्छे इंसान भी है व उच्च पदों पर हैं।
स्त्रियों के अधिकारों के लिए जो संघर्ष किया है उसके कुछ परिणाम तो दिखाई दे रहे हैं। गुजरात की संस्कृति  को भी सारे देश को समझा पाई हूँ। मैं कोई भी शहर बदल लूँ, लोग 'बड़ौदा वाली नीलम कुलश्रेष्ठ' के नाम से पहचानते हैं। अस्मिता के लिए मैंने जो समय दिया उसके सुखद परिणाम तो आप जानतीं हैं। लेखन बहुत रूपरेखा बनाने से नहीं होता बस दुआ कीजिये कि आख़िरी सांस तक लिखती रहूँ व ये भावना कायम रहे कि सर्वश्रेष्ठ देना तो अभी शेष है।
 
प्रीति 'अज्ञात' - 'हस्ताक्षर' के पाठकों को क्या कहना चाहेंगीं?
नीलम कुलश्रेष्ठ - धन्यवाद प्रीति जी! आपने पाठकों से कुछ कहने का मौक़ा दिया। मेरा सुझाव है जब भी मौक़ा मिले, आप कुछ न कुछ ज़रूर पढ़ें व उसमें निहित अच्छे मूल्यों को आत्मसात करें। आज का समय तेज़ी से बदल गया है,भटकने के मौके बहुत देता है व इसे लोग फ़ैशन भी समझतें हैं। यदि जीवन के अंत तक सुख पाना चाहतें हैं तो, अपने दौड़ते जीवन में पारिवारिक मूल्यों को बहुत अच्छी तरह बचाकर रखें।  
ईमानदार लेखन और पैसे का कोई सम्बन्ध ही नहीं है इसलिए जो भी युवा मेरे सम्पर्क में आते हैं, मैं उन्हें यही सलाह देतीं हूँ कि पहले नौकरी के विषय में सोचें, तब लेखन। मेरी तो इसलिए कट गई कि मुझे शादी के बाद मम्मी पापा का सहारा मिलता रहा व पति की सरकारी नौकरी थी।
 
संपर्क:
श्रीमती नीलम कुलश्रेष्ठ   
फ़्लेट न. -९०४ ,  बी -विंग 
अर्बन स्पेस फेज़--1
 दोराबजी पैराडाइज़ के निकट 
एन आई बी एम, उन्दरी  रोड 
पूना --४११०६० [ महाराष्ट्र ]
Mo.—09925534 694
 

- नीलम कुलश्रेष्ठ
 
रचनाकार परिचय
नीलम कुलश्रेष्ठ

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ख़ास-मुलाक़ात (1)