प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फ़िल्म समीक्षा

वतन को आबाद रखने वाली गुमनाम स्त्री की कहानी: राज़ी

 

 

फ़िल्म - राजी
निर्देशक- मेघना गुलजार, 
कलाकार-आलिया भट्ट, विकी कौशल, रजत कपूर, शिशिर शर्मा, जयदीप अहलावत, सोनी राजदान

 
हिंदी सिनेमा के वर्तमान दो दशकों को देखा जाए तो महिलाओं की भूमिका अभिनय के अलावा निर्माता निर्देशक के रूप में भी अहम होती जा रही है। ऐसी ही महिलाओं में शुमार है मेघना गुलजार। भारतीय सिनेमा के लिए प्रसिद्ध गीत-संगीत लिखने वाले गुलज़ार साहब की इस बेटी ने सिनेमा में निर्देशन वाक़ई खूबसूरती से किया है और अपना एक विशेष मुकाम बनाया है। तलवार, जस्ट मैरिड, फिलहाल, हू तू तू जैसी बेहतरीन फिल्मों का निर्देशन करने वाली मेघना गुलजार ने इस बार डायरेक्टर की है राजी फ़िल्म का लबोलुआब यही है। यह फ़िल्म अन्य देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्मों से एकदम भिन्न है।
 
उपन्यास ‘कॉलिंग सहमत’ के लेखक हरिंदर सिक्का स्वयं भारतीय नौसेना के अधिकारी रहे है और करगिल युद्ध के समय रिटायर सेना के अधिकारी के रूप में हालात का जायजा लेने उस इलाके में गए थे। मेघना गुलजार की इस फिल्म को देखते हुए 2017 में संकल्प रेड्डी के निर्देशन में आई फिल्म ‘द गाजी अटैक’ याद आती है। उसमें भी यह दिखाया गया था कि 1971 भारत-पाक युद्ध के समय पाकिस्तान ने भारतीय युद्ध पोत आइ०एन०एस विक्रांत को ध्वस्त करने के लिए गुप्त तरीके से अपने युद्धपोत पी०एन०एस गाजी को भेजा था। जबकि ‘राजी’ फ़िल्म में सहमत जासूस की भूमिका में खबर भेजती है कि पाकिस्तान नौसेना के माध्यम से कोई भारत के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई करने जा रहा है।
 
फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह है कि उन्नीस सौ सत्तर-इकहत्तर में दिल्ली विश्वविद्यालय में सहमत नाम की एक कश्मीरी लड़की पढ़ती है। जो बेहद रहम दिल है। पशु, पक्षियों से भी उसे बहुत प्यार है। एक गिलहरी कहीं चलती कार से न कुचल जाए इसके लिए खतरे से खेल जाती है। वह इतनी नाजुक है कि टिटनस की सुई लगवाने से भी डरती है पर फिर अचानक से उसके हालात बदलते है और उसकी कायापलट हो जाती है। वह भारत की जासूस तथा  पाकिस्तान की बहू बन पाकिस्तान पहुँच जाती है और एक पाकिस्तानी सेना के अधिकारी के बेटे से उसका निकाह होता है। भारत-पाकिस्तान युद्ध के पहले दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ रहा है और सहमत खतरों से जूझते हुए भी अपना काम करती रहती है। वह खुफिया जानकारियाँ भेजती रहती है। भारत के लिए उसके मन में इतना प्यार है कि यह भी नहीं सोचती कि वह जो कर रही है, उसका अंजाम क्या होगा? पति और देश में वो देश को चुनती है। पाकिस्तान में वो दो लोगों की हत्या भी करती है, वरना उसका राज खुल जाता। उसका पति भी भारत की खुफिया एजेंसी की उस कार्रवाई में मारा जाता है, जो उसके यानी सहमत को पाकिस्तान से निकालने के लिए की गई थी। अपना काम करने के बाद सहमत एक विधवा के रूप में अपने देश लौट जाती है।
 
आलिया भट्ट ने जिस किरदार को निभाया है उसका अपना डर और संकोच है। वह कभी भी पकड़ी जा सकती है।आखिर जिस घर में वो जासूसी कर रही है, वह पाकिस्तानी सेना के मेजर जनरल का घर है। उसका राज कभी भी खुल सकता है। राज अब खुला, तब खुला वाली हालत कई बार पैदा होती है। आलिया ने ऐसी परिस्थिति में फंसी सहमत के मानसिक तनाव के हर क्षण को जिस तरह परदे पर जिया, वह उन्हें एक बेहतरीन अभिनेत्री की कतार में खड़ा कर देता है। इसमें संदेह नहीं कि ये अब तक का आलिया भट्ट का सबसे अच्छा काम है। पूरी फिल्म आलिया या उनके चरित्र पर केंद्रित है। सहमत के पति इकबाल की भूमिका में विकी कौशल का काम भी अच्छा है। आलिया भट्ट की असली माँ सोनी राजदान इसमें सहमत की माँ बनी है। आलिया की शानदार भूमिका के अलावा फिल्म तीन और बातों के लिए उल्लेखनीय है। एक तो भारत-पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद किसी तरह का अंधराष्ट्रवाद नहीं दिखाती। यह राष्ट्रवाद नहीं बल्कि देशभक्ति को दिखाने वाली फिल्म है। दूसरा, ये बड़े ही ताकतवर तरीके से दिखाती है कि मुस्लिम, खासकर कश्मीरी मुस्लिम भी, सहज रूप से देशभक्त हो सकते हैं और देश के लिए अपनी जान की बाजी लगा सकते हैं। सहमत के पिता भी भारत के लिए पाकिस्तान में जासूसी करते हैं, यह भी फिल्म में दिखाया गया है। जयदीप अहलावत ने जिस भारतीय खुफिया अधिकारी की भूमिका निभाई है, वह भी मुस्लिम है। तीसरा, यह फिल्म युद्ध की व्यर्थता और अमानवीयता को सामने लाती है। जंग में मरने वाले ज्यादातर निरीह और निर्दोष होते हैं। यह भी हम हमेशा भूल जाते हैं।
 
अभिनय के मामले में आलिया भट्ट ने सिद्ध किया है कि उन्हें बेहतरीन अदाकारा क्यों कहा जाता है। विक्की कौशल ने बेटे और पति का किरदार बड़े ही सहज अंदाज में निभाया है। वहीं कोच के रूप में जयदीप अहलावत और माता पिता के रूप में सोनी राजदान और रजित कपूर का काम बहुत बढ़िया है। फिल्म के गाने बड़े ही अच्छे तरीके से कहानी के साथ पिरोए गए हैं इसलिए सिनेमा हॉल से बाहर निकलने के बाद भी याद रहते हैं। बैकग्राउंड स्कोर भी लाजवाब है।
 

- तेजस पूनिया