प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण
अधूरी ख्वाहिश 
 
बात एक ऐसे दंपति की जो नि:संतान थे, काफी चिकित्सकों से सलाह लेने पर भी जब निराशा ही हाथ लगी तो उन्होंने एक बच्ची को दत्तक लिया। ये दंपति, मेरे घर के बिल्कुल सामने रहते थे व उनका नाम उपनाम जोशी है।  दोनों पति-पत्नी बडे ही खुश थे और क्यों ना हों, घर के आंगन में किलकारियां गूँज रही थीं। अंकल रेलवे में कार्यरत थे व आंटी गृहिणी।  तो उनका सारा समय.बच्ची की देखभाल में निकल जाता। पंडितों से सलाह कर शुभ मुहूर्त में बच्ची को झूले में डाला गया व उसका नाम श्रुति रखा गया। दिन बीता, समय आगे बढता गया; श्रुति का दाखिला एक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में किया गया। पढाई के साथ श्रुति माँ के साथ घर के काम में भी हाथ बंटाती व उसकी रूचि अन्य कार्यों में भी बढ़ने लगी। 
 
अब श्रुति बड़ी हो रही थी, लेकिन वह बीमार भी रहने लगी थी तो माता-पिता उसे चिकित्सक के पास ले गए। उसे पेट में दर्द उठने लगा था। परेशान माता-पिता शहर के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक से उसका इलाज करवा रहे थे। अब जोशी दंपति काफी चिंतित रहने लगे क्योंकि  चिकित्सक, श्रुति की बीमारी का पता ठीक से बता नही पा रहे थे। अब स्कूल में भी श्रुति पिछड़ने लगी थी। उसके नंबर कम आने लगे थे। श्रुति का पेट दर्द अब इतना बढ गया कि रात को भी उसे अस्पताल में भर्ती करना होता। जब रोग का पता चला तो देरी तो हो चुकी थी लेकिन आशा की किरण अब तक जीवित थी। श्रुति को कोलॉईटिस नामक बीमारी थी (सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को भी यही बीमारी है)
इस बीमारी का इलाज हो जाता है लेकिन कभी भी दर्द होने से तुरंत अस्पताल जाना होता है. बस एेसे ही दिन बीतते गए और अंत में डॉक्टर ने पेट के ऑपरेशन की सलाह दी। पहले तो जोशी दंपति तैयार नही थे लेकिन काफी सोच विचार कर अंत में ऑपरेशन के लिए समय तय किया गया क्योंकि यह ऑपरेशन छः घंटे का होता है अतः पहले माता-पिता को मानसिक तौर पर तैयार किया जाता है। अब श्रुति १८ बर्ष की हो गई थी, अंकल श्रुति के गाडी के लाईसेंस लेने की तैयारी कर रहे थे किंतु अब उसके ऑपरेशन की तैयारी हो रही थी। लंबी अवधि के इस प्रकार के ऑपरेशन में बाहर से भी डॉक्टर बुलाए गए थे। 
 
ऑपरेशन का समय जैसे-जैसे करीब आ रहा था, हम सब कॉलोनी के लोगों की भी धडकनें बढ रहीं थीं। श्रुति का स्वभाव मिलनसार था व हर कार्यक्रम में वह बढ़ -चढकर हिस्सा लेती थी। श्रुति द्वार पर बडी सुंदर रंगोली निकालती थी। दीवाली में घर की साज-सज्जा व सबके यहां मिठाई पहुचाती थी। लेकिन समय के आगे सब बौना होता है कुछ ऐसा ही हम सभी को लग रहा था। एक जवान लडकी का, पेट का ऑपरेशन यह बात जोशी दंपति को काफी परेशान कर रही थी लेकिन निश्चित तारीख पर ऑपरेशन किया गया व वह सफल भी रहा। श्रुति अब अस्पताल से घर आ गई, घर पर भी वह परहेज से रहती, लेकिन एक रात पेट में पुन: दर्द उठा और रात के दो बजे उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। 
 
कुछ इंफेक्शन हो गया था और अब श्रुति की तबियत इतनी खराब होने लगी कि अंत में वह  वेंटिलेटर पर आ गई और 7 मई 2008 को श्रुति ने अंतिम सांस लेते हुए दुनिया से विदा ली। अब तो आंटी अंकल पर दुख का पहाड़ टूट गया। जिस उम्मीद से बच्ची को गोद लिया, वह उम्मीद अब चल बसी। सब रिश्तेदार व पडोसी सांत्वना दे रहे लेकिन  मां की ममता पर मानो ग्रहण लग गया। बेटी के भविष्य के लिए जो सपने संजोकर रखे थे, वे सब आज बिखर गए थे। सुबह १० बजे श्रुति का शव घर लाया गया, अब माँ तो मानो श्रुति से पुन: ऑंख खोलने की भीख मांग रही थी। उससे अपनी गलतियों पर माफ़ी मांग रही थी। हर शख्स की ऑंखे नम थी, क्योंकि जहां डोली उठनी थी वहां अर्थी उठ रही थी।
चूंकि श्रुति बालिग थी इसलिए उसे हरी साडी पहनाई थी। माँ की सारी ख्वाहिश अब शब्दों द्वारा बयां हो रही थी। बेटी की अंतिम विदाई पर माँ बस यही कह रही थी, "बेटा! मेरी सारी ख्वाहिश अधूरी हैं और अगले जन्म मे तुम मेरी कोख से जन्म लेना।" यह कहते माँ बिलखने लगी और सबकी ऑखों से आँसुओं की धारा बहने लगी। श्रुति अपनी अंतिम यात्रा के लिए चल पडी। 
माँ की ख्वाहिशों को अधूरा छोड़....ज़िंदगी को बिलखती छोड़, श्रुति हम सबको रुलाकर चली गई। 
 

- पूर्णिमा मिश्रा
 
रचनाकार परिचय
पूर्णिमा मिश्रा

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