प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

साहित्य: मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम
- भावना गोयल


क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?
मैं दुःखी जब-जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई
मैं कृतज्ञा हुआ हमेशा
रीति दोनों ने निभाई
किन्तु इस आभार का अब
हो उठा है बोझ भारी
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी
क्या करूँ?


ये पंक्तियाँ श्री हरिवंश राय बच्चन जी की कितनी सहज हैं, कितनी स्वाभाविक भावना उमड़ पड़ी है। सामान्य जीवन के इस जंजाल में मनुष्य न जाने किस-किस पर अवलंबित रहता है, किसी न किसी तरह हमेशा दूसरों की सहायता से आगे बढ़ते हैं, पर कृतज्ञता का भाव भी भूल जाते हैं। जब कभी उसकी संवेदना मन में कसक उठती है, एक वेदना से मन में दुख भर उठता है। जब जरूर हमें श्री हरिवंशराय बच्चन जी की ये ‘संवेदना’ वाली पंक्तियां याद आती हैं।

‘संवेदना’ यह सुंदर शब्द मानवीय जीवन के लिये जितना आवश्यक है उससे भी ज्यादा एक स्वस्थ समाज के लिये आवश्यक है क्योंकि संवेदनहीन मानव, मानव नहीं कहलाता तो संवेदनाहीन समाज कैसे स्वस्थ रह सकता है। संवेदना भावनात्मक लोक से जुड़ा हुआ है। संवेदना के बिना भाव उमड़ ही नहीं सकते, इसलिये संवेदना मानव जीवन एवं समाज में एक महत्वपूर्ण पात्र निभाता रहता है।


सधारणतः संवेदना शब्द का प्रयोग सहानुभूति के अर्थ में होने लगा है। मूलतः वेदना या संवेदना का अर्थ ज्ञान या ज्ञानेन्द्रियों का अनुभव है।
‘वेदना’ शब्द का सामान्य अर्थ होता है - ‘कष्ट’, पीडा या दुख। ‘सम’ शब्द का अर्थ होता है - ‘समान’ अर्थात् ‘सम’ उपसर्ग के प्रयोग से ‘वेदना’ शब्द के अर्थ में वैशिष्ट्य उत्पन्न हो जाता है और तब संवेदना का अर्थ हो जाता है ‘समान वेदना’ या ‘समान दुख’ या सहानुभूति। अंग्रेजी में ‘संवेदना’ के लिये सिम्पैथी या सेंसेटिविटी आदि शब्दों का प्रयोग होता है।


‘संवेदना’ शब्द का अधिकांश प्रयोग मनोविज्ञान एवं साहित्य के अन्तर्गत किया जाता है। सम्पूर्ण मनोविज्ञान तथा साहित्य संवेदना पर ही आघृत कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। साहित्य में संवेदना का अर्थ दुख, अवसाद, पीड़ा एवं सहानुभूति से लिया गया है।
साहित्य और समाज के सम्बन्ध को कहीं से भी समझने की कोशिश की जाये तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि संवेदना ही एक ऐसी चीज है जो साहित्य और समाज को जोड़ती है। संवेदनाहीन साहित्य समाज को कभी प्रभावित नहीं कर सकता। वह मात्र मनोरंजन कर सकता है। सिर्फ मनोरंजन द्वारा ही साहित्य को जीवित रखना संभव नहीं है। अगर साहित्य के पूरे इतिहास को सामने रखकर देखा जाये तो सहज ही पता चल जायेगा कि महान साहित्य उसी को माना गया है जिसमें अनुभूति की तीव्रता और भावना का प्राबल्य रहा है। साहित्यकार जब भी कुछ रचता है तो समाज को केन्द्र में रखता है। समाज से विलग होकर साहित्य का आधार ही तैयार नहीं किया जा सकता है। संवेदनारहित साहित्य मृतप्राय ही होता है -


‘‘जिस साहित्य में मानवीय संवेदना नहीं होती उस साहित्य की उम्र बहुत कम होती है क्योंकि साहित्य संवेदनाओं पर आधारित होता है। संवेदनारहित साहित्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।’’
साहित्यकार संवेदनशील मनुष्य होता है वह समाज में रहता है। सामाजिक परिस्थितियाँ उसे प्रभावित करती हैं अतः वह अपनी अभिव्यक्ति के लिये साहित्य की किसी भी विधा को क्यों न चुने, उसमें युग चेतना के स्वर उभर ही आते हैं। किसी युग विशेष की चेतना में भी कई धारायें पायी जाती हैं। इसका कारण यह है कि एक ही युग में भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा वह उनकी निजी संवेदना के अनुरूप ग्रहण की जाती है। संवेदना के स्तरों में विविध स्तर होने के भी कई कारण हैं जिनमें सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियां प्रमुख है।


लेखक की एक अलग संवेदना होती है, जिसके द्वारा वह साहित्य में अपने को अभिव्यक्त करता है। साहित्य को मानव चेतना की अभिव्यक्ति मानने पर हमारी अनुभूति की सघनता का सम्बन्ध पद्य से और चिंतन की दुरूहता का सम्बन्ध गद्य से ठहरता है। ‘‘ज्यों-ज्यों जीवन सरलता और भावमयता त्यागकर जटिलता की ओर बढ़ता है त्यों-त्यों जीवन में विचार तत्वों का प्राधान्य होता है तथा चिंतन प्रधान चेतना गद्यात्मक शैली में अभिव्यक्त होती है। पद्य का सम्बन्ध संवेदना, भाव, रागपरकता एवं कल्पना से है और गद्य मूलतः विचार, तर्क, चिंतन तथा प्रत्यक्ष जटिल जगत से संबंध है।’’
संवेदनाः- संवेदना के स्तर पर अमुक उपन्यास अपने पाठकों को क्या संप्रेषित करता है, इसका परिवीक्षण करना ही आज की परिवर्तित समीाक्षा दृष्टि का प्रमुख कार्य है। तोता-मैना की किस्सागों शैली का युग अब नहीं रहा। कतिपय उपन्यासों में तो आजकल रेशम के महीन धागे का इातना सूक्ष्म एवं क्षीण कथा सूत्र होता है कि उसे पकड़ पाना भी कठिन लगने लगता है। अंबर में तैरते गद्य खण्ड जैसे जीवन के कुछ बिखरे खंड-चित्र और पुष्प पंखुडियों के ऊपर जमे, प्रभातकालीन ओस की बूंदों जैसी मानव मन के निमेष मात्र को परिलक्षित होने वाले भाव-बोध के विश्रृंखल विरल कथानक पर भी आज के सन्दर्भ में उपन्यास लिखे जा रहे हैं।


वस्तुतः रचनाकार की वह अनुभूति जिसे वह अपने दैनन्दिन जीवन से प्राप्त करके संवेदना के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाता है, वह बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।
‘‘यह संवेदना कोई गढ़ी हुई मूर्ति नहीं है वरन् वह समय के तत्कालिक दबाव से प्ररित होती है। यदि समकालीन जीवन सन्दर्भों, मनुष्य के यथार्थ परिवेश और जीवंत तत्वों की उपेक्षा कर दी जाये तो वह संवेदना झूठी पड़ जायेगी और उसका कोई अर्थ शेष नहीं रहेगा।’’
स्ंवेदना का सामयिकता से जुडना तो जरूरी नहीं है पर इसका यह आशय नहीं कि लेखक केवल वर्तमान जीवन से ही कथानक का चयन करे। उसकी संवेदना ऐतिहासिक भी हो सकती है और भविष्यदर्शी भी पर वर्तमान परिस्थितियों से वह किसी भी दशा में बच नहीं सकता।


यदि लेखक की प्रतिबद्धता अच्छाई के प्रति है तो वह अपने साहित्य में उसके लिये आग्रहशील रहेगा। इसके विपरीत यदि उसे कुंठा, ध्वंस और संत्रास प्रिय है तो वह इन्हीं से संबद्ध चित्रों को प्रस्तुत करेगा। इसके साथ ही यह जानना भी जरूरी है कि लेखक अपनी संवेदना को संप्रेषित करने में कहाँ तक सफल रहा है? कथानक में यदि हमसे जुड़ी हुई जिन्दगी सांस ले रही है, पात्रों में यदि हमारे जाने-पहचाने चरित्र क्रिया-कलाप कर रहे हैं और भाषा में यदि संवेदना को मूर्तिमान करने की शक्ति विद्यमान है, तो रचना की अर्थवत्ता स्वंय ही बहुत बढ़ जायेगी।
उपन्यासों में वर्णित मानवीय संवेदना के विविध रूपः-


चूँकि साहित्यकार संवेदनशील प्राणी है। सामाजिक तो वह होता ही है। सामाजिक परिस्थितियाँ अपने घात-प्रतिघात से उसे निरंतर प्रभावित करती रहती हैं। अपनी अभिव्यक्ति के लिये वह साहित्य की किसी भी विधा का प्रश्रय क्यों न ले, युग चेतना के स्वरों का उसकी रचना में निनादित हो उठना अवश्यम्भावी है। एक ही युग-चेतना भी भिन्न-भिन्न विचारधारा के व्यक्तियों द्वारा अपनी निजी संवेदना के अनुरूप ग्रहण की जाती है।
साहित्यकार युगीन यथार्थ को अपनी संवेदना एवं व्यक्तित्व के सांचे में ढालकर उसे एक नया रूप देता है। साहित्यकार समाज में रहता अवश्य है, परन्तु इसका कार्य एक अखबार के संवाददाता की भांति मात्र तथ्यों का संकलन मात्र नहीं करता बल्कि एक समग्र दृष्टिकोण का प्रस्तुतिकरण करता है। वह पहले तथ्यों को देखता, समझता, परखता है फिर जड़ तक पहुंचकर उनका विश्लेषणपूर्वक सार प्रस्तुत करता है। दही को मथकर निकाले गये नवनीत की भांति वास्तविक तथ्य से प्रसूत यह रचनाकार का सत्य किसी भी कृति के माध्यम से हृदयसंगम होने के लिए उसका आस्वादक होना अनिवार्य है। अतः  पाठक एवं समीक्षक में उसे पकड़ने की क्षमता होनी चाहिये। रचना खुद क्या बोल रही है, यह समझे बिना रचनाकार की संवेदना तक कोई कैसे पहुंच सकेगा। उपन्यास चाहे सामाजिक हो, मनोवैज्ञानिक हो या ऐतिहासिक हो, लेखक की संवेदना का मुखर बयान करता है। युग चेतना को लेखक की संवेदना के स्तर पर ग्रहण करने वही उसका प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष संवाहक होता है।


हिन्दी उपन्यासों में मानवीय संवेदना के विविध रूप मिलते हैं जो निम्नलिखित हैं -
1. रागात्मक संवेदना,    2. दुखात्मक संवेदना,   3. सुखात्मक संवेदना,   4. अन्य संवेदना
डाॅ0 सुरेश सिन्हा के अनुसार - साहित्य में ‘संवेदना’ से अभिप्राय है वह अनुभूति प्रवणता जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रभावों को ग्रहण करने की क्षमता से पूरित होती है। इसका अर्थ यह भी होता है कि कोई साहित्य किन भावनाओं की प्रतीति हमें करा सकने में समर्थ होता है। भावनाओं के ये स्तर विविध होते हैं। वह आधुनिक बोध भी हो सकता है या मानव-अस्तित्व की बुनियादी विवशतायें भी। संवेदना का धरातल चाहे जो हो अभिव्यक्ति उसे साहित्य के माध्यम से ही मिलती है। नई अनुभूति, नई भाषिक अर्थवत्ता, अनुभवों का नया संयोजन तथा मानव संबंधों के परिवर्तन भी सूक्ष्म परख आदि से ही साहित्य की संवेदना स्पष्ट होती है। भाषा, भाव और प्रेरणा तीन प्रत्येक काल में साहित्य की संवेदना को नयी अर्थवत्ता प्रदान करते हैं।


सच तो यह है कि साहित्य का मूल सम्बन्ध मानव की संवेदना से है। संवेदना के बिना साहित्य नहीं बनता, चाहे उसमें बुद्धिवाद का कितना ही ऊहापोह क्यों न हो, दर्शन की नयी-नयी भंगिमा क्यों न हों। बुद्धि, दर्शन, चिंतन, ज्ञान विज्ञान सबको पहले जीवन में आत्मसात् होना पड़ता है, आत्मसात् होकर मानव संवेदना का अंग बनना पड़ता है तभी शक्तिशाली साहित्य की सृष्टि होती है।
हृदय की कोमल वृत्तियों से आपूरित होने के कारण नारी पुरूष से अधिक संवेदनशील वृत्तियों का प्रतीक है -


दया, माया, ममता लो आज,
मधुरिमा लों अगाध विश्वास,
हमारा हृदय रत्न निधि स्वच्छ,
तुम्हारे लिये है पास।


कोमल संवेदनशील तंतुओं का ऐसा संश्लिष्ट सहज स्फुरण पुरूष के लौह-दुर्भेद्य हृदय में कहाँ मिलेगा? नारी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के इस युग में महिला उपन्यासकारों का मानव-मन की नाना संवेदनाओं को उकेरना एक श्लाद्यनीय प्रयास है।
महिला कथा लेखन भी अपने आप में कितना कुछ समेटे है। संवेदना के सजल तरल मैक्टिकों की धृति, मानवीय सुख-दुख के महसूस होने की अपूर्वग्राही शक्ति, मानव हृदय की अथाह गहराईयों में प्रविष्ट होकर नये अछूते और अलभ्य भाव रत्नों को तलाशने की पैनी दृष्टि, घर-परिवार के सारे दायित्वों को समेटते हुए और कभी-कभी तो घर-बाहर के दोहरों उत्तरदायित्वों को वहन करते हुए भी अपने भीतर में घुमडती चीख को शब्दबद्ध करने की विनम्रता का नाम ही महिला लेखक है। समाज में चतुर्दिक व्याप्त विषमताआंे और विसंगतियों के लिए आवश्यक है कि वह संवेदना को अपनी साधना का मूलाधार बनाये। संवेदना जितनी गहरी होगी लेखन उतना ही सशक्त होगा। मानवता को एकसूत्र में बांधने का एकमात्र साधन है संवेदना। एक संवेदनशील साहित्यकार को अपनी आत्मघाती प्रवृत्ति को रोकना होगा। अपनी पीड़ा न देखकर जग की पीड़ा देखनी होगी। एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा, तभी वह अपने उद्देश्य में सफल हो सकेगा।


महादेवी वर्मा के काव्य क्षेत्र में मूलतः भावना, प्रेम और पीडा की गायिका होने के कारण उन्हें ‘आधुनिक मीरा’ के नाम से भी अंकित किया जाता है, जो करूणा उनके काव्य में प्राणवान है, वही करूणा गद्य साहित्य का उत्स है। इनके गद्य में भी वही मानवता अनवरत प्रवाहित होती रही है।
महादेवी के गद्य में मानवीय संवेदना का ‘अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखायें’ में हुआ है। दोनों कृतियों में समाज के निम्न वर्ग के पात्रों की असमर्थ कठिनाईयों को व्यक्त किया है।


महादेवी ने गद्य साहित्य में मानवीय संवेदनाओं का वह रूप मिलता है, जो 1930 ई0. के बाद प्रेमचन्द, निराला, बेनीपुरी, वृन्दावन लाल वर्मा आदि की कृतियों में उभर रही थी। गांव के गरीब किसानों के घर, झोपड़े, बर्तन-बासन, गहने, कपड़े-लत्ते, मेहनत-मशक्कत और अभावों पर दृष्टि डालकर उन्होनें तत्कालीन यथार्थवाद सौन्दर्य दृष्टि का परिचय दिया। जन-जीवन की झांकी प्रस्तुत करने की तत्कालीन रचनात्मक प्रवृत्ति के बहाव के साथ ही महादेवी ने भी गांव के परिवेश और लोगों के रहन-सहन का रेखांकन किया।

महादेवी के गद्य साहित्य में मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति की दृष्टि से ‘विधवा भाभी’, ‘अभागिन बिन्दा’, घीसा रामा नामक रेखाचित्र उल्लेखनीय है। महादेवी जी ‘भाभी’ रेखाचित्र में भारतीय विधवा नारी की ओर सहानुभूति प्रकट करती प्रतीत होती है। भारतीय समाज की अव्यवस्था, सामाजिक रचना के परिणामस्वरूप ही विधवा नारियों की दुर्दशा होती है।


मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति की दृष्टि से महादेवी जी का ‘गुंगिया’ नामक रेखाचित्र भी उल्लेखनीय है। पति द्वारा व्यक्ता गुंगिया का जब एकमात्र पुत्र हुलसी उससे बिछड़ जाता है तब उसे पुनः मिलाने के प्रयत्न में महादेवी जी की सामान्य मनुष्य के प्रति लगाव एवं मानवीय संवेदना महत्वपूर्ण कार्य करती है। पुत्र वियोग में दुखी स्त्री के दुख को कम करने में महादेवी जी को सहानुभूतिपूर्ण कृत्य और सौहार्दपूर्ण व्यवहार उनके मानवीय संवेदना एवं मानवीयता का परिचायक है। इनके रेखाचित्रों में मानव हृदय को छूने वाले वर्णन अर्थात् मानव मन की संवेदना को जगा सकने वाले चित्रण अधिक सफल हैं।

लता, पादप, पुष्प आदि तक उनकी पारिवारिक ममता के समान अधिकारी हैं। साथ ही गाय, हिरण, कुत्ता, बिल्लियाँ, गिलहरी, खरगोश, मोर, कबूतर आदि उनके चिरसंगी है। व्यथित होकर, रो-रोकर एवं सिसकियाँ भर-भरकर अपनी दारूण व्यथा से परिपूर्ण करूण कथा कह रहा है। डाॅ0 कृष्णलाल का कथन है - ‘‘आंसू के सम्पूर्ण काव्य के अन्तर में वेदना की एक लहर सी दिखाई पड़ती है।’’ ‘आंसू’ काव्य करूणा, प्रेम और वेदना की त्रिवेणी का संगम है।
कवि निराला ने अपने काव्य ‘सरोज स्मृति’ में अपने वैयक्तिक जीवन के दुख और संवेदनाओं का चित्रण किया है। उन्होनें अपने जीवन में आये भौतिक कष्टों, आपदाओं, अपनी पत्नी एवं पुत्री की अकाल मृत्यु के दुख एवं अपनी संवेदनाओं का जीता-जागता चित्र अपने काव्य में उपस्थित किया है। इस काव्य में उन्होनें अपनी मानसिक व्यथा की करूणासिक्त अभिव्यंजना की है।


असाधारण प्रतिभा के धनी प्रसिद्ध कथाकार एवं साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द के साहित्य में जीवन की सबसे अधिक मर्मस्पर्शी और भाव व्यंजित संवेदनायें उभरकर आती हैं। उन्होनें समाज के यथार्थ चित्रण द्वारा विभिन्न वर्गों की संवेदनाओं को अपने साहित्य का विषय बनाया। उन्होनें जीवन का गहन विश्लेषण कर उसे बडी संवेदना के साथ प्रस्तुत किया है।
प्रेमचन्द का यह वक्तुव्य कितना अर्थगर्भित व सटीक है - ‘‘सूखी रोटियाँ सोने के थालों में परोस देने से पूरियां नहीं बन जाती’’ अर्थात् जीवन में जो कुछ सत्य-शिव-सुन्दर है उसी को दर्शाना मुख्य उद्देश्य रहा पर यथार्थ चित्रण हेतु साहित्य की उपयोगिता को तिरस्कृत नहीं किया। जो काम समाज द्वारा संभव नहीं हुआ वो कहानियों द्वारा संभव हो पाया। उनका दृढ़ विश्वास था - ‘‘मनुष्य के लिए कुछ भी असंभव नहीं यदि मानव पतन के गर्त में गिर सकता है तो आकाश गंगा में भी नहा सकता है।’’

यही है प्रेमचन्द के स्थापन का रहस्य। अतः कह सकते हैं कि कटु अनुभवों, कठोर यथार्थ घटनाओं के झटकों ने प्रेमचंद के गांधीवाद में दरारें नहीं गड्ढे डाल दिये।
प्रेमचन्द के शब्दों में - ‘‘जो लख्ेाक मानव हृदयों के रहस्यों को खोलने में सक्षम है, उसी की रचना सफल है, वह उन्ही पात्रों का सफल चित्रण कर सकता है जिनसे वह निजी अनुभव से परिचित है। मेरे अधिकांश पात्र यथार्थ जीवन से लिये गये। जब किसी पात्र का यथार्थ में अस्तित्व नहीं होता, तब वह छाया मात्र अनिश्चित अविश्वसनीय हो उठता है।


प्रेमचन्द के उपन्यासों में मानवीय संवेदना अत्यंत गहनता से व्यंजित हुई है। प्रेमचंद के उपन्यास साहित्य में मानवीय संवेदना का आयाम बहुत व्यापक है। ‘‘उन जैसा मानवीय संवेदना को कलात्मक अभिव्यक्ति देने वाले उपन्यासकार आज भी हिन्दी में कम ही हैं।’’
उनकी संवेदना हृदय की सरसता है, बुद्धि की शुष्कता नहीं। उन जैसा सफल युग-सृष्टा उपन्यासकार दूसरा नहीं। ‘‘मानव जन को जितना गहन अध्ययन उनके पास था, जो सूक्ष्म अंतर्दृष्टि उनके पास थी और मानव मनोविज्ञान से जितने घनिष्ठ रूप में वे परिचित थे, उतना कोई अन्य उपन्यासकार नहीं।’’
मानवीय संवेदना को नया आयाम देने में विश्वंभरनाथ शर्मा भी पीछे नहीं रहे है। प्रेमचंद परम्परा के मानवीय संवेदना के संवाहक उपन्यासकारों में अमृतलाल नागर भी महत्वपूर्ण हैं। प्रेमचन्द के उपन्यास उनके युग की आवाज है, उनके युग के दर्पण हैं, उनके युग के चित्र है। ‘सेवासदन’ में उनकी ‘मानवीय संवेदना नारी-जीवन को लेकर नाना रूपों में मुखरित हुई है।


मुक्तिबोध की काव्य संवेदना का प्रसार सामान्य में सामान्य व्यक्ति की वेदना को छूता हुआ आगे बढ़ता है। सामान्य जन के प्रति यही लगाव उन्हें प्रेमचन्द व निराला की मानवतावादी धारा से जोड़ देता है। दूसरों की वेदना से सहानुभूति रखते हुए उनके कष्टों को दूर करने के लिए तत्पर मुक्तिबोध इसलिये सत्-चित् वेदना के कवि कहे जाते हैं।
प्रेम के बाद ‘संवेदना’ ही मानव के अंतरतम् की सर्वाधिक पवित्र भावना है। संवेदना हमें आत्मीयता के प्रगाढ़ बन्धन में बांधती है। यह हमें कोमल अनुभूतियों के उस भाव लोक में ले जाती है जहाँ कृतज्ञता की मौन स्वीकृति है, भाषा रहित सम्प्रेषण है और निनादित होते हुए प्राणरों का दिव्य संगीत है। यदि संवेदना न हो तो मनुष्य शिला बन जायेगा। दूसरों के सुख-दुख को कोमलता से महसूस करने वाले हृदय ही ना रहा तो मनुष्य के पास मनुष्य कहलाने के लिए बचेगा क्या?


भूमण्डलीकरण के इस दौर में जहाँ मानव जीवन तनावग्रस्त होता जा रहा है वहाँ ये भावभीनी संवेदनायें साहित्यिक अभिव्यक्ति पाकर मानव मन को उदात्त बनाती हैं। कलाकार की अनुभूति ही उसकी रचना में आकर रूप ग्रहण करती है। यही अनुभूति कभी वैदिक रचनाओं के रूप में, कभी महाकाव्यों के रूप में तो कभी हृदय तंत्री को झंकृत करने वाले गीति-गुंजन के रूप में सहृदयों को अनुरंजित करती रही है। कल्पना और भावना के व्योम पर मनीषा के विहग ने जब अपने पंख खोलने की चेष्टा की तब गद्य कवियों की कसौटी बनी और साहित्य के इतिहास में गद्य काल का आविर्भाव हुआ।

कवि अज्ञेय ने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा और दुख को अपनी कविताओं में उभास हैः-

और भुला दिया गया, बस
बीते साल के सीले कलैण्डर की,
एक बस तारीख,
जो हर साल आता है।


समाज की मृत मान्यताओं और रूढि़यों से घिरा प्व्यक्ति अपने को दीन-हीन, अकेला, कुण्ठित, पीडि़त और उपेक्षित समझता था। यह भीड़ से घिरा परन्तु अपने को अकेला महसूस करता था। नई कविता में इसी व्यक्ति विशेष की आशाओं, निराशाओं, आस्थाओं, अनास्थाओं की अभिव्यक्ति हुई है।
निष्कर्षः- इस प्रकार साहित्यकारों द्वारा जीवन की समस्त अनुभूतियों, भावनाओं, व्यवहारों एवं संवेदनाओं को इतनी गहराई से प्रस्तुत किया गया है कि साहित्य मस्तिष्क की अपेक्षा हृदय को अधिक प्रभावित करता है और पाठकों को अपने समाज, परिवार अपनी संतानों आदि की संवेदनाओं की ओर दृष्टिपात करने तथा उनके विषय में सोचने के लिये बाध्य कर देता है।


राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने सच ही कहा है:-

यह पशु प्रवृत्ति है कि आप ही आप चरें,
मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिये मरे।


व्यक्ति की इसी भावना को संसार की सर्वश्रेष्ठ शक्ति माना गया है और साहित्य को मानव जीवन की भावनाओं, संवेदनाओं की सुरक्षित अनमोल निधि।


- भावना गोयल
 
रचनाकार परिचय
भावना गोयल

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