प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

व्यंग्य

रिश्वत पर जीएसटी
- अशोक गौतम

 


बुराइयों का क्या! अगर बुराइयाँ ढूँढने निकलो तो भगवान में भी बुराई मिल जाए और वे तो सरकार के बनाए जनता के नौकर हैं जी। मेरी आपकी तरह हाड़-माँस के, पर हमसे कुछ अधिक भूख प्यास के। कोई उन्हें कितना ही चोर, बेईमान, भ्रष्टाचारी, खाऊ और भी जो मन में आए कहे तो कहता रहे, पर उनमें दूसरों के दिमागी कीड़ों के अनुसार पचासियों बुराइयाँ हो तो होती रहें, पर मैं उनकी बस इसी अच्छाई का कायल हूँ कि जो उनकी सीट पर काम हो तो इधर पैसे लेते हैं, उधर काम कर हाथ पर धर देते हैं।

जनता के नौकर जनता का काम करने के बाद उस पर अपना कोई अहसान नहीं जताते कि उन्होंने पैसे लेकर जनता का काम किया तो जनता पर कोई अहसान किया। वे तो डंके की चोट से कहते हैं कि वे पैसे लेकर काम करते हैं, किसी पर अहसान नहीं करते। जब किसी का काम पैसे लेकर किया जाए तो वह अहसान कैसा? अरे, यह तो काम करवाने वाले का उन पर अहसान होता है कि जिस काम को करने के लिए सरकार ने उन्हें नियुक्त किया है, जनता उस काम को करने के लिए उन्हें पैसे देकर भी उन्हें सलाम कर रही है। इसीलिए वे पैसा देकर काम करवाने आने वाली जनता के इंतजार में पलकें बिछाए रहते हैं। वरना इधर तो कई सीटों पर बैठे काम के मुँह माँगा लेने के बाद भी बीसियों चक्कर लगवाते हैं। और फिर मूल्य लेकर काम करने के बाद ऐसा अहसान जताते हैं, मानो उन्होंने जैसे दाम लेने के बाद भी काम करवाने आने वाले पर कितना बड़ा अहसान कर दिया हो।

सच कहूँ तो औरों की सीट पर मेरा कोई काम हो तो मैं काम करवाने जाने से पहले ही परेशान हो जाता हूँ। पता नहीं बंदा दाम लेने के बाद भी सीधे मुँह बात करेगा कि नहीं? पर उनकी सीट का काम हो तो मैं आंखें बंद करके मुस्कुराते हुए उनको कष्ट देने चला जाता हूँ।
कल फिर मुझे उनकी सीट से दोस्त का काम पड़ गया। ज्यों ही दोस्त का काम ले मैं उनकी सीट के पास गुनगुनाता हुआ पहुंचा तो वे अपने ग्राहक का पलकें बिछाए इंतजार कर रहे थे। पलकें बिछाकर अपने ग्राहक का इंतजार करना उनकी खासियत है।


मैं उनके पास पहुंचा तो वे मुस्कुराते बोले, "और बंधु! बड़े दिनों बाद आना हुआ। घर में सब सकुशल तो हैं? बिन काम भी आ जाया करो यार कभी कभी।"
"बस साहब, मत पूछो, यों ही व्यस्त हो गया था।"
"कोई सेवा??"
"है सर! बिन काम के सरकारी आॅफिसों में जनता तो क्या, यमराज तक आने से डरता है।" मैंने सच कहा तो उन्होंने ठहाका लगाया। आजकल ज़माना ही बेशर्मी का है। सच को समझदार लोग भी मज़ाक ही समझते हैं।


"बस यार! कर दी न फिर वही बात। बोलो, काम क्या है? त्योहारी सीजन चला है, सो बाजार की तर्ज पर तुम्हारा ये काम फीफ्टी परसेंट डिस्काउंट पर! तुम भी क्या याद करोगे कि किसी सरकारी कर्मचारी से वास्ता पड़ा था" कह वे मेरे मुँह की ओर ताकने लगे कि मैं कब जैसे उनको अपना पेड काम बताऊं।
"सर! काम ये था कि मेरे पड़ोसी की आपके दफ्तर में वो बिजली के मीटर की फाइल महीनों से अटकी पड़ी है।"
"तो वह मुझसे मिल जाता। तुमने मेरा पता क्यों नहीं दिया उसे? हाय! बेचारा इत्ते दिनों से रात को तो रात को दिन को भी मेरी वजह से अंधेरे में रह रहा है। सच कहूं दोस्त! मैं जनता का सब कुछ सहन कर सकता हूँ, पर उसका अंधेरे में रहना मुझसे कतई सहन नहीं होता। मेरे होते हुए जनता अंधेर में रहे तो रहे, पर अंधेरे में रहे तो थू है इस सीट को। कहो, उसकी फाइल का कोई नंबर है?" वे उसकी फाइल ढूँढने को इतने व्यग्र कि पूछो मत।
"ये है सर!  मैंने जेब से कागज का एक टुकड़ा निकाल उनकी ओर बढ़ाया तो वे एक झटके से उठे और दस मिनट ही फाइल ढूँढ ले आए। फिर उस पर कुछ लिखने के बाद बोले, "लो दोस्त! लग गया तुम्हारे दोस्त के घर बिजली का मीटर। अब जैसे उसका मन करे वह उसके साथ खेलता रहे। देश में मीटर होना ज़रूरी है। चलना ज़रूरी नहीं,’ उनका काम अब खत्म हो चुका था और कायदे से आगे के काम की अब मेरी बारी थी। सो मैंने उनसे दबी जुबान में मुस्कुराते हुए निसंकोच पूछा, "कितने दूँ सर?"


"बंदा असल में अपना है या...." उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरी आंखों में झांकते हुए पूछा।
"अपना-सा ही समझ लीजिए कुछ-कुछ।" मैंने थान में से कच्छा निकालने की सोच को परे धकियाते कहा।
"वैसे तो चार सौ बनते हैं, पर त्योहारी सीजन है, तुम दो सौ छत्तीस दे दो।"
"माफ कीजिएगा सर! चार सौ का आधा तो दो सौ हुआ न! फिर ऊपर से ये छत्तीस काहे के?"
"मरी सरकार का जीएसटी बंधु, जीएसटी। इस सरकार ने भी न जनता को तो जनता का, हमारा भी खून पी कर रख दिया है।" वे इधर उधर देखते मुँह-सा बनाते दर्दियाए।
"पर सर! जीएसटी तो...."
"धीरे दोस्त धीरे। देखो दोस्त! जीएसटी तो अब शमशान की लकडि़यों पर भी लग रहा है और ये तो अंधेरे से उजाले के ओर की तुम्हारे दोस्त की यात्रा है। तुम दो सौ दो या न, पर जीएसटी तो हर हाल में लेकर रहेंगे। ये सरकार के खाते में जमा होता है।" मैंने उन्हें दो सौ चालीस थमाए तो वे मुस्कुराते हुए पूरी ईमानदारी से अपनी जेब में चार रूपए वापस करने को हाथ-पाँव मारने लगे।


- अशोक गौतम
 
रचनाकार परिचय
अशोक गौतम

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