प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

कृष्णा सोबती के उपन्यासों में नारी जीवन के विविध रूपों का यथार्थ
- डॉ. विरल पटेल


"गृहस्थी की सारी शोभा नामों की है। यह इसकी पत्नी है, बहु है, माँ है, नानी है, दादी है, फिर वही खाना, पहनना और गहना। लड़की वह नाम की महारानी है सब कुछ पोंछ-पोंछ कर उसे बिठा दिया जाता है। अपनी जगह पर।"1

नारी जीवन से सम्बन्धित सभी समस्याओं को विषय का आधार बनाकर परिवार को समाज की सर्वप्रथम व सबसे छोटी इकाई सिद्ध किया है। समाज में उसका माँ, बेटी, पत्नी के अतिरिक्त और भी विविध रूपों में स्थान निर्धारित है। अनेक रिश्तों में जकड़ी कुण्ठा, त्रास, घुटन, बलात्कार, यौनेच्छा की भावना से पीड़ित नारी जीवन के सभी रूपों की नग्न तस्वीर साहित्य की शोभा बढ़ाने वाली सोबतीजी ने अपने उपन्यासों में सुधि पाठकों के समक्ष रखी है। उन्होंने नारी को केंद्र में रखकर उसका यथार्थ चित्रण माँ, बेटी, बहु, विधवा, वृद्धा, वन्ध्या, प्रेमिका आदि विभिन्न रूपों में किया है।


माँ का मन ममता एवं वात्सल्य से सदैव तर रहता है। भले संतान उसकी अवहेलना या तिरस्कार करती हो फिर भी माँ सन्तान के प्रति सहज ही रहती है। सोबतीजी के साहित्य में माँ के अलग-अलग स्वरूप है–
पाशो निष्कलंक है मगर उसकी माँ के चारित्रिक दौर्बल्य का त्रास पाशो को झेलना पड़ना है। परिवार में सब उसे ताने मारते हैं। नानी उसे कर्मजली कहती है।
मित्रो की माँ मित्रो की काम लालसा को समझती है लेकिन अपनी बेटी के लिए वह स्वयं के प्रेमी को तैयार करती है और कहती है– "यह झमेला तू छोड़ मुझ पर। अरी तेरी माँ खिलाड़िन है, बड़े-बड़े बाघ छका डाले।"2 इस प्रकार एक माँ अपनी ही बेटी को वेश्या बनाने की राह पर धकेलने का प्रयास करती है।
एक तरफ तीन पहाड़ में श्री दा की माँ है, जो अपने बेटे का सम्बन्ध उसकी प्रेमिका जया से करवाती है तथा विदेश से लौटने पर विवाह निश्चित करती है मगर श्री दा विदेश में ऐड्रना से विवाह कर लेते हैं। श्री दा की माँ उसे बहु रूप में अपनाने से मना कर देती है और कहती है– "कह देती हूँ कानु! घर की बहु जो थी, वही रहेगी। ले देकर उस साहबन को परे कर नहीं तो जान ले, अन्न जल ग्रहण किये बिना ही मैं अपनी जान ले लूँगी।"3 इस प्रकार जहाँ एक तरफ एक माँ अपनी बेटी को वैश्यावृत्ति की ओर धकेलने का प्रयत्न करती है तो दूसरी तरफ श्री दा की माँ ऐड्रना को बहु रूप में स्वीकार न करके अपने बेटे को फटकारती है।


'ऐ लड़की' की अम्मू, जो कि रुग्णावस्था में बिस्तर पकड़े है; लेटे-लेटे अपनी बेटियों को आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाती है एवं स्वयं के कड़वे-मीठे अनुभवों से उन्हें सिखाती है। अपनी बेटी से विवाह याचिका, समय के महत्व को समझाते हुए करती है- "यह गठरी अपने कंधो पर उठा रखी है तुमने। फेंक दो, परे फैंक दो। लड़की समय को खाक न कर। सम्भल जा।"4 अम्मू के माध्यम से लेखिका ने माँ होने की विशिष्टता की पहचान करवाई है। कहती है– "अपनी समरूपा उत्पन्न करना माँ के लिए बड़ा महत्वकारी है; पुण्य है। बेटी के पैदा होते ही माँ सदाजीवि हो जाती है। वह कभी नहीं मरती, हो उठती है निरन्तरता। वह आज है। कल भी रहेगी, माँ से बेटी तक।…….वह सृष्टि का स्त्रोत है।"5 एक माँ है जो सन्तान को सही गलत की उचित पहचान कराकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है लेकिन यहाँ लेखिका ने अपने साहित्य में माँ के एक अनोखे रूप को भी चित्रित किया है, जो स्वयं अपनी पुत्री को वेश्यावृत्ति के गर्त में धकेलने का प्रयास कर रही है। सोबतीजी की लेखनी को पढ़ने के बाद लगा कि लेखिका ने जितने करीब से नारी के हर पहलू पर नज़र डाली है। वहाँ तक पहुंचने के लिए दिव्य दृष्टि का होना ज़रूरी है।

बेटी घर की रौनक होती है। लेखिका ने भी नारी के इस रूप से अपने साहित्य की रौनक बढ़ाने का प्रयास किया है और वे सफल भी रही हैं। 'डार से बिछुड़ी' उपन्यास की नायिका पाशो, जिसकी माँ शेख सज्जन के साथ भाग जाती है। ननिहाल में सब उसे ताने मारते हैं। नानी कहती है– "इस मुँह उसका नाम लूँ बिटिया, उसी की करनी तुझे भरनी थी।…..वह नाश होनी घर भर का मुँह काला कर गयी।"6 माँ की करनी का फल पाशो को भुगतना पड़ता है। इतना ही नहीं उसके ओढ़ने-पहनने पर भी उसे मामी द्वारा टोका जाता है।

विवाहोपरांत अतृप्त काम-वासना से पीड़ित मित्रो पीहर आती है। अपनी माँ को डिप्टी के साथ देखकर सवाल करने पर माँ कहती है– "तेरी माँ के ज़माने लद गये री, मित्रो……..अब इस उसरी ठंडी भद्दी का कोई वाली- वारिस नहीं।"7 वास्तविकता को जानकर मित्रो पुनः अपने पति के पास छिपा हुआ प्रेम प्रकट करती है। पराये मर्दों के साथ हँसने-बोलने वाली काम-वासना की कुण्ठा को झेलने वाली अतृप्त मित्रो, माँ के बहकावे में आने के बजाए विवेक पूर्ण निर्णय लेकर पुनः पति के पास लौट जाती है।

'ऐ लड़की' की अम्मू जब अपनी बेटी को विवाह हेतु समझाती है तो आधुनिक विचारों से लबरेज़ लड़की कहती है– "मैं किसी को नहीं पुकारती। जो मुझे आवाज़ देगा, मैं उसे जवाब दूँगी।"8 यहाँ नारी की सार्थकता परिवार से मानने वाली माँ के विपरीत बन्धन मुक्त जीवन जीने वाली आधुनिक विचारों वाली लड़की खुली हवा में साँस लेना चाहती है।
लेखिका ने जहाँ मित्रो के माध्यम से अपनी मिट्टी के संस्कारो को जीवित रखा तो दूसरी तरफ माँ के कर्मों का फल भुगत रही पाशो की दयनीय स्थिति को दर्शाया है। वहीं इन सबके बीच 'ऐ लड़की' में आधुनिक विचारों वाली लड़की के स्वयं को पुरुषों से कम न समझने की भावना को उकेरा है।


'जैनी मेहरबान सिंह' उपन्यास में मेहरबान सिंह की बेटी जैनी लेखिका के अन्य पात्रों से सर्वथा अलग है। जैनी का जन्म और परवरिश विदेश में हुई है फिर भी वह पंजाब की संस्कृति, सभ्यता को अपने से अलग नहीं मानती। भारतीय एवं पाश्चात्य संस्कारों का समन्वय है जैनी। अपने पापा और मारिया के सम्बन्धों के बारे में जैनी को मालूम है। वह कहती है– "बड़ी जो हो रही हूँ पपा। मारिया मेरे पपा को खूब चाहती है। उसे अंगूठी पहना देने में इतनी कंजूसी क्यों?" 9 खुले विचारों वाली जैनी में माता एवं मातृभूमि के प्रति प्रेम भी कूट-कूट कर भरा है। वह आदर्शों को मानने वाली बेटी है। विदेशी मेहमानों के लिए केम्फायर आदि के आयोजन करने वाली जैनी में भारतीय सभ्यता व संस्कृति को ज़िन्दा रखकर नई पीढ़ी को सन्देश देने का प्रयास लेखिका ने जैनी के माध्यम से किया है। 'जैनी मेहरबान सिंह' उपन्यास को पढ़कर लगता है कि लेखिका का हर कृति में कुछ नया करने का निराला अंदाज़ है। जैनी की कल्पना लेखिका को वाकई नई ऊंचाइयाँ प्रदान करती है।

प्रकृति की छाया में चल रहे 'तीन पहाड़' कथानक की नायिका जया श्री दा की बचपन की साथी और प्रेमिका, जिससे विदेश से लौटकर आने पर विवाह करने वाले थे; उसकी करुणातीत निराशाजनक ज़िन्दगी की कहानी है। श्री दा विदेश जाकर ऐड्रना से शादी कर लेते हैं। तपन जया को सहारा देते हैं मगर वह श्री दा को नहीं भूला पाती। अंत में स्वयं को तिस्ता के हवाले कर देती है– "लैंडरोवर की लाइट पुल के उस पार से कौंधी कि मुँडेर पर कोई कपड़ा झिलमिलाया, एक प्राण दहला देने वाली चीख और सब समाप्त। सब शेष हो गया।"10 जहाँ अन्य नायिकाएँ बड़ी साहसी एवं जुझारू हैं, वही जया का अवतरण बिल्कुल विपरीत। अन्य उपन्यासों को पढ़ने के बाद जब 'तीन पहाड़' को पढा तो जया का चित्रण चौंकाने वाला था। वाकई सोबतीजी कब, किसे उकेर दें; कुछ पता नहीं। वर्तमान दौर में प्रेम-प्रसंगों की कुंठाग्रस्त मानसिकता में आत्महत्या तक की परिणति आम बात है। लेखिका ने इसे उपन्यास के कल्पना पट पर अनोखे ढंग से चित्रित किया है। ग्रामीण अंचल की खुशबू समेटता 'ज़िंदगीनामा' तो मानो प्रेम का सागर है। प्रेम का अत्यंत पावन रूप उपन्यास में देखने को मिलता है। प्रेम की पूर्णता हेतु जो हिम्मत लेखिका की नायिकाओं ने दिखाई है, अलौकिक है– "आराइयों की फतह के घर न लौटने पर गाँव में गहमा-गहमी मच गयी। शाम को शाहजी ने अलिये को बुलवाया। लड़की झुरमुट के पीछे शीरे नाम के लड़के के साथ नींद में बेखबर मिली। लड़की अपने प्रेमी से कहती है– "तुम्हें सौंह है अल्लाह पाक की जो तू कौल से मुड़ा। तुम्हें मार डालूंगी और आप दरिया में डूब मरूँगी।"11 बुजुर्गों ने दोनों का निकाह पढ़ दिया।

चाची महरी और गणपत शाह की प्रेम कहानी तो गाँव का बच्चा-बच्चा जानता है। सरदारी जी और शाह का प्रेम समाज को मान्य नहीं था। मुआमला अदालत जा पहुंचा। भरी अदालत में चाची कहती है– "साहब जी, मुझे बेवा हुए तीन साल हुए। अदालत समझे मैं खेलूँ गुड्डीयाँ और न मैं सोलहवें साल। मैं बालिग हूँ। मेरे अक्ल होश ठिकाने हैं। अपना भला-बुरा समझती हूँ। अपनी मर्जी से सरदारों की दहलीज लांघ आयी हूँ।"12

राबयाँ का प्रेम तो अलौकिकता की सारी हदें पार करता नज़र आता है। राबयाँ की सुरीली आवाज़ के दीवाने थे शाह साहब। आलिये ने जब अपनी बेटी की शादी के लिए भागदौड़ शुरू की तो राबयाँ खुलकर अपने प्रेम को अभिव्यक्त करती है– "शाह साहब, मैंने आपको दिल में ऐसे धार लिया है जैसे भगत मुरीद अपने साईं को धार लेते हैं।"13


समय सरगम की आरण्या ईशान द्वारा दिए गए साथ रहने के निमंत्रण को स्वीकारती है। आरण्या कहती है– "मैं पहले से कहीं अच्छा महसूस करती हूँ।"14 यहाँ साबित हो जाता है प्यार उम्र की चीज़ नहीं, अपितु प्यार वह क्षितिज है जहाँ दो मन मिलते हैं।
प्रेम की ताकत पर लेखिका को विश्वास है। उनके कुछ पात्रों की प्रेम परिणति निराशाजनक है तो कुछ में वो अलौकिक शक्ति है की उनके पात्र बेझिझक अपने प्रेम को सरेआम अभिव्यक्त करते हैं। इनके सामने कुल, धर्म और उम्र आड़े नहीं आते।


पारिवारिक जीवन में पति यदि आधार स्तम्भ है तो पत्नी उस आधार स्तम्भ की नींव। पति-पत्नी के मध्य सम्बन्धों का सीधा असर परिवार पर पड़ता है। घर से भागने के बाद 'डार से बिछुड़ी' की पाशो का विवाह बूढे दीवानजी के साथ हो जाता है। अपने से अधिक उम्र का होने के बावजूद वह गहने कपड़ों से लदी दिन रात उसके (बूढ़े पति के) लाड़-प्यार में इठलाती रही।

'ज़िंदगीनामा' की शाहनी (फतेह) और छोटी शाहनी (राबिया) दोनों अपने पत्नी धर्म का निर्वहन पूर्ण समर्पण के साथ करती हैं। तो वहीं दूसरी तरफ मित्रो अपने पति के ठंडेपन की वजह से माँ न बन पाने के कारण उसके और सरदारीलाल (पति) के बीच झगड़ा होता रहता है। मित्रो अपने पति को छोड़कर अपनी माँ के पास चली जाती है।

'दिलो दानिश' की कुटुम्बप्यारी तो बात-बात पर वकील साहब से लड़ने लगती है। इस प्रकार लेखिका ने पति-पत्नी के रिश्तों में भी एक तरफ अपने पति के प्रति पूर्ण समर्पित नायिकाएँ खड़ी की हैं तो दूसरी तरफ मित्रो और कुटुम्बप्यारी के रूप में असमर्पित।


'दिलो दानिश' उपन्यास की नायिका सपत्नी महकबानो है, को परिस्थितिवश वकील साहब सहारा देते हैं। उसके प्यार में फंस जाते हैं। कुटुम्बप्यारी को इस बात की भनक लग जाती है और वह महकबानो को देखना चाहती थी। पत्नी-सपत्नी के बीच द्वन्द्व जग जाहिर है। मासूमा की शादी के समय वकील साहब ने महकबानो को जैसे-तैसे किनारे करने की कोशिश की थी तो महकबानो अपने अधिकारों को लेकर चेत गयी। उस दिन पहली बार महकबानो ने वकील साहब से अपने ज़ेवरों की माँग की। उस पर वकील साहब को आश्चर्य हुआ। लेखिका ने संघर्षरत सपत्नी को अपने साहित्य में स्थान दिया है। तवायफ की बेटी होने के बावजूद जो गुण और शीलता महक में दिखाई है, उससे वह कुलीन परिवारों की स्त्रियों से कम नहीं लगती।

विधवा होना नारी जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है। सोबतीजी ने अपने उपन्यासों में वैधव्य जीवन के आधुनिक एवं रूढ़िगत दोनों ही प्रकार के चित्रों को चित्रित किया है। पाशो (दिलो दानिश), चाची महरी (ज़िंदगीनामा), छुन्नी (दिलो दानिश) ऐसी विधवाएं हैं, जो अपने वैधव्य को स्वीकारते हुए बहुत साधारण ज़िन्दगी जीती हैं। पाशो के विधवा होने के पश्चात उसके पति के रिश्तेदार बरकत दीवान उसका सारा धन लूटता है और पाशो को बूढ़े लालाजी को बेच देता है– "चुपचाप पड़ी रह तेरी कूक फरियाद सुनने वाला दूर-दूर तक कोई नहीं।"15 लालाजी का मंझला पुत्र उसे अलग लेकर रहता है मगर युद्ध में वह मारा जाता है। अंत में पाशो शरणार्थी से जा मिलती है।
 

घर की औरतें छुन्नी के कमरे के आगे से नहीं, पीछे से निकलती हैं तो बिगड़कर छुन्नी कहती है– "एक नाम धर दिया है हमारा, विधवा। एक तो हर सगुन शास्त्र के बाहर, उस पर इन सब खामियों नाकामियों के ज़िम्मेदार भी हमीं। इनके लिए दुबारा से निकाल दें बिछुए और टिकुली। हद है अंधविश्वास की।"16
इस प्रकार सोबतीजी ने वैधव्य जीवन में आने वाली परेशानियों को उजागर किया है।

वृद्धावस्था में अपनी ही सन्तान द्वारा अवहेलना होने के बावजूद सन्तान के प्रति उनका वात्सल्य, स्नेह, फिक्र कम नहीं होती। लेखिका के उपन्यास 'समय सरगम' और 'ऐ लड़की' की नायिकाएँ बूढ़ी औरतें हैं। इन उपन्यासों के अतिरिक्त डार से बिछुड़ी, ज़िंदगीनामा, दिलो दानिश आदि की वृद्धाएं भी कथानक विस्तार में मुख्य भूमिका वहन करती हैं। 'ऐ लड़की' की सकुन्ती मृत्युशय्या पर बीमारी और बुढ़ापे की जंग लड़ रही है। उसमें जीने की लालसा है फिर भी मृत्यु से भयाक्रांत नहीं। वह कहती है– "जीना और जीवन छलना नहीं। इस दुनिया से चले जाना छलना है।"17


'समय सरगम' तो मानो वृद्धों की आलीशान नगरी है। दूसरा हर पात्र वृद्ध। आरण्या वृद्ध है पर तन से, मन को अभी भी वो जवान बनाये रखे है– "निःशब्द है समय, पर इसमें भी बहुत कुछ धड़क रहा है।"18 दमयन्ति वृद्धाश्रम की शरण लेती है और मृत्यु भय से परेशान रहती है। कामिनी ने युवावस्था में बड़े आत्मविश्वास के साथ अपना केरियर बनाया था। पर अब उसे डर रहता है कि कोई नींद में उसका गला न घोंट दे। कुछ भी हो, इतना तो तय है कि समाज में लोग अब वृद्धों की स्थितियों से मानसिक रूप से सामंजस्य बनाने के लिए प्रयत्न नहीं करते या यूँ कहें कि आधुनिक चकाचौंध और फैशन के साथ वृद्धों को अपनाने में अपने को हीन समझते हैं। "तिरस्कार और अवमानना के तीखे अनुभवों, मृत्यु, भय आदि से परेशान बूढ़ी औरतों के जीवन की सहज अभिव्यक्ति कृष्णा सोबती की रचनाओं की खास उपलब्धि है।"19

समाज में कलंक का ज़हरीला घूंट पीने वाली औरत वैश्या जीवन को यूँ ही नहीं अपना लेती है। उसके पीछे उसकी अपनी मजबूरियाँ होती है। इसमें मुख्य कारण है आर्थिक विवशता। 'मित्रो मरजानी' में मित्रो की माँ वैश्या के रूप में जीवन यापन करती है। उम्र के पड़ाव पर अब उसका कोई ग्राहक नहीं है, ज़िन्दगी मानो वीरान हो गयी है। समाज उसे स्वीकारता नहीं और प्रेमी अब आते नहीं। अपने हालात वो मित्रो से कहती है– "बेटी, मुझे अब अकेले छोड़ न जाना। मैं सरदारीलाल को मना लूँगी।"20

वन्ध्या नारी की स्थिति का ज़िक्र भी लेखिका ने अपने कथा साहित्य में किया है। माँ बनना हर स्त्री के जीवन का सपना होता है। उसी में वह अपने जीवन की पूर्णता समझती है। मित्रो की भी माँ बनने की अदम्य चाहत है, वह मायूस होकर बोलती है– "मेरा बस चले तो गिनकर सौ कौरव जन डालूँ, पर अम्मा अपने लाडले बेटे का भी तो आड-तोड जुटाओ। निगोड़े मेरे पत्थर के बुत में भी कोई हरकत तो हो।"21


इतना ही नहीं; समय सरगम, सूरजमुखी अंधेरे के तथा ऐ लड़की की नायिकाएँ जो अकेली जीना ही जीवन की सार्थकता समझती हैं। रत्ती का सम्बन्ध अनेक पुरुषों से है लेकिन किसी के साथ उसका विवाह नहीं होता, इसका कारण रत्ती की शारीरिक कमज़ोरी। लेकिन फिर भी वह अपनी इस क्षमता का फायदा किसी मर्द को उठाने नहीं देती। स्त्री को उस पुरुष का इंतज़ार है, जिसे जीवनसाथी के रूप में रत्ती की ज़रूरत है।

'ऐ लड़की' की चित्रा का मानना है– "लड़की, अपने आप में आप होना परम् है।"22 चित्रा आधुनिक विचारों से युक्त कामकाजी महिला है। शादी न करने में ही जीवन की सार्थकता मानती है। 'समय सरगम' की आरण्या को बन्धन में विश्वास नहीं है। उसका मानना है व्यक्ति का विकास परिवार की घुटन एवं कुण्ठा से भरी परिस्थिति में असम्भव है। हर व्यक्ति को अपने बूते पर ही जीवन की सार्थकता सिद्ध करनी होगी। आरण्या सोबती जी की वो नारी पात्र है, जो सिद्ध करती है कि विवाह व्यक्ति के लिए अनिवार्य नहीं है।


स्पष्ट है कि स्त्री के साथ जीवन के कई नामचीन रिश्ते जुड़े हुए हैं। पुरुष सत्ता के अधीन रहकर वह उसका भली प्रकार निर्वहन भी करती है। निर्वहन प्रक्रिया के बीच अपने कुछ सपने और कुछ इच्छाओं का दमन होते हुए भी देखती है। लेखिका के नारी पात्र कुण्ठा, घुटन, त्रास, अकेलेपन, यौन शोषण से पीड़ित हैं तो कहीं इतने वाचाल हैं कि अपनी प्रेमाभिव्यक्ति या कामतृष्णा की बातें करते भी उन्हें संकोच नहीं होता। वहाँ भाषाई मर्यादा के बंधन भी शिथिल हो जाते है। सोबतीजी ने अपनी तूलिका से नारी जीवन के विविध रंगों को यथार्थ के रंगों से रंगा है।





सन्दर्भ ग्रन्थ सूची:-
1. ऐ लड़की, कृष्णा सोबती, पृ.-76
2. मित्रो मरजानी, कृष्णा सोबती, पृ.- 92
3. तीन पहाड़, कृष्णा सोबती, पृ.-117
4. ऐ लड़की, कृष्णा सोबती, पृ.- 93
5. वही पृ.- 56-57
6. डार से बिछुड़ी, कृष्णा सोबती, पृ.-11
7. मित्रो मरजानी, कृष्णा सोबती, पृ.-97
8. ऐ लड़की, कृष्णा सोबती, पृ.-56
9. जैनी मेहरबान सिंह, कृष्णा सोबती, पृ.-15
10. तीन पहाड़. कृष्णा सोबती, पृ.- 90
11. ज़िंदगीनामा, कृष्णा सोबती, पृ.-196
12. वही, पृ.-49
13. वही, पृ.-370
14. समय सरगम, कृष्णा सोबती, पृ.-132
15. दिलो दानिश, कृष्णा सोबती, पृ.-20
16. वही, पृ.- 121
17. ऐ लड़की, कृष्णा सोबती, पृ.-53
18. समय सरगम, कृष्णा सोबती, पृ.-15
19. कृष्णा सोबती: व्यक्ति एवं साहित्य, डॉ. ब्रिजिट पॉल, पृ.-106
20. मित्रो मरजानी, कृष्णा सोबती, पृ.-89
21. वही, पृ.-72
22. ऐ लड़की, कृष्णा सोबती, पृ.-76


- डॉ. विरल पटेल
 
रचनाकार परिचय
डॉ. विरल पटेल

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