अगस्त 2015
अंक - 6 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

एक नव विवाहित बेटी का अपनी माँ के नाम पत्र

प्यारी माँ,

जबसे होश सँभाला है, ममता का चेहरा तुमको ही माना है। मैं नहीं जानती थी कि तुम मेरी माँ हो। सबने मुझे बताया और तुमने भी यही जताया कि सिर्फ तुम ही मेरी माँ हो सकती हो। क्योंकि सिर्फ तुम ही तो हो जो बिन कहे मेरी हर बात समझ लेती हो। तुमको पता है की मुझे कब और क्या खाना है, कब किस चीज़की मुझे कितनी ज़रुरत है। तुमने मुझेजन्म दिया है सिर्फ इसलिए माँ नहीं बोलती बल्कि इसलिए बोलती हूँ क्योंकि तुमने मुझे बनाया भी है। मैं तो चलना, बोलना, खुद ही खाना कुछ भी नहीं जानती थी। तुमने ही मुझे आत्मनिर्भर होना सिखाया है। फिर अचानक आज तुम ही मुझसे बोल रही हो कि मैं किसी और को भी माँ बोलूँ और उनको भी वो दर्जा दूँ, जो मैंने आज तक सिर्फ तुम्हारे लिए ही रखा था। आज इतने सालों के बाद तुम बोल रही हो कि यह घर जिसमें मैंने अपना बचपन बिताया वो मेरा घर नहीं हैं, मेरा घर अब मेरा ससुराल है। क्योंकि तुमने कहा है इसलिए कोई बहस नहीं की मैंने और न चाहते हुए भी, तैयार हो गयी नये घर और नयी माँ को स्वीकार करने के लिये।


नये घर में मेरा स्वागत हुआ। मेरी आरती भी उतारी गयी। किसी ने बहू बोला, किसी ने लक्ष्मी बोला मगर अभी तक किसी ने बेटी नहीं बोला। हो सकता है थोड़ी देर में बोलेंगे यही सोचकर मैंने इंतज़ार शुरू कर दिया, जो आज तक कर रही हूँ।
इस नये घर में सब अच्छे हैं मगर मेरे पुराने घर जैसा कुछ नहीं है यहाँ पर। मैं सुबह सब के लिए चाय बनाती हूँ। मेरे पुराने घर पर भी बनाती थी। याद है ना पापा और तुमको मेरी हाथ से बनी चाय कितनी पसंद थी। मगर वहाँ कुछ पकाते हुए अगर मेरा हाथ जल जाये तो पूरा परिवार किचन में जमघट लगा देता था। तुम तो जानती हो ना! अपनी अल्हड़ बेटी को, आज भी रोटी सेंकते हुए तवे से मेरा हाथ जल गया। घर में किसी ने भी ध्यान नहीं दिया, शायद सब व्यस्त होंगे इसलिए मैंने ही खुद सबको अपना हाथ दिखाया, मगर सब ने अनदेखा कर दिया। यही बात तुमको बताई तो तुमने कहा कि अब मैं यह बचकानी हरकत छोड़ दूँ। छोटी-मोटी चोट और दर्द को सहने की आदत डाल लूँ क्यूँकि अब मैं बच्ची नहीं रही और वो मेरा मायका नहीं बल्कि ससुराल है। वहाँ मेरे नखरे कोई नहीं सहेगा। हाथ जलना कब से तुम्हारे लिए बचकाना हो गया माँ? बस दो दिन में ही मुझे छोटी-सी गुड़िया से बड़ी बहुरानी बना दिया सबने। मेरे हाथों की जलन को एक नौटंकी का ख़िताब दे दिया सबने।


इस नये घर में जो माँ हैं वह ना तो मेरे बालों में तेल लगाती हैं और ना ही मेरे साथ खुलकर हँसी-मज़ाक करती हैं। जब देखो एक के बाद एक काम देती रहती हैं। शायद यही इनका स्वभाव होगा और फिर जो माँ काम करवाये उसको बुरा तो नहीं कह सकते इसलिए मैं चुपचाप सब करती रहती हूँ। इस नये घर के क़ायदे किसी ने भी, कभी बताये नहीं और अगर कभी कोई चूक हो जाये तो सब तुमको ताने देते हैं माँ। कहते हैं माँ ने नहीं सिखाया कुछ भी। जब में गलती करती थी, तो तुम मुझे सीख देती थी। मगर कभी ऐसे ताने नहीं देती थी। शायद इसलिए क्योंकि उस वक्त सिर्फ तुम इकलौती माँ थी मेरे जीवन में, तो तुलना का प्रश्न ही नहीं था।
तुमको याद है तुम मुझे अपनी हर बात बताती थी। हमारे घर में किसी से भी कुछ भी छुपाया नहीं जाता था, क्यूँकि तुम कहती थी कि परिवार को हक़ होता है सब सुख-दुःख जानने का। इस नये घर में सब अपने आप  में रहते हैं, मुझे कोई भी कुछ नहीं बताता। पता नहीं बंद कमरे में क्या फुसफुसाते रहते हैं और जैसे ही मैं उनके बीच आती हूँ सब चुप हो जाते हैं। कभी-कभी लगता है जैसे मैं इस घर की हूँ ही नहीं। अब देखो ना! पहले वाले घर पर मैं जब चाहे अपनी सहेलियों को बुला लेती थी, वह भी तुम से पूछे बिना ही मगर इस नये घर के नियम थोड़े अजीब हैं। यहाँ किसी को भी कभी भी मैं यूँ हीं नहीं बुला सकती हूँ। पहले नयी माँ की इज़ाज़त लेनी होगी, हो सकता है वो मना भी कर दे। लेकिन मैं नाराज़ नहीं होती हूँ, याद है मुझे तुम भी कई बार मुझे मना करती थी। इसलिए चुपकर के रह जाती हूँ। मगर इस मन का क्या करू जो रह-रहकर फिर से बचपन के खेल और दोस्तों के लिए मचलता है।


इस नये घर में भी एक बेटी है, वो जो भी चाहे कर सकती है। जींस भी पहन सकती है, मौज मस्ती भी कर सकती है। बिल्कुल वैसे ही जैसे मैं अपने पुराने घर में किया करती थी। मगर तुमने तो कहा था कि इस नये घर को अपना समझूँ मगर यहाँ तो मेरी आज़ादी पर बहुत सी पाबंदियाँ हैं। मुझे वही खाना और पहनना पड़ता है, जो मेरे लिए तय किया गया हो। मेरी मर्ज़ी मुझसे कोई नहीं पूछता यहाँ पर। खैर तुमने मुझे यहाँ भेजा है तो इसमें जरूर मेरी भलाई ही होगी इसलिए पूरी कोशिश करती हूँ सबको खुश करने की और आगे भी करती रहूँगी। तुमको वचन जो दिया है।
बस एक उलझन है। अब तक यह समझ ही नहीं पायी हूँ कि मैं किसकी बेटी हूँ? उसकी जिसने मुझे जन्म दिया या उसकी जहाँ मेरी विदाई हुई है। उसकी, जो मेरे बालों में तेल लगाकर मुझे लोरी सुनाती थी या फिर उसकी, जिसके पैरों की रोज़ मालिश करके मैं सोने जाती हूँ। मैं इस नई माँ से नाराज नहीं हूँ मगर तुम्हारी बहुत याद आती हैं। नई माँ बुरी नहीं है मगर वो मुझे बेटी नहीं मानती और तुम मुझे बेटी मानती हो। बस इतना-सा अंतर है। एक बार तो उन्होंने बोला भी था कि बेटी और बहू मैं बहुत अंतर होता हैं। जब इतना सब तुमने सिखाया तो यह अंतर भी सिखा देती, मेरे लिए थोड़ी आसानी हो जाती। मगर हो सकता है घर-गृहस्थी के कामों में तुम भूल गई होगी। दु:खी मत हो, मैं कोशिश कर रही हूँ। धीरे-धीरे सीख जाएगी तुम्हारी बेटी भी।


एक और बात मुझे बेचैन करती है। अब मैं तुम्हारे पास उस अधिकार के साथ नहीं रह सकती हूँ, जैसे पहले रहा करती थी। शायद इसलिए क्यूंकि अब मैं बड़ी बहुरानी हूँ और बेटी की मौत तो विदाई के वक़्त ही हो गयी थी। शायद उसकी चीख़ किसी ने भी ढोल-नगाड़ों के शोर में ना सुनी हो मगर वो रो रही थी। क्योंकि उसको बेटी बनकर ही जीना पसंद था। एक रात में ही कई साल बड़ा कर दिया उसको शादी के बंधन ने। फूलों वाली गुलाबी फ़्रॉक में उछलती-कूदती गुड़िया आज अपना आँचल संभाल रही है। हर बात पर बेधड़क माँ-माँ चिल्लाते और अपनी मन-मर्जी करती बेटी आज सासु माँ के सामने सोच-समझकर अपनी बात रख रही है।
कल मेरे पतिदेव जब अपनी माँ से लाड करवा रहे थे तो तुम मुझे बहुत याद आई और मैंने सोचा कि में भी सासु माँ से लिपट कर तुमको महसूस करूँ, मगर साथ खड़ी मेरी ननद ने रोक दिया और कहा कि वो मेरी सास हैं, माँ नहीं। इतना ही लाड करवाने का मन कर रहा है तो पीहर चली जाओ और मैं चुपचाप वहीँ एक कोने में तुमको याद करती रही


मैं जानती हूँ माँ, जितना मैं तुमको याद करती हूँ, उतना ही या शायद उससे भी ज़्यादा तुम मेरे लिए तरसती होगी। इसलिये मैंने तुम्हारे लिए एक उपाय सोचा है, मैंने सुना है तुम भी बहू लाने वाली हो। मेरी एक बात मानोगी माँ। उसको बहू मत बोलना। बेटी बोलना और उसको वैसे ही स्नेह देना जो तुम कभी मुझे देती थी। वह भी तो अपनी माँ को छोड़कर आयेगी। और सच मानो माँ, इस दुनिया में माता-पिता से जुदा होने से ज़्यादा तकलीफ किसी और बात में नहीं होती। यही कारण होगा कि बच्चा जन्म के वक़्त जब माँ की नाभि से अलग होता है तो इतना रोता है। मैं अपना दुःख नहीं रो रही हूँ बल्कि बताना चाहती हूँ कि बहुत मुश्किल होता है अपने घर को छोड़कर एक नये घर में बसना, जहाँ हर चेहरा नया है। कितना अच्छा हो अगर तुम उसे थोड़ा समय दो इस नये माहौल में ढलने के लिए। अगर तुम उसको बेटी मानोगी तो तुमको उसके चहरे में मेरी परछाई नज़र आयेगी और तुम्हारा अतुल्य प्यार पाकर उसे भी शायद अपनी माँ मिल जाये। अपनी बेटी के लिए एक बार कोशिश जरूर करना।

हर पल तुमको और अपने घर को याद करती

तुम्हारी लाड़ली


- मनीषा श्री

रचनाकार परिचय
मनीषा श्री

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