प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2018
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषांतर
एकांकी : चक्षुदान 
अंश : 4 (अंतिम)
लेखक : गौतम राय 
बांग्ला से अनुवाद : मल्लिका मुखर्जी 
चरित्र : श्यामल, निर्मल, हिरेन, दूर्वा, वृद्ध 
 
 
(एक वृद्ध का आगमन)
वृद्ध : क्या यह श्यामल मजुमदार का निवास स्थान है?
तीनों :आप कौन हैं?
वृद्ध : बता रहा हूँ...बता रहा हूँ ...थोड़ा सुस्ता लेने दो। बड़ी दूर से आया हूँ।
हिरेन : गुड़ देखते ही मक्खियाँ आ जाती हैं। शामला...कौन है ये चाचा?
श्यामल : मैं नहीं जानता इन्हें।
हिरेन : क्या बात करता है! तू तो साला कोई इतना इम्पोर्टेन्ट व्यक्ति नहीं है कि तू न जानता हो ऐसा कोई व्यक्ति, जो तुझे जाने! तेरे दादा जी तो नहीं?
निर्मल : नहीं, हमारे कोई दादा जी नहीं है।
हिरेन : ये तो कोई उठाईगीर लगता है।
वृद्ध : उठाईगीर? ऐसा शब्द तो कभी सुना नहीं। मैं जिस डिपार्टमेंट में काम करता हूँ...
दूर्वा : क्या? आप अभी भी नौकरी करते हैं, इस उम्र में?
वृद्ध : हाँ बेटे, करता हूँ। करनी पड़ेगी, अनंतकाल टकटक करनी पड़ेगी। हमारी नौकरी का कोई अंत नहीं है।
हिरेन : देखा? ये देश की बेकारी की समस्या कैसे हल होगी? कल सुबह ही मैं श्रम मंत्री को फोन करूंगा। इस देश में जहाँ लाखों लोग बेकार है, यह बुड्ढा किस हैसियत से काम करता है?
वृद्ध : नहीं होगा बेटा। यह तेरे श्रम मंत्री का काम नहीं है। मेरी नौकरी पहले से ही पक्की है। सौ साल हुए मेरा तबादला होकर इसलिए थोड़ा चिंतित हूँ।
हिरेन : क्या बात करते हो? सौ वर्ष पहले तबादला हुआ था?
वृद्ध :  हाँ। अंदाजन छत्तीस हज़ार पाँच सौ दिन।
हिरेन : मुझे लगता है रात का नशा अभी तक उतरा नहीं। क्या लिया है, हेरोइन या चरस?
वृद्ध : कुछ कहा?
हिरेन : देशी या विलायती? नाम पता चले तो मैं भी आजमाना चाहता हूँ।
वृद्ध : सोमरस। यहाँ थोड़े ही मिलता है?
निर्मल : आप हैं कौन? ऐसी बकवास करने से बेहतर होगा कुछ काम की बात करें। या फिर चले जाइए यहाँ से। हम लोग अभी एक महत्वपूर्ण कार्य में व्यस्त हैं।
 
वृद्ध : आप लोगों की समस्या मुझे पता है।
श्यामल: आप को पता है?
वृद्ध : जी, चित्र दादा का बहीखाता देखकर ही तो दौड़कर आया हूँ।
हिरेन : चित्र दादा? ये कौन हैं? 
वृद्ध : नहीं समझे? चित्रगुप्त, मेरे वर्तमान बॉस का लेजर कीपर। मैं उसका असिस्टेंट हूँ।
श्यामल: आपका परिचय मेरी समझ में नहीं आ रहा। अभी मैं तो बड़ी मुश्किल में हूँ।
वृद्ध : पता है वत्स, पता है। ये तीनों तुम्हारी शराफ़त का फायदा उठाना चाहते हैं। हैं ना?
हिरेन : इसमें आप को क्या आपत्ति है? आप यहाँ क्यों आये हैं?
वृद्ध : मैं यहाँ दो कारणों से आया हूँ। क़रीब सौ वर्ष पहले एक छोटे-से पाप की मुझे बहुत बड़ी सजा मिली थी। तब मैं विधाता का दायाँ हाथ था।
हिरेन : ये विधाता भाई कहाँ रहते हैं?
वृद्ध :  वे जल-थल-अन्तरिक्ष सर्वत्र विराजमान हैं। स्वयंभू हैं।
हिरेन : लगता है अब मुझे सोमरस की ब्रांड ढूंढनी ही पड़ेगी।
वृद्ध : विधाता पुरुष ने एक बार कहा, ‘सृष्टि में पाप बहुत बढ़ गया है। रुद्र से कहो, जाकर सब तहस-नहस कर दे। यह ख़बर मैं रुद्र को देने जा ही रहा था कि रास्ते में रम्भा मिल गई। उसकी रसभरी बातें सुनते हुए रुद्र तक पहुँचने में देर हो गई और बस, विधाता ने मुझे सस्पेंड कर दिया। बहुत दिनों के बाद माफ़ तो किया पर मेरा तबादला यमराज के राजप्रासाद में कर दिया। मेरा सौभाग्य था कि यमराज उस वक्त अच्छे मूड में थे। उन्होंने मुझे चित्रगुप्त के फर्स्ट असिस्टेंट के पद पर पोस्टिंग दिया। लेकिन मुझे वहाँ ज़रा भी अच्छा नहीं लगता। रात दिन मौत के सन्देश भेजने पड़ते हैं। किसका समय कब है, उसका ध्यान रखना पड़ता है।
 
श्यामल : अच्छा! तो फिर आपने मेरी मौत का ..
वृद्ध : तुम्हारा बायोडेटा देखकर ही तो मैं चौंक गया, बेटे! ऐसा सरल, निर्मल और पवित्र लड़का तो दिया लेकर ढूंढने से भी नहीं मिलेगा।
हिरेन : ये सब दो नम्बरी बातें जाने दीजिए। आप यहाँ क्यों आये हैं वह बताइए।
वृद्ध : हक़ीकत में तुम तीनों जो लेने आए हो, वो पाने की तुम्हारी औकात ही नहीं है।
हिरेन : तो क्या आप भी श्यामल की आँखें लेने आए हैं?
दूर्वा : छी...छी...एक पैर कबर में लटक रहा है और आँखें चाहिए?
वृद्ध : ठीक कह रही हो बेटी, आँखें चाहिए एक जोड़ी, निर्मल...पवित्र आँखें। जिन आँखों में कोई उच्च आकांक्षा न हो, कोई भ्रम न हो, जिन आँखों में कोई मायावी काजल न लगा हो, ऐसी आँखें श्यामल की....मुझे अभी चाहिए। उसका जीवन अब ख़त्म हो गया है लेकिन मैं इन आँखों को अमरत्व देना चाहता हूँ।
हिरेन : फिर से भांग पी ली है क्या?
वृद्ध : भांग नहीं पी है भाई, पिछले सौ साल से मैं यह मौका ढूंढ रहा था। एक अच्छा काम करके फिर से विधाता के कार्यालय में पोस्टिंग पाने का अब मौका मिला है।
 
निर्मल : मौका? कैसा मौका ?
वृद्ध : सच बात तो ये है कि तुम पृथ्वीवासियों, ज़रा-सी मुसीबत आते ही ईश्वर का स्मरण करने लगते हो। और तो और किसी भी तकलीफ़ के लिए ईश्वर को ही ज़िम्मेदार ठहराते हो। इल्जाम लगाते हो कि विधाता की आँखों में मोतियाबिंद हुआ है। उनकी दृष्टि खराब हो गई है इसीलिए उसे कुछ दिखता नहीं है। देखो, एक तरफ़ तो कई लोग रुपयों के बिस्तर पर सो जाते हैं और दूसरी तरफ़ हजारों लोग फुटपाथ पर भूखे पेट सो जाते हैं। इसी कारण से मुझे लगता है कि विधाता की दोनों आँखों को तुरंत ही रिप्लेस करना जरुरी है वरना इस सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाएगा। इस बात से ख़ुद विधाता भी वाकिफ़ हैं कि आजकल उन्हें ठीक से दिखाई नहीं देता।
दूर्वा : लेकिन इसके लिए श्यामल की आँखें?
वृद्ध : जी, ऐसी स्वच्छ आँखें और किसी की नहीं।
निर्मल : विधाता की आँखें बदलने में आप को इतना इंटरेस्ट क्यों है?
वृद्ध : प्रमोशन भैया प्रमोशन। मैं मृत्युपुरी से स्वर्गपुरी में जाना चाहता हूँ। मेरा स्वार्थ तो है ही लेकिन इसका फ़ायदा तो सारी सृष्टि को मिलेगा।
 
निर्मल : तो फिर आप आई बैंक में क्यों नहीं गए?
वृद्ध : वहाँ अधिकतर आँखें मोतियाबिंद वाली ही है। अगर विधाता को सही नहीं दिखा तो फिर वही मुश्किल होगी। 
हिरेन : तो श्यामल की इन बड़ी बड़ी आँखों में ऐसा क्या है?
दूर्वा :  श्यामल सही व्यक्ति नहीं है वरना वचन देकर ऐसे धोखा देता?
निर्मल : अपने एक मात्र उत्तराधिकारी के साथ ऐसे बेईमानी करता?
वृद्ध : आँखों में होती है मन की भाषा। श्यामल अगर सच्चा न होता तो तुम लोगों का स्वार्थ जानने के बाद भी जीते जी अंधा बनने को तैयार होता? तुम लोग ही एक दूसरे से उलझ गए!
(अचानक श्यामल आगे बढ़ता है।)
श्यामल: तुम्हारे पति के लिए तुम्हें मेरी दो आँखें चाहिए, ठीक है?
दूर्वा : हाँ श्यामल हाँ ...
श्यामल: (निर्मल को) तुम्हारे बेटे की दृष्टि वापस लेने हेतु तुम्हें मेरी आँखें उखाड़ लेने में कोई आपत्ति नहीं है न?
निर्मल : दादा, बुबाई की उम्र सिर्फ दस साल है। उसका सारा जीवन...
श्यामल:  दो दिन के बाद सासू माँ मर जाएगी जानते हुए भी संपत्ति के मोह में तुम मुझे अँधा बनाने पर तुले हो, क्यों?
हिरेन : उधार श्यामला उधार माँग रहा हूँ। बाद में वापस कर दूंगा।
 
श्यामल: (वृद्ध को) अपनी गद्दी वापस पाने हेतु पवित्रता के नाम पर आप मेरी दृष्टि ही छीन लेना चाहते हैं क्यों?
वृद्ध : ना बाबा ना.. मैं तो चाहता हूँ कि भगवान के लिए यह निर्मल दृष्टि...
(अचानक श्यामल अट्टहास करता है। सब चकित हो जाते हैं। हँसते-हँसते श्यामल कुर्सी पर बैठ जाता है। सिर एक तरफ़ झुक जाता है। सब लोग एक साथ ‘क्या हुआ’ ‘क्या हुआ’ चिल्लाते हैं। वृद्ध उसकी नब्ज़ देखते हैं।) 
वृद्ध : देर हो गई....बातों बातों में बड़ी देर हो गई!
निर्मल : किस बात की देर हो गई?
वृद्ध : रात को नौ बजकर पैंतालिस मिनट पर थी उसकी मौत!
हिरेन : क्या बात करते हो, मर गया? ऐसे हँसते हँसते चला गया?
दूर्वा : लेकिन कॉर्निया? वो तो अभी ही निकालना पडेगा। ये आँखें सिर्फ़ मेरी है, मैं किसी को नहीं दूंगी।
 (एक ही जगह पर दौड़ने का अभिनय करती है। )
निर्मल : ये आँखें मेरी है।
 (वह भी दौड़ने का अभिनय करता है।)
वृद्ध : नहीं.. नहीं..कोई नहीं ले सकता ये आँखें। मेरी सौ वर्ष से खोई गद्दी मुझे वापस चाहिए। 
(वृद्ध भी एक ही जगह पर खड़े दौड़ रहे हैं।)
धीरे धीरे परदा गिरता है।
 
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[समाप्त]

- मल्लिका मुखर्जी
 
रचनाकार परिचय
मल्लिका मुखर्जी

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