प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2018
अंक -37

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

रचना-समीक्षा

मरती संवेदनाओं को ज़िन्दा रखने का प्रयास
- डॉ.अरुण कुमार निषाद



आज की भौतिकतावादी ज़िन्दगी में लोगों की संवेदनाएँ दिनो-दिन मरती जा रही हैं। आदमी का भरोसा और विश्वास एक-दूसरे से उठता जा रहा है। कौन अपना है, कौन पराया है; इसका अनुमान लगाना आज बहुत ही कठिन कार्य हो गया है। अधिक क्या कहा जाए! दुनिया का सबसे पवित्र और विश्वासनीय पति-पत्नी का रिश्ता भी आजकल संदेह के घेरे में आ गया है। आज न पति पत्नी पर, विश्वास कर पा रहा है और न पत्नी पति पर।
'संवेदना' नाटक लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग के प्रोफेसर रवीन्द्र प्रताप सिंह द्वारा लिखित नाटक है। इसमें 9 दृश्य हैं। इसके प्रमुख पात्र हैं- सूत्रधार, लिम्बर प्रसाद, मिस लिम्बर प्रसाद, प्रेमराज, प्रेमा, ताराचन्द और मुरहवा।


इसे संवेदना की मृत्यु नहीं तो और क्या कहेंगे कि प्रेमा अपने पति (प्रेमराज) जो कि परमेश्वर कहलाता है, को कहती हैं कि-
"... भाड़ में जायें ऐसे पति...।"
वासना की भूख उसे किस स्तर तक गिरा देती है। अपनी इस वासना की भूख को मिटाने के लिए वह पराए पुरुष को भी अपनाने से नहीं हिचकती है। यह उसी के शब्दों में देखा जा सकता है–
"...जवानी में, जवानी के मज़े न लूटे तो क्या कब्र में भूतों से मुहब्बत करेंगे...।"


वासना का पागलपन इतना घटिया हो गया है कि लोग किसी के भी साथ अपनी वासना की भूख मिटाने को तैयार हो जाते हैं-
"जब घर की माचिस सीली हो तो पड़ोसी के घर के चुल्हे से आग माँग लेने में भलाई है, नहीं तो ठण्ड सिकोड़ देगी...हाँ सबकुछ सिकोड़ देगी...।"
परपुरुष द्वारा पराई नारी को देखना है या परनारी के द्वारा अन्य पुरुष को देखना कहाँ तक उचित है! हमारे भारतीय समाज में तो स्त्रियाँ पराए पुरुष की परछाई से बचती थीं। यहाँ सारी संवेदनाएँ मरती हुई नज़र आती हैं–
"...प्रेमा हाथ उठाकर खड़ी हो जाती है। तारा की दृष्टि उसके शरीर पर पड़ती है। दोनों एक-दूसरे को एक मिनट तक एकटक देखते रहते हैं।...ताराचन्द पेड़ से उतरता है और आम को प्रेमा के होठों से लगा देता है। प्रेमा प्यार से ताराचन्द को झिड़क देती है।...ताराचन्द आलिंगन करना चाहता है। प्रेमा ठिठक कर खड़ी हो जाती है।"


संवेदना नाम की चीज़ समाज से समाप्त होती नज़र आ रही है। जिस समाज में लोग शिक्षक को सम्मान की दृष्टि से देखते थे, उसी समाज में आज कहा जा रहा है कि-
"...अइसा है माट्टर, तुम जाव। होय गवा तुम्हारभाषन!"
कितनी बड़ी विडम्बना है, व्यक्ति आज सुनी-सुनाई बात पर बिना जाँचे-परखे यकीन कर ले रहा है। इसी का परिणाम है कि वह आज अवसाद में जी रहा है। इस नाटक में प्रेमराज भी बिना जाँचे-परखे अपने नौकर मुरहवा की बात पर यकीन करता है और अवसाद ग्रस्त होकर शराब पीता है-
"...कमरे में एक आलमारी से मदिरा निकाल कर बोतल से ही पी जाता है...।"


आज कौन किसके साथ अंतरंग संबंध बना ले, कोई ठिकाना नहीं है। सब बस कामातुर दिख रहे हैं। वासना की आग तीव्र से तीव्रतर और तीव्रतर से तीव्रतम होती जा रही है। लोग कितने पागल, कितने भूखे हैं। वासना के सही गलत का चुनाव नहीं कर पा रहे हैं-

मिसेज लिम्बर: बड़े रोमांटिक लगते हैं आप!
प्रेमराज: बस आपने बना दिया।
मिसेज लिम्बर: तो आओ कवि बन जाओ।
(दोनों आलिंगन कर लेते हैं। अन्तरंग चुम्बन। दोनों की साँसे तेज चल रही हैं। मिसेज लिम्बर अपने होंठ अलग करती हुई।)

लोगों की संवेदना इतनी घट गई हैं कि जो मुँह में आता है, वही बोले जा रहे हैं। ताराचन्द ने प्रेमराज को कमीना तक कहा।
ताराचन्द: ...है प्रेमराज बड़ा कमीना...।


अंतिम, नवें दृश्य में पूरी मानवता शर्मसार होती दिख रही है। लोग एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने में लगे हुए हैं। यहाँ तक कि पति पत्नी पर और पत्नी पति पर।
लिम्बर प्रसाद: अरे देख आ गये तेरे वो...।
मिसेज लिम्बर: क्या हो गया है? किसे क्या हो गया है, मुझे या तुम्हें? रहती है यहाँ, नयन मटक्का उधर। जिस पत्तल में खाना, उसी में छेद। बारह बरस, पूरे बारह से मेरी पत्नी है तू। हर व्रत तीज त्यौहार रखा है तूने। मन भर गया है तेरा मुझसे। देखा दूसरा मरद पटा लिया। निरी बज्जाद निकली...।
प्रेमराज: अरे कुलक्षिणी घर चौपट कर दिया मेरा।
अंत में लेखक जो कहना चाहता है, वह ताराचन्द के मुख से कहलवा देता है-
ताराचन्द: ...पति-पत्नी के कर्तव्य होते हैं। पारस्परिक सामंजस्य होता है। संवेगों का भी ख्याल रखना चाहिए।"


नाटककार रवीन्द्र प्रताप सिंह ने जिस संवेदना को ज़िन्दा रखने की कोशिश की है, उसमें पूर्णरुप से सफल रहे हैं। दो टूटते परिवारों को उन्होंने अपने नाटक के माध्यम से फिर से जोड़ दिया। जो मानवीय संवेदनाएँ लगभग मर चुकी थीं, उनमें उन्होंने अपने नए जीवन का संचार किया।  प्रोफेसर सिंह से यही आशा है कि आप इसी प्रकार लिखते रहें और सामाजिक कुरीतियों और घटते मानवीय मूल्यों से लोगों को सचेत करते रहें।


- डॉ. अरुण कुमार निषाद