प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2018
अंक -37

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

कुछ इस तरह

मैं तुम्हें इस तरह दौड़ कर मिलना चाहता हूँ
जैसे तपते रेगिस्तान में दौड़ कर गाय
खेजड़ी की छाँह में खड़ी होती है
या फिर इस तरह लम्बे रेगिस्तान को पार कर
नाडी के किनारे बैठ ऊँट भरता है पेट में पानी
या यूँ कहूँ
कि तारों भरी रात में गुवाड़ी के आगे बिछी खाट पर
मैं तुम्हारा इंतजार इस तरह करना चाहता हूँ
जैसे परदेश गये पतियों की सावन में बाट जोहती सुहागनें
या फिर इस तरह
गोधूली को सबसे आगे चलती नव प्रसूता गाय
बछड़े के मिलने की आस रम्भाती हुई चलती है
कुछ इस कदर
मैं तुम्हें महसूस करना चाहता हूँ
जैसे जोगमाया के मन्दिर से उठती नारियल की खुशबू की तरह
मैं तुम्हें दिसम्बर में ओढना चाहता हूँ
बकरियों के बाड़े पर रखी फटी गुदडी में
पाँवो को सिमटते गडरिये की तरह
और रोक कर भर लेना चाहता हूँ अपने भीतर तुम्हें
कैलाश मानसरोवर के किनारे कुम्भक से साँस को रोके
ध्यानस्थ संन्यासी की तरह


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नैनं छिदंति शस्त्राणि नैनं दहति पावक

सुख था दीवड़ी में रखा जल  
जो सूख गया समय की लू के साथ
दुःख था  सिगरेट की गंध
जो ठहर गया तर्जनी और मध्यमा में

और मैं बाट जोहता रहा शून्य में
आँखों का सारा खारा पानी बहने के बाद भी
तुम इन पंच महाभूतों से बनी
कब उड़ चली धुआं बन
मगर मुझे याद था
नैनम छिन्दन्ति पावक
इसलिए मैंने तुम्हारी याद को आत्मा नाम दिया था


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प्यार का सम्पूर्ण  मतलब

उसके जाने के बाद दोस्त ने कहा
लड़की ही तो गई
चिल मार, प्यार फिर किसी से हो जायेगा
उसे कौन समझाये
वो मेरे लिए सिर्फ लड़की ही नहीं थी
प्यार का सम्पूर्ण मतलब था


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ग़लत इम्प्रेशन

मैंने उसे प्रभावित करने के लिए सुना दी
कुछ प्रेम कविताएँ
और उद्धृत कर दिए चार विदेशी फ़िलोसोफ़र
नाम बता दिए वर्ल्ड क्लासिक मूवीज के पात्रों के
बातों ही बातों में ज़िक्र कर दिया कुछ महँगी शराब और सिगरेट का

वो अंत में बोली
मैं इन सब से थक कर आई हूँ
क्या तुम मुझे इस रेगिस्तान की तरह
बिना सुविधाओं के प्यार कर सकते हो


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इमरोज-सा प्रेम

तुम चाहती हो मैं इमरोज की तरह
तुम्हें प्यार करूँ
और मेरी पीठ पर उभरते रहे
तुम्हारी चाहनाओं में फफोले

तुम्हें कैसे समझाऊँ
कि प्यार में इमरोज होना कितना वेदनापूर्ण है


- माधव राठौड़
 
रचनाकार परिचय
माधव राठौड़

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कविता-कानन (1)