प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन
मानवीय मूल्यों, सामाजिक सरोकार एवं पर्यावरण-संरक्षण से जुड़ी उत्कृष्ट कविताओं का बेजोड़ संग्रह - प्रीति 'अज्ञात'
 

 
पर्यावरणविद नीलेश हेडा का प्रथम हिन्दी काव्य-संग्रह 'कि विसाले यार होता', मानवीय मूल्यों, सामाजिक सरोकार और पर्यावरण-संरक्षण एवं सजगता से जुड़ी कविताओं का ऐसा अनुपम संग्रह है जो आपको यह सोचने पर विवश कर देता है कि सभ्यता और विकास के नाम पर हमने प्रकृति और पारिस्थितिक-तंत्र के साथ कितना घोर अन्याय किया है। इनकी कविताएँ आपको सावधान करती हैं, सचेत रहने को कहती हैं, जीवन का सही और सीधा अर्थ स्पष्टत: उल्लिखित करती हैं। 
 
पुस्तक में सम्मिलित कविताएँ, सरोकार की कविताएँ हैं और इन्होंने प्रकृति, पर्यावरण, जीवन, संघर्ष, लचर शिक्षा व्यवस्था,गंदी राजनीति और इन सबके बीच जीते आम आदमी की जिजीविषा एवं अभिलाषाओं को उत्कृष्ट अभिव्यक्ति दी है। वे अभिलाषाएँ जहाँ न भावनाओं का भीषण आर्तनाद है और न ही बड़े-बड़े स्वप्न। बस एक सुन्दर, सरल जीवन-शैली की ईमानदार आशा है जो कि विकास की अंधी दौड़ में सर्वाधिक दुर्लभ हो चुकी उम्मीद ही कही जा सकती है। पुस्तक का यही सन्देश, यही सकारात्मकता, यही सच्चाई, पृष्ठ -दर-पृष्ठ पाठक को बाँधे रखने में पूरी तरह सक्षम है। 
 
साठ से भी अधिक ये कविताएँ मानवीय जीवन के विविध पक्षों की सघनता को बेबाकी से उजाग़र करती हैं। 'गाँव खो गया है' में बीते समय की स्मृतियाँ हैं तो 'जंगल के दिनों की यादें' में "कई पत्थर हैं यहाँ /ये मेरे दादा/ये मेरी दादी /ये मेरा भाई /सब जंगल में पैदा हुए थे /और देखो कैसे शांति से सोये हैं इस जंगल में" शब्द भीतर तक भिगो जाते हैं। 'हमारे ज़माने की बात' और 'मोहन' रचना भी पारिवारिक रिश्तों की सुन्दरता की चर्चा कर इसे अमूल्य धरोहर की तरह संजोकर रखना चाहती है। 'भाषा-शास्त्र' नदियों के नाले में सिकुड़ जाने के भौगोलिक बदलाव की दुखद अनुभूति दे जाती है तथा 'परदेस की कविता' यथार्थ के कठोर धरातल और जीवन-संघर्ष को साथ लिए चलती है। एक ही धरती और कितने अलग-अलग जीवन। आह! यही तो सृष्टि की घोर विडंबना है। 
 
'मत घबराओं गाँवों से' में कवि आजकल की एकांतप्रिय मानसिकता और परिवर्तित होती सोच पर सीधा प्रहार करते हुए कहते हैं -"यार/तुम लोग शहर के बाहर ही नहीं निकलते /बस उसी प्लास्टिक की गंदगी में उलझे हो /खेलते रहते हो भाषाओं के खेल /उन्हीं प्राचीन नगरों में बस कर लिख रहे हो गाथाएँ /ऋचायें, वेद, उपनिषद /आलसी कहीं के / तुम्हारे पैर भी गायब होने वाले हैं /सिर्फ रहेंगीं की-बोर्ड पर चलने वाली उंगलियाँ।" इसी तथ्य को वे  'फेसबुक' में विस्तार देते हुए कहते हैं, "थोडा शोरगुल कम करो /शाम हो रही है /आओ पुल पर बैठकर /मूंगफली खाते हैं।"
 
'याद है सब कुछ अब तक','अब का तूफान', 'भौगोलिक' प्रेम के नर्म, मुलायम अहसास और उससे जुडी स्मृतियों के झीने द्वार आहिस्ता से खोलती चलती है। गंभीर चिंतन के बीच शीतल बयार-सी प्रतीत होती ये रचनाएँ ह्रदय को उस दुनिया में ले आती हैं जहाँ भावनाएँ सिर चढ़कर बोलती हैं और छोटी-छोटी खुशियाँ सदैव के लिए सहेज लेने को जी उतावला हो बैठता है। 
 
वृद्धजन की दशा एवं उनके प्रति उपेक्षित व्यवहार का 'गालियाँ' कविता में सटीक वर्णन हुआ है वहीं बच्चों और बचपन के सन्दर्भ में लिखे गए ये शब्द गहरी टीस दे जाते हैं, "घाव हमेशा /बचपन में लगते हैं /अपने बच्चों को बचा कर रखना।" यह अपराधों के युग में माता-पिता को सचेत करते हैं और उनसे अपने करीबियों पर अन्धविश्वास न करने की ओर भी इंगित करते हैं। वहीं एक अन्य स्थान पर 'बाप हमेशा लकड़हारा ही होता है' पंक्ति सारी कोमल संवेदनाओं को झकझोरकर रख देती है। सचमुच माँ की महत्ता के आगे पिता की महानता की चर्चायें प्राय: दरकिनार कर दी जाती हैं जबकि उसका संघर्ष पथ भी उतना ही दुरूह है। भावनात्मक उतार-चढ़ाव से वह भी उतना ही जूझता आया है।  
 
इस पुस्तक में सकारात्मक ऊर्जा से ओतप्रोत, सामाजिक सन्देश देती हुई कई कविताएँ अन्धविश्वास, ढकोसलों और कट्टरता से दूर एक धर्मनिरपेक्ष समाज का आह्वान करती हैं। नीलेश लिखते हैं, "पाठशाला, मंदिर और कुएँ /हमेशा खुले होने चाहिये /इनके दरवाजों पर /मोटी तोंद वाले /खुले बदन वाले /माथे पर रक्तचंदन लगाये /पंडे बैठे रहें /ये अच्छी बात नहीं है"
 
गंदी राजनीति और लचर प्रणाली पर चोट करते हुए; वर्तमान परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में इनका कवि मन कराह उठता है और  यह तीक्ष्ण व्यथा  कुछ इस तरह व्यक्त होती है -
''मेरे लोगों में कुछ मुस्लिम हैं /जिन्होंनें कभी आईसिस (ISIS) का नाम नहीं सुना/और कुछ बुद्धिस्ट भी /जिन्हें समय ही नहीं दिया गया बुद्धा के विज्ञान को पढ़ने का /मेरे पास इंजीनियर्स हैं, डॉक्टर्स हैं और प्लानर्स भी /अगर उचित मौका मिले इन्हें तो /वो निर्माण कर देंगे नये स्वर्ग का / सब को मौका मिलना चाहिये /मेरे लोगों को मौका मिले ऐसी व्यवस्था बननी चाहिये"
 
नेताओं की असलियत और वोट बैंक की व्यवस्था पर तमाचा मारते हुए वे आम आदमी के दिल की बात कहने से नहीं चूकते, दो-टूक शब्दों में वे कहते हैं, "तुम अपनी राष्ट्रवाद की दुकान /हमेशा खुली रखना /इस से ही पकेगी तुम्हारी चढ़ाई हुई /प्रसाद की हांडी /लेकिन मुझे थोड़ी बात करने दो /मिट्टी के रंग पर /पानी के बहाव पर /मछली के उछाल पर।"
 
वहीं स्वार्थ, बदले की राजनीति और निकृष्ट मानसिकता की छिछली तहों को उघाड़ते हुए बुभुक्षा की सच्चाई पर ये कहते हैं, "अगर थाली भरी हो लेग पीस से /और तरी भी हो उस पर /तो हम बात कर सकते हैं /राजनीति पर या /अमर्त्य सेन का भी खंडन हो सकता है /चबाते-चबाते"
 
गहन दार्शनिकता और जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती यह कविता 'और क्या' इस संग्रह की रचनाओं का उत्तम प्रतिनिधित्व करती दृष्टिगोचर होती है -
"बस यही है 
और कुछ नहीं है 
और कुछ रहता भी नहीं, 
गिनी- चुनी ही चीज़ें मिलती हैं ज़िंदगी में
कुछेक महुआ के पेड़, 
एक-दो छोटे पानी के झरने, 
टोकरी भर ताजा मछलियाँ
पलाश के दोनें में भर कर शहद के कुछ कतरे
और कुछ साँसे 
उसी को स्थिरता से उपयोग करना पड़ता है 
बस इतना ही
और क्या?"
काश! यह बात हम सबको समझ आ जाए, प्रकृति से अनियंत्रित खिलवाड़ बंद हो, पर्यावरण-संरक्षण की आवश्यकता एवं उपयोगिता समझी जाए और हमारे जंगल बचे रहें। पुस्तक इसी संदेश का आह्वान करती है। पाठक के मस्तिष्क तक इस पुकार का पहुँच जाना ही इस पुस्तक की सार्थकता है और लेखन का उद्देश्य भी।
 
पुस्तक की भाषा ग्राह्य, सरल, सहज और बनावटीपन के आवरण से कोसों दूर है। जनमानस को लक्ष्य करती हुई नीलेश जी की कविताओं की कहन-शैली प्रवाहमयी एवं शब्द प्रभावी है। संवेदनशीलता एवं भावप्रवणता का प्रबल पक्ष इन्हें श्लाघनीय बना पाठकों के ह्रदय तक स्पर्श कर पाने में पूरी तरह सक्षम है। आपकी रचनाएँ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि आपने प्रकृति के हर रूप को निकट से जिया है, महसूस किया है और साथ ही बदलते सामाजिक स्वरुप  पर भी अपनी पैनी दृष्टि टिकाए रखी है। न केवल आपके पास ज्ञान और शब्दकोष का उत्तम भंडार है बल्कि आप बदलते सामाजिक परिवेश, विकृतियाँ, विसंगतियाँ और उनसे उपजी सघन टीस को सशक्त रूप से अभिव्यक्त कर पाने में भी पूर्णत: सफ़ल रहे हैं। 'अज्ञान' कविता में आपके ये शब्द कि "मैं सुई की नोंक पर टिक सके, इतने ही ज्ञान का मालिक हूँ", आपकी शिष्टता एवं विनम्रता के परिचायक हैं। वस्तुतः कवि ने अपने लेखकीय दायित्व का निर्वहन सम्पूर्ण निष्ठा के साथ किया है। मैं पूरी तरह आश्वस्त हूँ कि हिन्दी के पाठकों के बीच 'कि विसाले-यार होता' अपनी ओजपूर्ण उपस्थिति दर्ज़ करा पाने में सफ़ल सिद्ध होगी। 
 
नीलेश हेडा जी की लेखनी में सूरज की किरणों-सी चमचमाहट और भोर-सी प्रफुल्लित इसी सकारात्मक ऊर्जा का भाव सदैव बना रहे! ऐसी अशेष मंगलकामनाएँ! शुभकामनाएँ!
हिन्दी साहित्य जगत में करतल ध्वनि से आपका स्वागत है!

 

समीक्ष्य पुस्तक- कि विसाले यार होता
विधा- कविता
रचनाकार- नीलेश हेडा
संस्करण- 2018 (पेपरबैक)
मूल्य- रु.110/-
प्रकाशन- नोशन प्रेस

 


- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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