प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2018
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषांतर
एकांकी- चक्षुदान
अंश - 3
लेखक : गौतम राय
बांग्ला से अनुवाद : मल्लिका मुखर्जी
चरित्र – श्यामल, निर्मल, हिरेन, दूर्वा, वृद्ध
 
(हिरेन का प्रवेश। कभी महोल्ले का मस्तान था। अब भी दादागीरी ही उसका काम है। श्यामल का मित्र है।)
हिरेन :  रोड तक झगड़ने की आवाज आ रही है, इसलिए मैं देखने आ गया कि आख़िर मामला क्या है?
श्यामल: अच्छा हुआ तुम आ गए हिरेन, मैं मन ही मन तुम्हें ही याद कर रहा था। 
हिरेन:   अच्छा? समस्या क्या है?
श्यामल: ये मेरा भाई है, निर्मल।
हिरेन:   और ये बहन जी, वही....हाँ...हाँ...समझ गया। आख़िर बात क्या है? कहीं से लोन तो नहीं लिया है न?
श्यामल: ना रे ना, मेरी छोटी-सी तनख्वाह से मेरा खर्चा तो निकल ही जाता है, लेकिन ये दोनों मुझसे बेहद प्यार करते हैं।
हिरेन:   ये लोग तुमसे बेहद प्यार करते हैं? क्या बात करते हो?
श्यामल: हाँ, वे ही कह रहे हैं।
निर्मल:  दादा (बड़े भैया), मेरे और आपके पवित्र रिश्ते को संदेह की नज़र से देखनेवाले ये  महानुभाव हैं कौन?
हिरेन:   अरे श्यामल, क्या कह रहा है तुम्हारा यह भाई, पवित्र रिश्ता!
श्यामल: जाने भी दो हिरेन।
हिरेन:  तुम्हारी ये ‘जाने दो...जाने दो’ की बात ही गलत है। ‘जाने दो...जाने दो’ करके ही तुम्हारा ये हाल हुआ है।
 
श्यामल: हिरेन मैं बड़ी मुश्किल में फँस गया हूँ। मेरे पास सिर्फ़ दो आँखें हैं।
हिरेन:   तो इसमें गलत क्या है? देवी-देवताओं को छोड़कर सभी के पास दो ही आँखें होती है।
श्यामल: लेकिन इन दोनों को दो-दो आँखें चाहिए और दोनों ने लीगली मेरी आँखों का क्लेम किया है।
हिरेन:   ऐसा क्यों?
श्यामल: मॅम के पति अपनी आँखों की दृष्टि खो रहे हैं। एक जमाने में वे मेरे प्रेम में थीं, तब मैंने उन्हें कहा था कि उनकी ख़ुशी के लिए मैं अपनी जान तक न्योछावर कर सकता हूँ। आज वे मेरी जान तो नहीं सिर्फ़ आँखे माँग रही हैं और ये मेरा भाई कानूनन मेरी आँखों का उत्तराधिकारी, उसे भी मेरी आँखें चाहिए।
हिरेन:   आगे बोल, बोलता जा...मैं सुन रहा हूँ।
श्यामल: मेरी आँखें चली गईं तो मैं अंधा हो जाऊँगा, पर मुझे इसकी चिंता नहीं है क्योंकि ये दोनों मेरी बाकी की ज़िंदगी का बोझ उठाने को तैयार है।
हिरेन:   क्या तुझे अपनी आँखें देने में कोई आपत्ति नहीं है?
श्यामल: मुझे क्या आपति हो सकती है? मेरी आँखें तो सार्वजनिक हैं। माँगी भी किसने है? एक मेरी भूतपूर्व प्रेमिका है दूसरा मेरा मौजूदा भाई है। आँखें चार चाहिए और मेरे पास सिर्फ़ दो ही हैं!
 
हिरेन:   इस समस्या का समाधान तू मुझसे करवाना चाहता है?
श्यामल: हाँ, तू मेरा जिगरी दोस्त है। तू जो कहेगा वही होगा।
हिरेन:   गुड, ये तेरा भाई! (भाई की ओर देखते हुए) एक दिन पत्नी के कहने से इसीने तुझे  घर से आउट कर दिया था, याद है? आँखे तो क्या, इनकी किसी भी चीज पर तेरा हक़ नहीं बनता।
दूर्वा:    हिरेन भाई मैं...
हिरेन:   हाँ...दीदी, बता रहा हूँ। याद है आपको? एक शिक्षित बेकार नौजवान, उस नौजवान के दिलमें प्रेम के बाग़ खिलाकर फिर धीरे से लात मारकर, इश्वर के भरोसे उसे छोड़कर चली गईं थीं।
दूर्वा:    बदतमीज़....इसकी भाषा तो देखो! 
हिरेन:  खैर, जाने दीजिए। आप मुझे ये बताइए, इस सीधे-सरल इन्सान को धोखा देकर आपने क्या पाया? एक बार भी पीछे मुड़कर देखा कि उसका क्या हाल हुआ होगा?
दूर्वा:   आप लोग सिर्फ़ अपने बारे में सोच रहे हैं। क्या आपने ये सोचा कि उस दिन मैंने अनुपम के बदले श्यामल के गले में माला डाली होती तो मेरा क्या होता? मेरे रूप-सौंदर्य का क्या हाल हुआ होता। आज भी मैं श्यामल को कितना चाहती हूँ। ये प्रेम, क्या ऐसा रहता? सब कुछ ख़त्म हो जाता।
 
हिरेन:  फ़िर भी आपका कोई हक़ नहीं बनता। एक बाघिन को कभी श्यामल की आँखें नहीं दी जा सकती।
दूर्वा:   तमीज़ से बात कीजिए मिस्टर..
हिरेन:  मॅडम, मैं कभी इस गली का हीरू मस्तान था। अब रिटायर हो गया हूँ फ़िर भी इसी   गली का दादा कहलाता हूँ। अगले वर्ष इलेक्शन लड़ने वाला हूँ, क्या? और एक बात याद दिलाना चाहता हूँ, जब ये श्यामल सिर्फ नल का पानी पीकर जीवन गुजारता था तब ये हीरू मस्तान ही उसकी देखभाल करता था। क्यों श्यामल, याद है न?
श्यामल: हाँ बिल्कुल याद है हीरू। तुम्हारा ये ऋण मैं शायद ही चुका पाऊँ। मैं जो नौकरी कर रहा हूँ वो भी तो तुमने दिलाई है। तुम न होते तो ये कमरा भी इतने कम किराये में न मिलता।
हिरेन:  अरे, मैं तो तेरी शादी भी करवा देता लेकिन तेरा ही फैंसला था कि तू भीष्म पितामह की तरह अपना जीवन यापन करेगा, फ़िर मैं क्या कर सकता था? याद है, भूख सह-सहकर तुझे गेस्ट्रिक ट्रबल हो गई थी?
श्यामल: हाँ..हाँ..तुम्हारी मदद से ही समय रहते मेरा ओपरेशन हुआ था।
 
हिरेन:  श्यामल, अब जल्दी से तैयार हो जा। तुझे यहाँ अकेले रहने देने में ख़तरा है। जब तक ये हीरू मस्तान ज़िन्दा है तुझे फ़िकर करने की कोई ज़रूरत नहीं। मेरी सासु माँ को तो तू जानता है न? बहुत बीमार है। तुझे याद कर रही है। मेरी पत्नी भी तुझे याद कर रही है। 
श्यामल: हाँ, मैं भी बहुत दिनों से उन्हें मिला नहीं हूँ।
हिरेन:  अब तू दिन-रात उन्हें मिल सकेगा क्योंकि आज के बाद तू मेरे घर ही रहेगा। ये दोनों तेरी आँखों के लिए गिद्ध की तरह लड़ रहे हैं, लेकिन जब तक मैं हूँ, नो चिंता। चल अब देर हो रही है।
श्यामल: लेकिन इन दोनों को कोई जवाब..
हिरेन:   देख श्यामल, तेरे मन को हरदम पोंछे के कपड़े की तरह गीला रखना छोड़ दे वर्ना  हर कोई तुझे घूमाकर अपना-अपना घर साफ़ कर लेगा।
निर्मल:  तुम्हारी समस्या क्या है भाई?
हिरेन:   मेरी सासू माँ को लिखने में समस्या हो रही है।
निर्मल:  क्या वे लेखिका हैं?
हिरेन:   नहीं, वैसे तो तीसरी कक्षा तक ही पढ़ी हैं लेकिन उनके वील में अगर ठीक से दस्तख़त नहीं कर पाईं तो सारी संपत्ति मेरे साले को मिल जाएगी। 
दूर्वा:    थोड़ा विस्तार से बताएँगे?
 
हिरेन:   सीधी-सी बात है। पिछले वर्ष सासु माँ की एक आँख में मोतियाबिंद का ओपरेशन हुआ लेकिन इस चक्कर में आँख का ही डिस्पोजल हो गया। एक महीने बाद दूसरी आँख भी टेढ़ी हो गई। दस्तख़त करने में, श्रीमती से शुरू कर देवी तक लिखने की कोशिश करती है। लिखाई भी अजीब-सी होती है...अहाहा..देखती कहाँ है और कलम  कहाँ रखती है पता ही नहीं चलता! 
श्यामल: तो क्या तुम्हें भी आँखें चाहिए?
हिरेन:   उधार चाहिए।
श्यामल: उधार?
हिरेन:   बिल्कुल, देखो बुढ़िया जी-जीकर कितना जिएगी? ढल जाएगी तब तेरी आँखे तुझे वापस कर दूँगा। देख श्यामल, मैंने हमेशा तेरी मदद की है और आगे भी करता रहूँगा। आज मैं मुश्किल में हूँ। सही दस्तख़त न कर पाने की वजह से सासु माँ की सारी संपत्ति मेरा लम्पट साला ले जाएगा।
(दूर्वा और निर्मल को संबोधित करते हुए)
भाईलोग, कुछ पाना हो तो पहले इन्वेस्टमेंट करना पड़ता है, समझे? मेरा इन्वेस्टमेंट बहुत पुराना है, क्या? ये हिरेन दास जब तक है, कोई उल्लू इसकी आँखें नहीं ले सकता।
श्यामल:  हिरेन, तुम किसी आई बैंक का संपर्क नहीं कर सकते? तुम्हारी तो मिनिस्टर तक की पहचान है।
 
हिरेन :  गया था श्यामल गया था, पर आउट कर दिया। कहते है अस्सी साल की बुढ़िया के लिए आखें नहीं मिल सकती। आँखों की बड़ी क्राइसिस है, लेकिन मैं उनके जैसा नहीं हूँ। जैसे ही दस्तख़त कर देगी, बुढ़िया को (गला घोंटने का अभिनय करते हुए), फिर तेरी आँखें बेक टू पेवेलियन...
दुर्वा :   (निर्मल की तरफ़ देखते हुए) इसीलिए कहा था कि एक दूसरे से बहस करे बिना म्युच्युअल अंडरस्टेंडिंग से बाँट लेते है। 
निर्मल :  अच्छा? कब कहा था?
दुर्वा : मन में कहा होगा, बस?
निर्मल :  दादा, आप चलिए मेरे साथ।
दुर्वा : मैं चिल्लाउंगी. महिला होने के नाते मुझे पहला मौका मिलना चाहिए। श्यामल, चलो मेरे साथ।
(तीनों श्यामल को अपनी-अपनी तरफ़ खींच रहे हैं साथ ले जाने के लिए.)
(एक वृद्ध का प्रवेश)
 
.................................क्रमशः.......................

- मल्लिका मुखर्जी
 
रचनाकार परिचय
मल्लिका मुखर्जी

पत्रिका में आपका योगदान . . .
भाषांतर (4)