प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

हे शतरूपा, हंसवाहिनी

हे शतरूपा, हंसवाहिनी,
विद्या का वरदान हमें दो।
करते तेरा वंदन माता,
हर लो सब तम, ज्ञान हमें दो।

हमको ऐसा वर दो माता,
छंदों की लहरें उपजाएँ।
अपने गीतों की खुशबू से,
हम सबके उर को महकाएँ।
स्वर की देवी, हे जगमाता,
इस जग में  सम्मान हमें दो।
हे शतरूपा, हंसवाहिनी,
विद्या का वरदान हमें दो।

तेरे बालक हम अज्ञानी,
लगती हमको राह कठिन है।
मात ज्ञान से झोली भर दो,
मुश्किल जीवन विद्या बिन है।
चित है चंचल, मन में भटकन,
जीवन का नवगान हमें दो।
हे शतरूपा, हंसवाहिनी,
विद्या का वरदान हमें दो।

करके तेरा पूजन माता,
मूरख भी ज्ञानी बन जाता।
तेरे वर से ही हे माता,
मानव पोथी पढ़-लिख पाता।
चाँद-सितारे हम भी छू लें,
ऐसी एक उड़ान हमें दो।
हे शतरूपा, हंसवाहिनी,
विद्या का वरदान हमें दो।


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आसमान के तारे तोड़ें

आओ! हम-तुम दोनों मिलकर,
आसमान के तारे तोड़ें।

अपनी श्रम-श्रद्धा के दम पर,
एक नया सोपान बनाएँ।
सोच-समझ कर, देखभाल कर,
फिर धीमे से कदम बढाएँ।
आने वाली हर बाधा का,
अपनी मेहनत से रुख मोड़ें।
आओ! हम-तुम दोनों मिलकर,
आसमान के तारे तोड़ें।

मन में जोश नया भरकर हम,
सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ जाएँ।
उम्मीदों का दीप जलाकर,
राहों का अँधियार मिटाएँ।
वक़्त सुलाकर भूला जिनको,
उन सपनों को आज झिंझोड़े।
आओ! हम-तुम दोनों मिलकर,
आसमान के तारे तोड़ें।

ज्यों नदियाँ ख़ुद पथ तय करतीं,
हम भी अपनी राह बनाएँ।
ऊँचे नभ में पंख पसारे,
पंछी ज्यों उड़कर हर्षाएँ।
अपनी किस्मत की शाखों पर,
मेहनत के कुछ पत्ते जोड़ें।
आओ! हम-तुम दोनों मिलकर,
आसमान के तारे तोड़ें।


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यह दुनिया एक समंदर है

यह दुनिया एक समंदर है,
हम पार करें इसको कैसे।

कुछ सपने ऐसे भी होते,
अँधियारों में छिपकर रोते।
रूठे जो निंदिया आँखों से,
आशा के पत्ते शाखों से।
जब छोर नहीं उम्मीदों का,
तब समझाएँ मन को कैसे!
यह दुनिया एक समंदर है,
हम पार करें इसको कैसे!

दुख देना जिनकी चाहत है,
छल में मिल जाती राहत है।
जो सम्मुख खुश हो जाते हैं,
पीछे सबको भरमाते हैं।
ऐसी संगत ऐसी बातें,
स्वीकार भला हमको कैसे!
यह दुनिया एक समंदर है,
हम पार करें इसको कैसे!

एक दरिया उर में रहता है,
चुपके से खुद में बहता है।
ज्यादा जब आहत हो जाता,
तब सीमाओं से टकराता।
वो तोड़े बाँध बने नदियाँ,
मंजूर भला दिल को कैसे!
यह दुनिया एक समंदर है,
हम पार करें इसको कैसे!


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जब प्यार मिला बादल बन कर

जब प्यार मिला बादल बन कर,
भीगा था अंतर्मन सारा।

यादों की बिजली कोंधी थी,
सैलाब अश्क का टूटा था।
दृग ठहर गए उन पर ऐसे,
था सम्मुख, पल जो छूटा था।
झंकार हुई थी रग-रग में,
जागा बोझिल तन-मन सारा।
जब प्यार मिला बादल बन कर,
भीगा था अंतर्मन सारा।

था सब कुछ बदला-बदला सा,
पैरों में माना थकन लगी।
जैसे मैं राही कांटो की,
लेकिन चलने की लगन लगी।
मैं भाव पुञ्ज उत्सुक होकर,
भर लूँ जैसे दामन सारा।
जब प्यार मिला बादल बनकर...........
जब प्यार मिला बादल बन कर,
भीगा था अंतर्मन सारा।

बादल भी छलिया जीवन-सा,
आकर चुपके छल जाता है।
फिर दूर खड़ा होकर हम पर,
ये मन ही मन मुस्काता है।
विश्वास, लगन बसता मन में,
हर लेता तम लेकिन सारा।
जब प्यार मिला बादल बन कर,
भीगा था अंतर्मन सारा।


- तारकेश्वरी तरु सुधि
 
रचनाकार परिचय
तारकेश्वरी तरु सुधि

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