प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2018
अंक -39

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

संस्कृत का पहला विलापकाव्य- प्रो.राधाबल्लभ त्रिपाठी


संस्कृत साहित्य में मृत्यु पर विलाप के बहुविध प्रसंग हैं। ऋग्वेद में मृत्यु को लेकर मार्मिक सूक्त है, जिसका समापन आशा और जीवन में लौटने की कामना के साथ होता है। आदिकाव्य या रामायण की रचना का उपक्रम एक क्रौञ्च पक्षी को बहेलिये के द्वारा मार दिये जाने से निकले काव्यात्मक शोकोद्गार के द्वारा हुआ था। कालिदास के रघुवंश में अजविलाप तथा कुमारसंभव में रतिविलाप के अत्यन्त हृदयद्रावक प्रसंग हैं, जिनमें अज इन्दुमती के तथा रति कामदेव के आकस्मिक निधन पर अपनी व्यथा व्यक्त करते हैं। संस्कृत रूपक के दस प्रकारों में उत्सृष्टिकांक या अंक में नायक की मृत्यु का शोकपर्यवसायी प्रसंग रहता है। पर इनमें से किसी को भी उस विधा के अन्तर्गत नहीं रखा जा सकता, जिसे अंग्रेजी में इलेजी और अरबी, फारसी तथा उर्दू की काव्यपरम्परा में मर्सिया कहा जाता है। इनमें व्यक्त किया जाने वाला शोक कवि का निजी शोक नहीं, एक सार्वजनीन करुणा का भाव है। इलेजी या मर्सिया एक स्वतन्त्र काव्यविधा है, जिसमें रचनाकार अपने किसी प्रिय या आदरणीय व्यक्ति अथवा व्यक्तियों की वास्तविक मृत्यु पर अपनी नितान्त निजी वेदना को व्यक्त करता है। फारसी-उर्दू की काव्य-परम्परा में मर्सिया का प्रवर्तन हज़रत मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन की शहादत के विषय पर लिखी जाने वाली कविताओं से हुआ। इसमें छह पंक्तियों के 'मुसद्दस' छन्द का प्रयोग होता है, जिसकी चार पंक्तियाँ एक क़ाफ़िया-रदीफ़ में और बाकी दो अलग क़ाफ़िया-रदीफ़ में होती हैं। मीर अनीस का मर्सिया प्रसिद्ध है।

हिन्दी में इलेजी के लिये शोकगीत शब्द का प्रयोग होता है। पर इस विधा में जो रचनाएँ की जाती रही हैं, उनमें गीत के स्थान पर मुक्तककाव्य का विधान रहता है, अतः इलेजी या मर्सिये के लिये शोकगीत के स्थान पर विलापकाव्य शब्द रखना अधिक उचित है।


फारसी-उर्दू के साहित्य या यूरोपीय कविता की तरह संस्कृत में विलापकाव्य की कोई स्वतन्त्र परम्परा प्राचीन काल में विकसित नहीं हुई, क्योंकि मृत्यु को एक दारुण या शोकप्रद घटना इस साहित्य के महान रचनाकारों ने माना ही नहीं।
संस्कृत का पहला विलापकाव्य काशी के प्रतिष्ठित पण्डित रामानन्द त्रिपाठी ने दाराशिकोह के निधन पर लिखा। पण्डितों ने दारा की पहचान अपने समय के एक स्वप्नद्रष्टा और बड़े संवाद पुरुष के रूप में ठीक ही की थी। दारा की हत्या जिस क्रूरता और निर्लज्जता के साथ औरंगजेब ने की थी, उसकी दुनिया के इतिहास में कम ही मिसाल मिलेगी। दिल्ली इस हत्याकाण्ड से दहल गई थी। काशी शोकाकुल और हतप्रभ थी। दाराशिकोह को संस्कृत के महान कवि तथा मूर्धन्य काव्यचिंतक पण्डितराज जगन्नाथ का स्नेह मिला था, काशी में पण्डितमंडली ने उसमें भावी सम्राट् और भारत के उद्धारक का रूप देखा था। शाहजहाँ ने दाराशिकोह को वेदांत पढ़ने के लिये काशी भेजा था, जहाँ रामानन्दपति त्रिपाठी उसके गुरु रहे। रामानन्दपति का समय 1625-75 के आसपास है। इनको शाहजहाँ के द्वारा सम्मानित किया गया था। काशी की पण्डित मंडली में ये अपने समय के मूर्धन्य विद्वान् थे। रामानन्दपति त्रिपाठी के प्रपितामह दिवाकर त्रिपाठी गोरखपुर से विद्याध्ययन के लिये काशी आये थे। फिर सपरिवार यहीं बस गये। इनके पिता का नाम मधुकर था। संन्यास लेने पर इनका नाम ज्ञानानन्द हुआ। इन्होंने काशी में लक्ष्मीकुण्ड के पास कालीमठ की स्थापना की।


दाराशिकोह पर संस्कृत में शोककाव्य रचते समय रामानन्दपति की प्रेरणा निश्चय ही उर्दू-फारसी की मर्सिया की परम्परा रही होगी। पर उन्होंने अपने शोककाव्य के लिये स्रग्धरा छन्द चुना है। वे संन्यासी बाद में हुए, संस्कृत और हिन्दी के बड़े रसिक कवि थे, संगीत के जानकार थे। संस्कृत कवियों और पण्डितों पर चाटुकारिता का वाहियात आरोप लगाने वाले इस बात पर गौर करें कि दाराशिकोह पर शोककाव्य लिखना औरंगजेब को खुलेआम चुनौती देना था।
दाराशिकोह पर लिखे रामानन्दपति के विलापकाव्य में पाँच स्रग्धरा छन्द हैं। रामानन्द  कहते हैं- जो दाराशिकोह सारे कविजनों को प्रचुर धन देकर काशी को प्रकाशित करते रहे, जिन्होने धर्म के वर्णों (अक्षरों, रंगों) के जल से बहती संस्कृत की स्वरसरिता को प्रवाहित किया, जो समुद्र तक फैली इस भारत की धरती के सम्राट् थे, नीति और विनय में रची बसी बुद्धि वाले थे, वे नहीं रहे, उनके बिना इस संसार में कैसे रहना होगा?


येनेयं श्रीदकाशीसकलकविजनोद्दामदानप्रकाशी-
राकीर्णा धर्मवर्णामृतयुतसलिलैः संस्कृता स्वर्णदी च।
आकूपारं क्षितीशो नतिविनयमतिर्यश्च कर्त्रेश्वरस्तद्-
दाराशाहेन्द्रमौलेर्विपदि कथमहो जीवनीयं हि विश्वम्।।


आगे रामानन्दपति कहते हैं- इस कलियुग में एक पाँव पर खड़ा धर्म जिनके दम पर विजय कर रहा है, पापों के व्यवसाय में लिपटे कलि को जिन्होंने दान से परास्त कर दिया, जिन विश्वम्भर ने पुण्य की अमृतनदी को प्रवाहित किया, उनके न रहने पर हमारे प्राण क्यों नहीं निकल जाते?  

धर्मस्तुर्ययुगेन येन जयति त्वेकाङ्घ्रितां श्रावितो
यावत्, तावदपुण्यपण्यनिरतं निर्जित्य दानैः कलिम्।
यः पुण्यामृतवाहिनीं सुकृतवान् विश्वम्भरः श्रीदवत्
दाराशाह विपत्सु हा कथमहो प्राणा न गच्छन्त्यमी।।


इसके बाद संस्कृत में विलापकाव्यों की बाढ़ ही आ गई और यादवेश्वर तर्करत्न के ‘अश्रुविसर्जनम्’ के रूप में भारतीय साहित्य का कदाचित् सबसे बड़ा विलापकाव्य उन्नीसवीं शताब्दी में संस्कृत में लिखा गया।


- राधा वल्लभ त्रिपाठी
 
रचनाकार परिचय
राधा वल्लभ त्रिपाठी

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