प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

यूँ मज़हबों में बँट के न संसार बाँटिये
कुछ बाँटना है आपको तो प्यार बाँटिये

नदियाँ बहे न ख़ून की आँगन में फिर कभी
अपने ही घर में तीर न तलवार बाँटिये

हर धर्म के गुलों से महकता है ये चमन
खंजर चला के अपने न गुलज़ार बाँटिये

जब भी मिलें किसी से तो दिल खोलकर मिलें
छोटी-सी ज़िन्दगी में न तकरार बाँटिये

दुनिया से दुश्मनी को मिटाना हो तो 'रज़ा'
लोगों में भाईचारे का अख़बार बाँटिये


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ग़ज़ल-

मेरे वतन में आते हैं सारे जहां से लोग
रहते हैं इस ज़मीन पे अम्न-ओ-अमां से लोग

लगता है कुछ खुलुसो-मुहब्बत में है कमी
क्यों उठ के जा रहे हैं बता दरमियां से लोग

तेरा ख़ुलूस, तेरी मुहब्बत को देखकर
जुड़ते गये हैं आके तेरे कारवां से लोग

कैसा ये कह्र, कैसी तबाही है ऐ ख़ुदा!
बिछड़े हुए हैं अपनों से, अपने मकां से लोग

हिन्दी अगर है जिस्म तो उर्दू है उसकी जान
करते हैं प्यार आज भी दोनों ज़बां से लोग

नज़्र-ए-फ़साद होता रहा घर मेरा 'रज़ा'
निकले नहीं मुहल्ले के अपने मकां से लोग


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ग़ज़ल-

कोई रूठा है अगर उसको मनाना होगा
भूल कर शिकवे-गिले दिल से लगाना होगा

जिन चराग़ों से ज़माने में उजाला फैले
उन चराग़ों को हवाओं से बचाना होगा

जिसकी ख़ुशबू से महक जाए ये दुनिया सारी
फूल गुलशन में कोई ऐसा खिलाना होगा

मैं जहां छोड़ के आ जाऊँगा तेरी ख़ातिर
शर्त ये है कि मेरा साथ निभाना होगा

दिल के रिश्तों को अगर प्यार से जोड़ा जाए
एक बंधन में बँधा सारा ज़माना होगा

चाहते हो कि मिटे सब के दिलों से नफ़रत
फिर तो दुश्मन को 'रज़ा' दोस्त बनाना होगा


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ग़ज़ल-

नाज़-ओ-अदा के साथ कभी बे-रुख़ी के साथ
दिल में उतर गया वो बड़ी सादगी के साथ

आएगा मुश्क़िलों में भी जीने का फ़न तुझे
कुछ दिन गुज़ार ले तू मेरी ज़िदगी के साथ

ख़ून-ए-जिगर निचोड़ के रखते हैं शेर में
यूँ ही नहीं है प्यार हमें शायरी के साथ

अच्छी तरह से आपने जाना नहीं जिसे
यारी कभी न कीजिये उस अजनबी के साथ

मुश्किल में कैसे जीते हैं यह उनसे पूछिये
गुज़रा है जिनका वक़्त सदा मुफ़लिसी के साथ

उस पर न ऐतबार कभी कीजिए 'रज़ा'
धोखा किया है जिसने हमेशा सभी के साथ


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ग़ज़ल-

अपने हसीन रुख़ से हटा कर निक़ाब को
शर्मिन्दा कर रहा है कोई माहताब को

उनकी निगाहे-नाज़ ने मदहोश कर दिया
मैंने छुआ नहीं है क़सम से शराब को

दिल चाहता है उनको दुआ से नावाज़ दूँ
जब देखता हूँ बाग़ में खिलते गुलाब को

ये ज़िन्दगी तिलिस्म के जैसी है दोस्तो!
क्या देखते नहीं हो बिखरते हुबाब को

जुगनू मुक़ाबले पे न आ जाएँ अब कहीं
इस बात ने हैरान किया आफ़ताब को

इंसान बन गया है 'रज़ा' आदमी से वह
दिल से पढ़ा है जिसने ख़ुदा की किताब को


- सलीम रज़ा रीवा
 
रचनाकार परिचय
सलीम रज़ा रीवा

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ग़ज़ल-गाँव (1)