प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- अहिल्या


जोशीजी का इकलौता बेटा अचानक ही भड़के दंगे में मारा गया। यूँ तो न जाने कितने लोगों की मौत हुई थी, पर इस मौत की ख़बर से शहर में सनसनी-सी फैल गई थी। गलियों में, चौक पर, घर-घर में इसी दुर्घटना की चर्चा थी। फ़ैक्टरी से घर लौटते समय दंगाईयों ने उसकी गाड़ी पर ही बम फेंक दिया था। गाड़ी के साथ ही नील के भी शरीर के टुकड़े-टुकड़े हो गए थे। कोई इसे सुनियोजित षडयन्त्र बता रहा था तो कोई कुछ और ही। जितने मुँह, उतनी बातें। जो भी हो सेठजी के ऊपर नियति का बहुत बड़ा वज्रपात था।

नील के साथ उसकी नवविवाहिता पत्नी अहिल्या और सेठ-सेठानी सभी मृतवत हो गए थे। एक की चिता के साथ कितने जीवितों की चिता जल गई थी। घर में चारों ओर मौत का सन्नाटा फैला हुआ था। तीन प्राणियों के घर में होश किसे था कि एक-दूसरे को सम्भालते। दुख की अग्नि में जल रहे सेठजी अपने बालों को नोंच रहे थे तो उनकी पत्नी सरलाजी पर रह-रह कर बेहोशी के दौड़े पड़ रहे थे। अहिल्या की आँखों में आँसूओं का समन्दर सूख गया था। जिस मनहूस दिन से घर से अच्छे-खासे गए नील को मौत ने निगल लिया था, उस पल से उसने शायद अपनी पलकों को भी नहीं झपकाया था। उसे तो यह भी नहीं मालूम कि नील के खंडित झुलसे काले शरीर का कब अंतिम संस्कार कर दिया गया। सेठजी के बड़े भाई और छोटी बहन का परिवार पहाड़ से आ गया था, जिन्होंने घर को सम्भाल रखा था।

चार दशक पहले जोशीजी अपनी जमा-पूँजी लिए बिजनेस करने के सपने लिए इस शहर में आए थे। बिजनेस जमाना भी तो हथेलियों पर पर्वत ही उतारना था, पर सेठजी की कर्मठता ने उतार ही लिया। बिजनेस जमाने में समय तो लगा पर, अच्छी तरह से जम भी गया। उनकी मिल सोना उगलने लगी तो एक और मिल को खोल लिया। शादी के दस वर्षों के उपरान्त उनके आँगन में किलकारियाँ गूँजी थी। बेटे नील के बाद दूसरे सन्तान की आशा में उन्होंने अपनी पत्नी का कितना डॉक्टरी इलाज, झाड़-फूँक, पूजा-पाठ करवाया पर सरलाजी की गोद दूसरी बार नहीं भरी।

नील की परवरिश किसी राजकुमार की तरह हुई थी पर प्यार भरे अनुशासन के साथ। नील भी बड़ा प्रतिभाशाली निकला। अति सुन्दर व्यक्तित्व और अपनी विलक्षण प्रतिभा से सेठजी को गौरवान्वित करता, वह अहमदाबाद के बिजनेस स्कूल का टॉपर बना। विदेशी कम्पनियों से ऑफ़र आए पर सेठजी का अपना बिजनेस ही इतना बड़ा था कि उसे कहीं जाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। पिछले साल ही अपने मित्र की बेटी अहिल्या से नील की शादी बड़ी धूमधाम से की थी। अपार सौन्दर्य और अति प्रतिभाशालिनी अहिल्या के आने से उनके महल जैसे विशाल घर का कोना-कोना सज गया था। बड़े ही उत्साह और उमंगों के साथ सेठजी ने बेटे-बहू को हनीमून के लिए स्वीटज़रलैन्ड भेजा था, जहाँ दोनों ने महीने भर तक सोने के दिन और चाँदी की रातें बिताई थीं। अहिल्या और नील पति-पत्नी कम प्रेमी-प्रेमिका ज़्यादा थे। उन दोनों के प्यार, मनुहार, उत्साह, उमंगों से घर सुशोभित था। हर समय जोशीजी और सरलाजी की आँखों के समक्ष एक नन्हें-मुन्ने सी आकृति तैरती रहती थी। दादा- दादी बनने की उत्कंठा चरम सीमा पर था। इधर वे दोनों सारी लज्जा को ताक पर रखकर अहिल्या और नील से अपनी इस इच्छा की पूर्ति के लिए गुजारिश किया करते थे। प्रत्युत्तर में दोनों अपनी सजीली मुस्कान से उन्हें नहला दिया करते थे। ये भी कोई अपने हाथ की बात थोड़े थी। उनकी भी यही इच्छा थी कि एक साथ ही ढेर सारे बच्चों की किलकारियों से यह आँगन गूँज उठे। पर नियति तो कुछ और जाल बिछाएँ बैठी थी। पल भर में सब कुछ समाप्त हो गया था।

कड़कती बिजली गिर कर हँसते-खेलते आशियाने को क्यो ना ध्वंसत कर दे लेकिन सदियों से चले आ रहे पत्थर सरीखे सामाजिक परंपराओं को निभाना तो पड़ता ही है। मृत्यु के अंतिम क्रियाकर्म की समाप्ति के दिन सरलाजी अपने सामने अहिल्या को देखकर चौंक गई। श्रृंगार रहित उदासियों की परतों में लिपटा डूबते सूर्य की लाली सरीखे सौन्दर्य को उन्होंने अब तक तो नहीं देखा था। सभी की आँखें चकाचौंध थी। कैसे और कहाँ रख पाएगी ऐसे मारक सौन्दर्य को। समाज के गिद्धों की नज़र से कैसे बचा पाएगी! अपने दुखों की ज्वाला में इस सद्विधवा के अंतरमन में गहराते हाहाकार को वह कैसे भूल गई थी। उसकी तो गोद ही उजड़ी है पर इसका तो सब कुछ ही नील के साथ चला गया।

"उठिए माँ! हमारे दुखों के रथ पर चढ़ कर नील तो आ नहीं सकते! इतने बड़े विध्वंस से ही हमें अपने मृतवत जीवन के सृजन की शुरुआत करनी है"। कहते हुए सरलाजी को जोशीजी के पास ले जाकर बैठा दिया। दोनों की आँखों से बह रही अविरल अश्रुधारा को अपनी काँपती हथेलियों से मिटाने की असफल चेष्टा करती रही।

नील की जगह अब जोशीजी के साथ अहिल्या फ़ैक्टरी जाने लगी थी। उसने बड़ी सरलता से सब कुछ संभाल लिया। नौकरी भले न की हो पर एमबीए की डीग्री तो थी ही। सरलाजी और जोशीजी ने भी किसी तरह की रोक-टोक नहीं की। अहिल्या के युवा तन-मन की अग्नि शान्त करने का यही उपाय बच गया था। जोशीजी की शारीरिक और मानसिक अवस्था इस क़ाबिल भी नहीं थी कि वे कुछ कर सकें। नील ही तो सारी ज़िम्मेवारियों को अब तक सम्भाले हुए था। फ़ैक्टरी की देखभाल में अहिल्या ने भी दिन-रात एक कर दिये थे। दुखद विगत को भूलने के लिए उसे कहीं तो खोना था। जोशीजी और सरलाजी भले ही अहिल्या का मुँह देखकर जी रहे थे पर उनके इस दुख का कोई किनारा दृष्टिगत नहीं हो रहा था। एक ओर उन दोनों का मृतवत जीवन और अनिद्य सुन्दरी युवा विधवा अहिल्या तो दूसरी ओर उनकी अकूत सम्पति, फैला हुआ व्यापार और अहिल्या पर फिसलती हुई गिद्ध दृष्टि। तन-मन से टूटे वे दोनों कितने दिन तक जी पाएँगे। उनके बाद अकेली अहिल्या किसके सहारे रहेगी! समाज की कुत्सित नज़रों से छिपे वार से उसकी कौन रक्षा करेगा। इसका एक ही निदान था कि वे अहिल्या की दूसरी शादी कर दे।


सच्चे मन से एक विधवा को अपनाएगा कौन? उसकी सुन्दरता और उनकी दौलत के लोभ में बहुत सारे युवक तैयार हो जाएँगे पर वो कितनी ख़ुशी उसे दे पाएँगे, सोचते हुए उन्होंने भविष्य पर सब कुछ छोड़ दिया। अभी ज़ख़्म हरा है सोचते हुए अहिल्या के विदग्ध मन को कुरेदना उन्होंने ठीक नहीं समझा।

ऐसे ही समय बीत रहा था। न मिटने वाली उदासियों में जीवन का हल्का रंग प्रवेश करने लगा था। फ़ैक्टरी के काम से जब भी जोशीजी बाहर जाते, अहिल्या साथ हो लेती। सरलाजी ने भी कभी रोका नहीं क्योंकि अब तो सभी कुछ अहिल्या को ही देखना था। फिर भी शिला बनी अहिल्या के जीवन में खुशियों के रंग बिखर जाए इसके लिए दोनों प्रयत्नशील थे। पर एक विधवा के लिए किसी सुयोग्य पात्र को ढूँढ लेना इतना आसान भी नहीं था। सरलाजी के चचेरे भाई ने अपने बेटे के लिए सहमति जताई तो दोनों ही बिदक पड़े। इनके कुविख्यात नाटे, मोटे, काले, मूर्ख बेटे की कारवाईयों से कौन अनजान था! पिछले साल ही पहाड़ की किसी नौकरानी की नाबालिग़ बेटी के बलात्कार के सिलसिले में पुलिस इसे गिरफ़्तार करके ले गई थी पर साक्ष्य के अभाव में छूट गया था । इन लोगों की नज़र उनकी अपार सम्पति पर है, यह तो समझ आ ही गया था। अपने भाई की बात को सुनकर सरलाजी बहुत नाराज़ हुईं तो उसने भी अपना गरल उगल कर उनके जले हुए तन-मन पर ख़ूब ही नमक रगड़ा।


"हाँ, तो सरला! तुम्हारी बहू कितनी भी सुन्दर और क़ाबिल क्यों न हो, उस पर विधवा होने का ठप्पा तो लग चुका है। वो तो मैं ही था कि इसका उद्धार करने चला था वरना इस कुलक्षिणी की औक़ात क्या है? साल भर के अन्दर ही अपने ख़सम को खा गई। वो तो यहाँ है इसलिए बच गई वरना हमारे यहाँ तो ऐसी डायन को पहाड़ से ढकेल देते हैं। जवानी की गर्मी जब जागेगी तो बाहर मुँह मारने से अच्छा है कि घर की ही भोग्या रहे।

सरलाजी के भाई की असभ्यता पर जोशीजी चीख़ उठे, "अरे कोई है जो इस जानवर को मेरे घर से निकाले। इसकी इतनी हिम्मत कि मेरी बहू के बारे में ऐसी उल-जुलूल बातें करे। सरला! आपने मेरी आज्ञा बगैर इसे कैसे बुला लिया? आपके चचेरे भाईयों के परिवार की काली करतूतों से पहाड़ का चप्पा-चप्पा वाक़िफ़ है"। कहते हुए जोशीजी क्रोध के मारे काँप रहे थे।


"ना ना बहनोई साहब, मुझे निकलवाने की कोई ज़रुरत नहीं है। मैं स्वयं चला जाऊंगा पर एक बात याद रखिएगा, आज आपने मेरी जैसी बेइज़्ज़ती की है उसे सूद समेत वसूल करूँगा। जिस बहू के रूप-गुण पर रिझे हुए हैं, सरेआम उसे पहाड़ की भोग्या न बना दिया तो मैं भी ब्राह्मण नहीं।" कहते हुए सरलाजी का बदमिज़ाज भाई निकल गया पर अपनी गर्जना से उन दोनों को दहलाते हुए प्रकंपित कर गया। उसके जाने के बाद कई दिनों तक घर का वातावरण शान्त न हो सका था।

सरलाजी के भाई की धमकियाँ पहाड़ के समाज के साथ के साथ व्यापार में जोशीजी से स्पर्धा रखने वाले व्यवसायियों के समाज में भी प्रतिध्वनित होने लगी थीं। बहू के साथ उनके नाजायज़ रिश्ते की बात कितनों के ज़बान पर थी। यह समाज की नीचता की पराकाष्ठा थी। पर समाज तो समाज है, जो कुछ भी उल्टा-सीधा कहने और करने का अधिकार रखता है और उसने बड़ी निर्दयता से ससुर-बहू के बीच नाजायज़ रिश्ता क़ायम कर दिया। सरेआम उन पर फ़ब्तियाँ कसी जाने लगी थी। आहिस्ता-आहिस्ता ये अफ़वाहें पंख फैलाए जोशीजी के संतप्त घर में भी आ गयीं।


सरलाजी अपने अति चरित्रवान, सच्चे पति और कुल ललना बहू के सम्बन्ध में ऐसी लांछनाएँ सुनकर मृतवत हो गई। नील की मृत्यु के आघात से उबर भी नहीं पाई थी कि पिता-पुत्री जैसे पावन रिश्ते पर ऐसी कलुष लाँछन बिजली बनकर उनके आशियाने को ध्वस्त कर गई। उस मनहूस दिन को कोस रही थी जब अपने उस नराधम भाई से अहिल्या की दूसरी शादी की मंशा जता बैठी थी। जोशीजी के कुम्हलाए चेहरे को देखते ही वे बिलख उठती थीं।

अहिल्या, जोशीजी के साथ बाहर जाने से कतराने लगी थी। उसने इस दुर्भाग्य से भी समझौता कर लिया था पर जोशीजी और सरलाजी को क्या कह कर समझाती! जीवन का एक-एक पल उसके लिए पहाड़ बनकर रह गया था। लेकिन वो करती भी तो क्या? समाज का मुखौटा इतना घिनौना भी हो सकता है, इसकी कल्पना उसने स्वप्न में भी नहीं की थी। इसके पीछे भी तो सत्यता ही थी। ऐसे नाजायज़ रिश्तों ने कहीं न कहीं पैर फैला ही रखे थे। एक तो ऐसे ही नील की मृत्यु ने उसे शिला बना दिया था। न तो कोई धड़कन थी और न ही साँसें। बस पाषाण बनी जिये जा रही थी। उसके ज़ेहन में आत्महत्या कर लेने के ख़्याल उमड़ रहे थे। कल्पना में उसने कितनी बार स्वयं को मृतवत देखा पर सास-ससुर की दीन-हीन अवस्था को स्मरण करते ही ये सारी कल्पनाएँ उड़न-छू हो जाती थीं। कितना सटीक है उसका नाम जो पल-पल चरितार्थ हो रहा है उसके जीवन में। नील की प्रेयसी ही बनी रही उसके इतने छोटे सानिध्य में। उसके हृदय की साम्राज्ञी बनी रही। नियति ने कितनी निर्दयता से उसके प्रिय को छीन लिया। अभी तो नील की जुदाई ही सर्प दंश बने हुए थी। ऊपर से ये बिना सिर-पैर की अफ़वाहें! कैसे निपटे? अहिल्या को कुछ नहीं सूझ रहा था। जोशीजी का सामना करने से क़तरा रही थी। पर जोशीजी ने हिम्मत नहीं खोई। उन्होंने अहिल्या को धैर्य बनाए रखने को कहा।


अब बाहर भी अहिल्या अकेले ही जाने लगी थी तो जोशीजी ने भी जाने की ज़िद नहीं की। फ़ैक्टरी के माल के निर्यात के लिए बड़े ही उखड़े मन से इस बार वह अकेली ही मुम्बई गई। जिस शोरूम के लिए माल निर्यात करना था, वहाँ एक बहुत ही परीचित चेहरे को देखकर वह चौंक उठी। वह व्यक्ति भी विगत के परिचय का सूत्र थामे उसे उत्सुकता से निहार रहा था। अहिल्या अपने को रोक नहीं सकी और झटके से उसकी ओर बढ गई।
"तुम गिरीश ही हो न! यहाँ पर कैसे? ऐसे क्या देख रहे हो मैं अहिल्या हूँ। क्या तुम्हें मैं याद नही हूँ? रसोई घर से चुराकर न जाने कितने व्यंजन तुम्हें खिलाए होंगे। पकड़े जाने पर बड़ी ताई मेरी कितनी धुनाई कर दिया करती थी। मुझे मार खाए दो दिन भी नहीं होते थे कि मुँह उठाए तुम पहुँच जाया करते थे। रामू काका कैसे है? पहाड़ी के ऊँचे-नीचे रास्ते पर जब भी मेरे या मेरी सहेलियों के चप्पल टूट जाते थे, तो उनकी सधी उँगलियाँ उस टूटे चप्पल को नया बना देती थीं। तुम्हें भी तो याद होगा!"


अहिल्या के इतने सारे प्रश्नों से उत्तर में गिरीश मुस्कुराता रहा, जिससे अहिल्या झुंझला उठी।
"अब कुछ बताओगे भी कि नहीं। काकी की असामयिक मृत्यु से संतप्त होकर, सभी के मना करने के बावजूद भी तुम्हें लेकर कहीं चले गए थे। सभी कितने दुखी हुए थे। मुझे आज भी सब कुछ याद है।"
"बाबा मुझे लेकर मेरे मामा के पास कानपुर आ गए थे। वहीं पर जूते की दूकान में नौकरी कर ली और अंत तक करते रहे। पिछले साल ही वे गुज़र गए हैं। पर उनकी इच्छानुसार मैंने मन लगाकर पढाई की। एम.ए. करने के बाद मैंने एमबीए कर लिया और इस शोरूम का फाइनेंस देखने लगा। पर आप यहाँ क्या कर रही हैं?


एक चमार का बेटा हमउम्र और पहाड़ के एक ही बस्ती में रहने वाली अहिल्या को तुम कहने की हिम्मत नहीं कर सका।यही क्या कम है कि कम से कम अहिल्या ने उसे पहचान तो लिया। उससे बात ही कर ली, यह क्या कम सौभाग्य की बात है उसके लिए। वरना उसकी औक़ात ही क्या है?
"अरे ये क्या आप-आप की रट लगा रखी है? चलो कहीं चलकर मैं भी अपनी आप-बीती से तुम्हें अवगत करा दूँ।" कहते हुए अहिल्या उसे साथ लिए कुछ देर तक सड़क पर ही चहलक़दमी करती रही फिर वे दोनों एक कैफ़े में जाकर बैठ गए।
अश्रुपूरित आँखों एवं रुँधे स्वर में अहिल्या ने अपनी आप-बीती गिरीश से कह सुनाई। सुनकर उसकी भी पलकें गीली हो गई थीं। लेकिन घर-बाहर फैली हुई अफ़वाहों को कहकर अहिल्या बिलख उठी। जब तक वह मुम्बई में रही, दोनों मिलते रहे। गिरीश के कारण इस बार अहिल्या के सारे काम बड़ी आसानी से हो गए।


सूरत तक लौटने के रास्ते तक अहिल्या पहाड़ पर अपने बिताए अपने बचपन और गिरीश से जुड़े क़िस्से याद करती रही। बाद में पढाई के लिए उसे भी तो दिल्ली आना पड़ा था। गिरीश की मदद की बातें सरलाजी और जोशीजी को भी बताई। उन दोनों ने निर्णय लेने में समय नहीं गँवाया। तत्काल ही गिरीश को ऊँची तनख़्वाह और सारी सुविधाएँ देकर अपनी फ़ैक्टरी में नियुक्त कर लिया। शहर से बाहर जाने का सारा काम गिरीश ने बड़ी ख़ूबी से सम्भाल लिया था। जोशीजी सब तरह से संतुष्ट थे।

समय पंख लगा कर उड़ान भरता रहा। गिरीश भी जोशी परिवार के निकट आता गया। उसका भी तो कोई नहीं था। प्यार मिला तो उधर ही बह गया। अहिल्या ने गिरीश के बारे में सभी कुछ बता दिया था सिवाय उसकी जाति के। गिरीश को भी मना कर दिया था कि भूलकर भी वह अपनी जाति को किसी के समक्ष प्रकट नहीं करे। पहले तो उसने आना-कानी की पर अहिल्या के समझाने पर उसने इसे भविष्य पर छोड़ दिया था। अहिल्या ख़ूब जानती थी कि जिस दिन उसके सास-ससुर गिरीश की जाति से अवगत होंगे, उसके प्रवेश पर रोक लग जाएगी। जानती थी कि जिसे वह कभी नहीं चाहती थी। बड़ी मुश्किल से तो घर का वातावरण थोड़ा सम्भाला था। आरंभ में गिरीश संकुचित रहा पर अपनी कुशलता, ईमानदारी और निष्ठा से दोनों फ़ैक्टरियों को ही नही सँभाला बल्कि अपने मृदुल व्यवहार से जोशी दम्पति का हृदय भी जीत लिया था। गिरीश अब उनके कम्पाउड में बने गेस्ट हाउस में ही रहने लगा था। सारी समस्याओं का हल गिरीश ही बन गया था। जोशी दम्पति की आँखों में अहिल्या और गिरीश को लेकर कुछ दूसरे ही सपने सजने लगे थे लेकिन अहिल्या की उदासीनता को देखकर वे आगे नहीं बढ पाते थे। उसने एक सहकर्मी से ज़्यादा गिरीश को कभी कुछ समझा ही नहीं था। उसके साथ एक दूरी तक ही नज़दीकियाँ रखे, कई बार वह उन दोनों को समझा चुकी थी पर दिनो-दिन गिरीश के साथ सारी दूरियों को मिटाते जा रहे थे। कभी लाड़-दुलार से खाने के लिए रोक भी लिया तो अहिल्या उसका खाना बाहर ही भिजवा दिया करती थी।


गिरीश का मेल-जोल भी यह क्रूर समाज स्वीकार नहीं कर सका। कोई न कोई आक्षेप उनकी ओर उड़ाता ही रहा। आजिज़ होकर एक दिन सरलाजी बड़े मान-मनुहार से अहिल्या से पूछ ही बैठी, "गिरीश तुम्हें कैसा लगता है? हम दोनों को तो उसने मोह ही लिया है। हम चाहते हैं कि तुम उसे अपने जीवन में स्थान देकर हर तरह से व्यवस्थित हो जाओ। है तो तुम्हारा बचपन का साथी ही, क्या पता इसी संयोग से हम सब उससे इतना जुड़ गए हों। हम भी कितने दिन तक तुम्हारा साथ देगें। यह समाज बड़ा ही ज़ालिम है, तुम्हें यों अकेले जीने नहीं देगा। नील की यादों के सहारे जीवन बिताना बड़ा कठिन है। फिर वह तुम्हें कोई बंधन में भी तो नहीं बाँध गया है, जिसके सहारे तुम जी लेती। सब नसीब की बात है वरना एक साल कम नहीं था"।

प्रतिउत्तर में अहिल्या कुछ देर उन्हें देखती रही फिर बड़े ही सधे स्वर में कहा, "आप गिरीश को जानती हैं पर उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि को नहीं। मुझे भी कुछ याद नहीं है। क्या पता अगर हमारी आशाओं की कसौटी पर उसका परिवेश ठीक नहीं उतरे तो कुछ और पाने की चाह में उसके इस सहारे को भी खो बैठे। मुझ पर अब किसी अफ़वाह का असर नहीं होता। अहिल्या नाम की शिला जो हूँ। किसी राम के चरण धूल की अपेक्षा भी नहीं है मुझे। जैसे जीवन गुज़र रहा है गुज़रने दीजिए"।
पर आज तो सरलाजी अपने मन की बात किसी न किसी तरह से अहिल्या से मनवा ही लेना चाहती थी। उनकी ज़िद को टालने के ध्येय से अहिल्या ने गिरीश से ही पूछ लेने को कहा।
और एक दिन जोशी दम्पति ने गिरीश से उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे जानना चाहा तो उसने भी छुपाना ठीक नहीं समझा और बेझिझक हो, सभी कुछ उनके समक्ष उंडेल कर उनकी जिज्ञासा को सब तरह से शान्त कर दिया।


जोशीजी तो तत्काल वहाँ से उठकर अन्दर चले गए। अपनी सारी आशाओं पर तुषारपात हुए देख, सरलाजी ने घबराकर आँखे ही मूँद लीं। न समझते हुए भी गिरीश अपनी इस अवमानना को समझते हुए झटके से उठकर चला गया। पहाड़ के सबसे ऊँचे ब्राह्मण की मानसिकता एक नीची जाति के व्यक्ति को किसी तरह स्वीकार नहीं कर पा रही थी। दोनों फिर अवसाद में डूब गए। कहीं दूर तक कोई किनारा नज़र नहीं आ रहा था।

हफ्ता गुज़र गया पर न गिरीश ही उन दोनों से मिलने आया और न इन्होंने ही पहले की तरह मनुहार करके उसे बुलाया। सरलाजी से जब अहिल्या ने इस सम्बन्ध में पूछा तो उनकी पलकें भीग गयीं। आहत होकर उन्होंने अहिल्या से पूछा- "गिरीश की जाति के बारे में क्या तुम्हें सच में सच में मालूम नहीं था? अगर था तो बताया क्यों नहीं! इतने दिनों तक क्यों अंधेरे में रखा! हमारे सारे मनसूबों पर पानी फिर गया। पल भर में एक बार फिर नियति ने हमारी आँखों से सारे सपने नोंच लिए"।
कुछ देर अहिल्या सोचती रही फिर उनकी आँखों में निर्भयता से देखते हुए कहा- "मैं उसकी जाति से अनजान नहीं थी लेकिन वह तो हमारी फ़ैक्टरी के अफ़सर होने के सिवाय कुछ नहीं था, और इससे जाति का क्या लेना-देना! भरोसे का आदमी था इसलिए उसे सारे काम सौंप दिये"। जोशीजी भी वहाँ पर आ गए थे।


अहिल्या ने निःसंकोच जोशीजी से कहा- "पापा! अगर अफ़वाहों के चक्रव्यूह में फँस कर आपने उसे फ़ैक्टरी के कामों से निकाल दिया तो शायद उस जैसे भरोसे का आदमी नहीं मिले। आप दोनों के दुखों का कारण मैं ही हूँ। मैने सोच लिया है यहाँ से हमेशा के लिए चले जाने का। गिरीश आप दोनों की देख-रेख कर लेगा। अगर उसे निकाला तो मैं भी उसके साथ निकल जाऊँगी। आपके साथ अपने नाम को फिर से जुड़ते देख मैं मर जाना चाहूँगी। ये ज़ालिम दुनिया फिर से हमें जीवित ही निगल जाएगी" कहते हुए अहिल्या रो पड़ी।

अपने सिर पर किसी स्पर्श का अनुभव करके अहिल्या ने सिर उठाया तो जोशीजी को अपने इतने निकट पाकर चौंक गई। "गिरीश के परिवेश को भूलकर अगर हम हमेशा के लिए उसे अपना बेटा बना लें तो इसकी अनुमति तुम दोगी?" अहिल्या ने सिर झुका लिया।


आज वर्षों बाद जोशीजी की विशाल हवेली फिर एक बार दुल्हन की तरह सजी हुई थी। मंच पर वर-वधू बने गिरीश और अहिल्या के साथ जोशी दम्पति अपार खुशियों के छलकते सागर को समेट रहे थे। सारी कटुताओं को विस्मृत करते हुए इस ख़ुशी के अवसर पर जोशीजी ने दोस्त-दुश्मन सभी को आमंत्रित किया था। कहीं भीड़ के समूह में उनकी उदारता की प्रशंसा हो रही थी तो कहीं आलोचना। पर जो भी हो अपने हृदय की विशालता से उन्होंने गिरीश को अपने बेटे नील का स्थान देकर बड़ा ही भव्य और अनोखा काम किया था।


- तनु श्रीवास्तव
 
रचनाकार परिचय
तनु श्रीवास्तव

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कथा-कुसुम (2)