प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे!
प्राचीन पितृसत्ता समाज में स्त्री !!
 
‘पितृसत्ता’ का शाब्दिक या मूल अर्थ पुरुषसत्ता से लिया गया है। वास्तव में पितृसत्त समाज, परिवार, कुनबे की व्यवस्था में पुरुष के एकाधिकार को दर्शाती है। इस व्यवस्था के तहत महिलाएं, घर में रहने वाले अन्य पुरुष, बच्चे,गुलाम और घर के नौकर-चाकर आते हैं। सभी क्षेत्रों में पुरुष का वर्चस्व उसकी शारीरिक क्षमता के कारण होता है और इसीलिए वह स्त्री को अपने अनुसार ढलता है और उसपर शासन करता है। 
‘पितृसत्ता’ हजारों साल से चली आ रही ऐसी व्यवस्था है जिसमे स्त्री, पुरुष के अधीन रहती है। पितृसत्ता ने स्त्री को उपभोग की वस्तु बनाया। उसे साधन के रूप में प्रयुक्त किया। उसके नाम, रूप, जाति, गोत्र्सब अपने संदर्भ में परिभाषित किए। पुरुष ने न केवल स्त्री को साधन बनाया बल्कि उसे वास्तविक रूप में वस्तु या चीज बना दिया और इस प्रकार स्त्री का- चीजीकरण(थिंगीफिकेशन) होना प्रारंभ हुआ जो कमोबेश आज तक पुरुषसत्ता करती आ रही है। पुरुष ने स्त्री के जीवन, उसकी कार्यशैली एवं उसकी सत्ता को निर्धारित किया। स्त्री की भी एक अलग पहचान है,उसकी एक सामाजिक स्थिति है और वह अपने जीवन के निर्णय लेने में सक्षम है, इस तथ्य को प्राचीन पुरुषसत्ता स्वीकार नहीं कर पायी। पुरुष की सांस्कृतिक सत्ता ने स्त्री को वह सामाजिक सुविधा नहीं दी, जो कि परंपरा से पुरुष को मिलती रही है।
 
पितृसत्ता के उदय एवं विकास के संदर्भ में विचार करते हुए हमें स्त्रिसत्ता के आधिपत्य के मूल कारणों की तह में जाना होगा। प्राक कृषि समाज का कोई ऐसा ठोस तथ्य हमें नहीं मिलता जो यह बताये कि स्त्रियों की वास्तविक स्थिति क्या थी। हमें मात्र इतनी ही जानकारी मिलती है कि स्त्रियां कठिन श्रम करती थीं और गृहस्थी के बोझ के साथ –साथ संतानोत्पत्ति के कार्य में भी उनको योगदान देना पड़ता था। पुरुष जंगली जानवरों के आक्रमण से कुनबे की रक्षा करता था। वह खतरों का सामना करता था, शिकार करता था और इसलिए उसे अधिक उर्जा की आवश्यकता थी। पुरुषों के सामने स्त्रियों की सीमाएं थीं। प्रजनन, गर्भाधान, प्रसव के चक्र में उलझाने के कारण उसकी कार्य करने की क्षमता प्रभावित होती थी। ऐसे समय में उसे पूरी तरह से भोजन और बाहरी आक्रमणों से अपने को बचने के लिए पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता था। इन परिस्थितिओं में पुरुष की स्थिति स्वतः उच्च हो गयी। वह अन्य पुरुषों के साथ समूह में शिकार पर जाता था और शिकार पर जाने के कारण उसे ‘महान’ समझा जाने लगा। स्त्री इन सबसे वंचित रही।
 
हीगेल ने स्वामी और दस के द्वंदात्मक संबंध की अवधारणा को पहली बार्व्याख्यायित किया। 
प्राक ऐतिहासिक मानव समाज में स्त्री शारीरिक रूप से कमजोर होने के बाबजूद पुरुष के अधीन नहीं थी। उसकी स्थिति दस जैसी नहीं थी क्यूंकि वैयक्तिक संपत्ति की अवधारणा और न्याय व्यवस्था के न होने के कारण स्त्री पुरुष के सामने समर्पित होने के लिए विवश नहीं होना पड़ता था। आदिम सभ्यता में खानाबदोश मनुष्य ने धीरे-धीरे समूह में रहना शुरू किया और इस तरह कृषि जीवन की शुरुआत हुई और साथ ही साथ मनुष्य ने अपने जीवन के बारे में सोचना शुरू किया। कृषि –जीवन में स्त्री की प्रजनन-क्षमता के कारण उसे अतिरिक्त महत्ता मिली क्यूंकि कृषि के लिए अधिक से अधिक मानव श्रम की जरुरत थी। इसलिए संतान का महत्व बढ़ गया। जब खेती के लिए मनुष्य एक स्थाई भूखंड में रहने लगा तब पुरुष में स्वार्थ की भावना उत्पन्न हुई। संपत्ति का एकत्रीकरण हुआ। पुरुष जिस भूमि पर खेती करता था, उस भूमि के ऊपर उसके अधिकार की भावना प्रबल होती गयी और अपने बाद उस भूमि के स्वामित्व की रक्षा के लिए संतानों की आवश्यकता पड़ी,जो उस पुरुष के बाद उस संपत्ति की रक्षा कर सके और विरासत में मिली भूमि को अपने पास ही रख सके। इस प्रकार, वंशों की आवश्यकता पड़ने लगी और यहीं आकार स्त्री, जो बच्चे पैदा कर सकती थी, उसको और महत्ता मिलने लगी। सामूहिक कृषि जीवन में स्त्री बच्चे तो पैदा कर सकती थी पर जीवनपर्यंत उस पर किसी एक पुरुष का अधिकार नहीं होता था मिलने लगी। वह पुरे कबीले के साथ जुडी रहती थी मिलने लगी। वह पति की दासी नहीं थी मिलने लगी। पूरा कबीला एक प्रतिक की पूजा करता था और भौतिक जीवन आपसी सहयोग से चलता था। आदि मानव को यह भी नहीं मालूम था कि संतान कि उत्पत्ति पुरुष शुक्राणु से होती है इसलिए कौमार्य की पवित्रता की अवधारणा का अभाव था। बच्चे प्रकृति के दें थे। इसलिए बच्चा पुरे कबीले की शक्ति के रूप में पहचाने जाने लगा। और वंश माँ के नाम से चल पड़ा। माँ के पास सामूहिक संपत्ति का स्वामित्व था।
 
स्त्री-सृजन की सारी प्रक्रिया मनुष्य के सामने रहस्य की तरह थी ठीक उसी तरह जैसे धरती भी उन्हें फल—फूल और अनाज देते थे। पुरुष अपने-आपको स्त्री की रहस्यमयी शक्ति के सामने निष्क्रिय पाता था क्योंकि पुरुष प्रकृति का दस था और उसे लगता था कि बच्चे और खेती ईश्वर की दें हैं। 
आधुनिक काल का पितृसत्तात्मक समाज इस बात का प्रमाण है कि आदिम समाज में स्त्री एक शक्ति के रूप में उभरी जो पवित्र थी और जिसके पास प्रजनन करने की अभूतपूर्व रहस्याई क्षमता थी। ‘ऋग्वेद’ में स्त्री की वंदना के प्रमाण मिलते हैं वृद्धावस्था तक स्त्री का प्रभुत्व अपने घर पर था, जिसे कोई चुनौती नहीं दे सकता था। वह धार्मिक एवं सामाजिक कार्यकलापों में भाग लेती थी। 
 
ऋग्वेद काल में पत्नी केवल पति के साथ ही यज्ञ नहीं करती थी बल्कि पति के बिना भी कर सकती थी। युद्ध में पति के रक्षा कामना के लिए पत्नी ने अपने पति की अनुपस्थिति में इंद्र और वरुण को हवि देकर तथा नमस्कार करके प्रसन्न किया था(ऋग्वेद- 4,42,9)। अपाला ने इंद्र के लिए सोम का सेवन किया था(ऋग्वेद—8,91,1)। अथर्ववेद में स्त्रियों को यज्ञिय(यज्ञ की अधिकारिणी)कहा गया है। ‘शतपथ ब्राहमण’ तथा ‘तैत्तरीय ब्राहमण’ में पत्निरहित पुरुष को यज्ञ का अनाधिकारी कहा गया है। 
वैदिक काल में स्त्रियां शिक्षा प्राप्त करती थीं। पुत्रों की तरह पुत्रियों का भी उपनयन संस्कार किया जाता था। स्त्रियों को यज्ञ संपादन और वेदाध्ययन करने का पूर्ण अधिकार था। पाणिनी ने भी छात्राओं की शालाओं का उल्लेख किया है। वैदिक युग में कुछ ऐसी भी स्त्रियों का उल्लेख प्राप्त होता है, जिन्होंने ऋग्वेद के मंत्रो या सूक्तों की रचना की जिनमें लोपा(1/179), विश्व्तारा आत्रेयी(5/28), सिक्ता निवावरी(8/91), घोषा(10/39)  प्रमुख हैं। अनेक स्त्रियां थीं जिन्होंने मीमांसा-शास्त्र, न्याय-शास्त्र, वेदांत आदि का आजीवन अध्ययन किया। कश्हत्सनी एक श्रेष्ठ मीमांसक थी, गार्गी नैयायिक एवं आत्रेयी वेदांती विशारद एवं मैत्रेयी दार्शनिक थी। जैन साहित्य में धर्म दर्शन की आजीवन अध्येता जयंती नामक विदुषी का उल्लेख मिलता है। ब्राहमण काल आते-आते स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में परिवर्तन आया। स्त्रियों की स्वछंदता पर अंकुश लगने लगे। सार्वजनिक संस्थानों, जातीय परिषदों आदि में स्त्रियों का भाग लेना प्रायः समाप्त-सा हो गया था। धार्मिक एवं लौकिक शिक्षा कन्याओं के लिए सुलभ नहीं रही थी। ऐसे अनेक कार्यों से उन्हें वंचित कर दिया गया था जिसे वह पहले करती थी, अब यह कार्य पुरोहितों के द्वारा किया जाने लगा। ‘शतपथब्राहमण’ में इसका उल्लेख मिलता है कि हवि बनाना पहले पत्नी का कम था जो उत्तरकाल में अग्नीघ्र का कार्य हो गया। ‘शंख्यायनब्राहमण’ में पत्नियों द्वारा यज्ञ न करने का उल्लेख मिलता है। ‘भागवतपुराण’ में यह कहा गया है कि स्त्री,शुद्र तथा द्विजबंधु को श्रुति का अधिकार नहीं है। ‘मनुस्मृति’ काल तक आते-आते वैदिक कर्मकाण्ड स्त्री के लिए मात्र विवाह-संस्कार ही रह गया और उसके लिए अन्य संस्कार निषिद्ध हो गए।
 
स्त्रियों की शिक्षा के प्रति समाज के उत्साह में कमी आने लगी। स्त्री का उपनयन संस्कार लगभग समाप्त हो गया। मनु के अनुसार कन्या के लिए विवाह ही उपनयन-संस्कार है। उपनयन-संस्कार के न होने के कारण स्त्री का द्विजत्व भी समाप्त हो गया और इस प्रकार स्त्री द्विज कि जगह शुद्र हो गयी। इसी काल में पर्दा-प्रथा भी अस्तित्व में आयी जिसके कारण स्त्री चहारदीवारी में सीमित होने के लिए बाध्य हो गयी। माता से अधिक महत्व पिता को दिए जाने के साथ ही परिवार पर स्त्री का सहज अधिकार समाप्त हो गया। स्त्री अब पुरुष की ‘वस्तु’ हो गयी थी। उसका महत्व जमीं के टुकड़ों और गाय-बैल से अधिक नहीं रह गया था। पुरुष ने अपनी सत्ता उसके ऊपर आरोपित कर दिया। संतान को पिता का नाम दिया जाने लगा। वह पहले पिता और बाद में पति के अधीनस्त मानी गयी। मनुस्मृति में कहा गया है कि स्त्री को बचपन में पिता, युवावस्था में पति के और वृधावस्था में पुत्रों के अधीन रहना चाहिए। ‘ऐतरेय ब्राहमण’ में कन्या जन्म को दुःख का कारण माना गया है और अथर्ववेद में कहा गया है कि हमारे यहाँ पुत्र का जन्म हो और कन्या का जन्म किसी और के घर हो। रुढियों का विकास इतना अधिक हुआ कि कन्या का जन्म बोझ समझ जाने लगा और कन्या-वध का प्रचालन शुरू हो गया। ‘तैत्तरीयसंहिता’ में इस बात लका उल्लेख है कि पुत्र का जन्म होने पर पिता आनंदपूर्वक माता के पास लेते हुए नवजात शिशु को हांथों में उठा लेता था, किन्तु यदि कन्या होती थी तो उसे वहीँ लेते रहने देता था।
   
पितृसत्तात्मक व्यवस्था आने से पिता को अपनी कन्या पर पूरा अधिकार प्राप्त हुआ। पुरुष को जहाँ अधि विवाह करने की छूट मिली वहाँ आर्थिक कारणों से स्त्री के बहुविवाह पर पाबन्दी लग गयी। एंगेल्स ने कहा है कि मातृसत्ता से पितृसत्तात्मकसमाज का अवतरण वास्तव में स्त्री जाति की सबसे बड़ी हार है। मानविकीविज्ञान शास्त्र (AnthropologyAntropology) के विचारक ‘लेविस्त्रास’ ने आदिम समाज का अध्ययन करने के बाद कहा-‘ सत्ता चाहे सार्वजनिक हो या सामाजिक, वह हमेशा पुरुष के हाथ में रही है। स्त्री हमेशा अलगाव में रही। उसे यदि पुरुष ने देवी का रूप दिया, तो उसे इतना ऊँचा उठा दिया, निरपेक्ष रूप से इतनी पूज्या बना दिया कि मानव जीवन उसे प्राप्त ही नहीं हो सका।‘ समाज के विकाश की गति के साथ-साथ पुरुष में सत्ता के प्रति लोभ बढ़ता गया और वंश में अपना नाम रखने की इच्छा से प्रेरित होने लगा। स्त्री पुरुष के अधीन होने को विवश थी। पुरुष को मालूम था कि उसका दिया हुआ सामान ही स्त्री भोग रही है। हालाँकि प्राचीन समाज ने स्त्री की अधीनस्थता इतने खुले रूप में नहीं स्वीकारी थी। समाज के विकाश के साथ-साथ पुरुष का आत्मगौरव बढ़ा। वह प्रकृति के संसाधनों के दोहन के साथ-साथ स्त्री का शोषण करने लगा। स्त्री की भूमिका हमेशा शोषित की नहीं, सर्जक की रही। स्त्री की दासता सामंती समाज में अधिक रही क्यूंकि सामंती समाज में निजी संपत्ति या जमीं की अवधारणा सबसे प्रबल थी। 
पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री उत्तरोत्तर अधीन हो गयी और सामंती व्यवस्था के कायदे-कानून और नियम पितृसत्ता को मजबूत करते रहे। स्त्री को साधन के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा। पुरुष ने स्त्री-जीवन, उसकी कार्यशैली, उसकी सत्ता को निर्धारित करने की चेष्टा की। पुरुष ने जो कुछ भी कर्म किया उसका मूल्य आँका गया जबकि स्त्री अप्रत्यक्ष रूप से कार्यरत रही लेकिन उसके किसी श्रम को आँका नहीं जाता था। इसलिए स्त्री-श्रम के प्रति समाज की दृष्टि द्विअर्थक है। सब दिन उसके श्रम का मूल्यांकन करने वाला पितृसत्तात्मक समाज ही है, महाजनी समाज-व्यवस्था से लेकर स्वतंत्र पूंजीवाद युग तक स्त्री पण्य के रूप में ‘बिकती’ रही। 
 

- नीरज कृष्ण