प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण
कुछ भूली-बिसरी, मुस्कुराती यादें
 
शायद जैसे-जैसे उम्र के दरीचे लांघते जाते हैं दिल पुरानी यादों के ढलान पर उतरने लगता है |सच्ची ! कभी कभी तो बरसों पुरानी ऎसी बातें याद आने लगती हैं कि बुक्का फाड़कर हंसने को मन करता है |सच तो ये है कि हम ऐसा कर भी बैठते हैं |फिर जिसको जो समझना हो ,वो समझता रहे | बालपन  की बातें अक्सर उमड़-घुमड़ करती हुई जैसे एक बदली से घेर लेती हैं |अभी दो-चार दिनों की बात है मैं अपनी एक मित्र मधु से बचपन की यादें सांझा कर रही थी कि मुझे कुछ याद करके इतनी जोर से हँसी आई कि मैं फोन पर ही बुक्का फाड़कर हंसने लगी |जैसे-जैसे उन्होंने बार बार पूछा ,वैसे-वैसे मेरी हँसी एक शैतान बालक की तरह तेज़ होती गई | आखिर वे खीज गईं और जब वे फोन बंद करने लगीं तब मैंने बामुश्किल अपने को संयत किया और उनको जो कथा सुनाई उसका लब्बोलुबाव ये था |
 
मेरा बचपन दिल्ली और मुज़फ्फरनगर के बीच झूलते हुए बीता | पिता दिल्ली में थे तो माँ मुज़फ्फरनगर में संस्कृत की अध्यापिका ! छोटी सी थी जब मुज़फ्फरनगर में एक मौन्टेसरी स्कूल खुला था वहाँ दाखिला दिलवा दिया गया पर पिता को उसका स्तर जमा नहीं सो दिल्ली ले जाया गया|फिर न जाने क्यों दुबारा मुज़फ्फरनगर में दाखिला दिलाया गया | मुझे याद है उस समय मैं लगभग चौथी कक्षा में रही हूंगी | दो-एक साल बाद फिर से दिल्ली ठेल दिया गया था ,वह एक अलग बात है |
मुज़फ्फरनगर में हर वर्ष नुमायश होती थी,शायद अब भी होती है .खैर  हम उछलते -कूदते माँ के साथ जाया करते थे ,माँ की कुलीग्स के बच्चे भी साथ होते थे और हम कभी हवामहल,कभी मोटरसाइकिल का कूएँ में चलना,कभी पाप-पूण्य का तमाशा  देखकर बहुत मज़ा करते थे |नुमायश में तरह-तरह की नई-नई चीजें आती थीं |एक बार एक दुकान पर एक नई चीज़ देखने को मिली ,उसे वे लोग रेडियम कह रहे थे |वह एक सुन्दर सी रेडियम की माला थी जो अँधेरे में चमककर अपनी छटा बिखेर रही थी ,पर मंहगी थी |
 
"अम्मा ! खरीदवा दीजिए न !" ठुनक ही तो गई मैं |
"कहाँ पहनती है कुछ ,ढेरों-ढेर सामान पड़ा है ,जहाँ जाती है ,उठा लाती है --" अम्मा का कोई बहुत मूड नहीं था वो माला खरीदवाने का |पर बिटिया का उतरा हुआ चेहरा देखकर तरस आ ही तो गया |आखिर माँ थीं |खैर वह रेडियम की माला खरीद ली गई और माँ की हिदायत कई बार सुननी पड़ी कि संभालकर रखना ,मंहगी है और स्कूल तो बिलकुल मत लेकर जाना |
जितनी बार माँ की हिदायत कान में पड़ी उतनी बार ही बड़ी समझदारी से गर्दन हिला दी गई |अब ज्यादा ही समझदार बच्चे थे हम तो !पर इतनी अच्छी नई चीज़ मिली थी ,बिना ढिंढोरा पीटे,बिना किसीको  दिखाए कैसे पेट का दर्द ठीक होता |सो,एक दिन माँ के कॉलेज जाने के बाद जब स्कूल के लिए निकली तब माला को अपने बैग की भीतरी जेब में डाल लिया |
 
उस दिन बहुत इंतज़ार करना पड़ा खाने की छुट्टी का ,समय कट ही नहीं रहा था |सुबह अम्मा के कॉलेज जाने के बाद माला छिपाकर लेने के चक्कर में घर से निकलने में देरी हो ही गई थी | खैर,किसी तरह वो समय आया जब मैं खुल जा सिमसिम करने वाली थी |क्लास के दरवाज़े बंद कर दिए गए ,अँधेरे में जो दिखाना था  माला का चमकना !सब बच्चे कौतुहल में थे और मैं एक गर्वीली  राजकुमारी की तरह उस नायाब माला को निकालकर अपने हाथों में झुला झुलाकर सबको ललचा रही थी |सब उसे अपने हाथ में लेना चाहते थे पर यह तो पहले ही शर्त लगा दी गई थी कि भाई हाथ में किसीको नहीं दूंगी |खैर थोड़ी देर बाद बच्चे हाथ में न लेने के कारण उदास से हो गए ,कुछ मुंह बिचकाकर इधर-उधर हो लिए |मैं तो बड़ी समझदार निकली ,मैंने सोचा |सबको दिखा भी दिया और अब चुपके से जाकर घर में रख भी दूंगी |
 
अगले दिन जब स्कूल पहुंची तब कक्षा की एक लड़की ने पूछा ;
"अज नी लाई माला ?"
"कट्" मैंने उत्तर में कहा |
 उसने अपना मुह लटका लिया ,समझ में नहीं आया क्या हुआ ?
"क्या हुआ ?" मन में उत्सुकता भर गई थी |
"नईं,रैने दे ----"
"बताओ तो ---"बाल सुलभ मन चंचल हो उठा |
"तुझे बुरा लगेगा "
"नईं,कोई बुरा नईं लगेगा ,बताओ "  मौन्टेसरी स्कूल  में पढ़ी हुई लड़की !तहजीब से पेश आना ही था |उस लड़की से कभी दोस्ती नहीं हुई थी पर पता नहीं क्यों उसका उस दिन का रूप देखकर उसकी तरफ बार-बार मन जा  रहा था |
"अरे!कुछ बुरा नहीं लगेगा ,तुम बताओ तो सही " मैंने उसकी चिरौरी सी की |
"देख ,किसीको बताना मत --नईं तो -----"वह मुझे एक कोने में ले गई | उसका वाक्य बीच में ही काटकर मैंने जल्दी से वो बात जानने की कोशिश की जो वह शायद किसी डर से बताना नहीं चाह रही थी |
"नईं बताऊँगी,तुम बोलो तो ----"दिल की धडकनें सातवें आस्मां को छू रही होंगी ,ऐसा अब लगता है |
"मुझे न ,कल रात भगवान जी ने सपने में दर्शन दिए थे ----"उसने मेरा मुह देखा जो आश्चर्य से खुल गया था |
"हैं---सच्ची ?"
"तो मैं झूठ क्यूं बोलूंगी ?"
"अच्छा --" उसकी बात मानने के अलावा चारा ही कहाँ था |
"उन्होंने कहा " फिर वह रूक गई और मेरा चेहरा ताकने लगी |
"बोल तो --क्या कहा?"
"देख किसीको कहियो मत ----"
"अरे बाबा ,नहीं कहूंगी |बता तो ------"
"भगवान जी ने कहा कि अगर तू उस माला को पीपल के पेड़ के नीचे दो दिन के लिए नहीं रखेगी तो तेरे मम्मी-पापा मर जाएंगे --"
 
मैंने तो आव  देखा न ताव आंसुओं से रोने लगी |अब क्या कर सकती थी ? किसको बताऊँ ?
"देख मैंने कहा था न ,किसीको पता नहीं चलना चाहिए,तू रोएगी तो सबको पता चल जाएगा ,फिर तो तेरे मम्मी-पापा को कोई नहीं बचा सकता " उसने मेरे झरने से बहते आँसू अपनी हथेलियों से पोंछ दिए और मुझे बाहर मुह धुलाने ले गई |
"देख ,वो है न पीपल का पेड़ ,अपने स्कूल में |उसके नीचे मिट्टी में दबाने को कहा था भगवान जी ने ,बस दो दिन के लिए ,फिर तू निकाल लेना |तेरे मम्मी-पापा बच जाएंगे |
 मैं एकटक उसका चेहरा देखती रही |क्या कर सकती थी ?स्कूल से जाते समय भी उसने मुझे याद दिला दिया कि अगले दिन स्कूल में माला ले ज़रूर आऊँ वरना----- और तू घबराना नहीं मैं तेरी मदद करूँगी न,भगवान जी तो रोज़ ही आते हैं मेरे सपने में |"
पूरी रात भर भला  किसको नींद आनी थी ? समझ नहीं आ रहा था  माँ को बताऊँ या नहीं ?फिर न बताने की ही जीत हुई और अगले दिन स्कूल जाते हुए फिर से माला को छिपाकर ले जाने की चिंता ने रात भर योजना बनाने की साज़िश जारी रखी |
 
स्कूल में मेरी हमदर्द सहायता करने के लिए तैयार थी ,पीपल के पेड़ के नीचे गड्ढा खोदा गया और एक लिफाफे में माला को रखकर उसमें दबाकर उसे मिट्टी से ढक दिया गया |उस हमदर्द  की पूरी हिदायत थी कि न तो किसी को बताया जाय और न ही समय से पहले माला को निकाला जाय |छुट्टी होने के बाद हम दोनों साथ ही स्कूल से निकले ,मैं आश्वस्त थी |ठीक था,माँ-पापा को तो बचाना  ही था |एक तरफ़ दो दिनों तक यह घबराहट होती रही कि कहीं माँ माला के बारे में पूछ न लें |खैर ---जैसे तैसे करके दो दिन निकले ,आज माला को निकालने का दिन था ,मेरा मन धड़क रहा था |पूरा दिन ऊपर-नीचे होती रही ,स्कूल की छुट्टी के समय उसी लड़की ने जब कहा कि अब माला निकालने का समय हो गया है तो धड़कनें और तेज़ हो गईं |आखिर उसे भगवान जी ने समय भी तो बताया था |उसके साथ पीपल के पेड़ के नीचे पहुंची ,मिट्टी हटाई गई ,गड्ढा सामने था  ---ये क्या ? वहाँ तो कुछ भी नहीं था |छोटा सा गड्ढा मेरा मुह चिढ़ा रहा था|मैं एक बार फिर ज़ोर से रो पड़ी ,अब तो घर पर अच्छी खबर ली जाएगी |
"देख ! भगवान जी ले गए माला ,तेरे मम्मी-पापा को कुछ नहीं हुआ न ?" उसने फिर से मेरे आँसू पोंछे और मैं आश्वस्त हो गई कि मेरी माला की कुर्बानी ने माँ-पापा को बचा लिया था |
 

- डॉ. प्रणव भारती