प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषांतर
एकांकी- चक्षुदान
अंश -2
लेखक : गौतम राय
बांग्ला से अनुवाद : मल्लिका मुखर्जी
चरित्र – श्यामल, निर्मल, हिरेन, दूर्वा, वृद्ध
 
 
 
(अचानक डोर बेल बज उठती है)
श्यामल : कौन?
(बाहर से आवाज़):  मैं हूँ।
श्यामल : फिर से ये ‘मैं’ कौन है?
(दरवाजा खोलता है। सामने एक सुदर्शन युवक खड़ा है। वैल सूटेड।)
श्यामल : ओह, निर्मल तुम? (निर्मल साष्टांग प्रणाम करता है।)
अरे, अरे ये क्या कर रहे हो? कोई ऐसे पाँव छूता है तो मुझे पैरों में कुछ कुछ  होता है। आज अचानक क्यों आना हुआ?
निर्मल :  हाउ फनी? अपने ही बड़े भैया के पास आना हो तो ‘अचानक’ क्या? जब भी आप  से मिलने का मन करता है, आ ही जाता हूँ।
श्यामल : लेकिन तुम तो एक युग के बाद आये हो निर्मल।
निर्मल :  क्या करूँ दादा (बड़े भैया)? समय ही नहीं मिलता। आप जैसी फ्री लाइफ़ सब को थोड़े ही मिलती है? साल में दस बार तो विदेश जाना पड़ता है। दिल्ली, मुंबई की तो बात ही मत कीजिए। (सुजाता की ओर देखकर) सॉरी, ये बहन जी कौन हैं?
श्यामल : ये बहन? ये तो दूर्वा है, मेरी परिचिता। दूर्वा, ये मेरा छोटा भाई है, निर्मल मजुमदार। 
निर्मल :  दादा, मैं आपसे अकेले में बात करना चाहता हूँ।
श्यामल : अच्छा? लेकिन उसमें संकोच की कोई बात नहीं। दूर्वा तो हमारी अपनी व्यक्ति है। उसके सामने कहने में कोई समस्या नहीं।
 
निर्मल :  दादा मैं बड़ी मुश्किल में हूँ।
श्यामल : तुम और मुश्किल में? मुझे जहाँ तक पता है, तुम मुश्किलों से दूर भागनेवाले इन्सान हो। फिर तुम्हारी समाज में एक अलग पहचान है। तुम्हें क्या तकलीफ़ हो सकती है?
निर्मल :  बुबाई... दादा, समस्या हमारे बुबाई की है।
श्यामल : बुबाई? बुबाई कौन है?
निर्मल :  माय गुडनेस, बुबाई को नहीं पहचाना? आपका एकमात्र भतीजा...
श्यामल : ओह, तुम्हारा बेटा? कैसे पहचानूँ, क्या तुम उसे यहाँ कभी लाए हो?
निर्मल : दादा, टाइम इज अ ग्रेट फेक्टर टू मी। एक मिनट भी समय नहीं मिलता। आज भी बड़ी मुश्किल से आया हूँ।
श्यामल : सही कहा। बारह साल के बाद आज आए हो। जाने दो... हमारे बुबाई का क्या है?
निर्मल :  जन्म से परेशान है बेचारा। पिछले वर्ष टाईफ़ोइड हो गया था और फिर....
श्यामल : फिर क्या?
निर्मल :  फिर... फिर एक आँख चली गई और दूसरी भी अब टिमटिमा रही है। 
(दूर्वा ध्यान से सुनती है)
श्यामल : ये तो बहुत चिंता का विषय है। डॉक्टर क्या कहते हैं?
निर्मल :  दोनों आँखें शीघ्र ही रिप्लेस करनी पड़ेगी। 
श्यामल : तो करवा लो। ऐसे कार्य में देरी नहीं करनी चाहिए।
निर्मल :  इसीलिए तो आया हूँ। मेरी पत्नी ने कहा कि जाओ और दादा के पैर पकड़ लो। (फिर से श्यामल के चरण स्पर्श करता है।)
श्यामल : अरेरे..रहने दो, लग जाएगा।
निर्मल :  माफ़ कर दीजिये दादा। अतीत की घटनाएँ, मान-अभिमान, सब भूला दीजिए। आपकी यह सुन्दर, उज्जवल दो आँखें देकर आप मेरे बुबाई को यानि आपके इकलौते भतीजे को बचा सकते हो।
 
श्यामल : मेरी आँखें ? मर गया!
निर्मल :  हाँ, आपकी आँखें यानि हमारे मजुमदार वंश की आँखें। 
दूर्वा :    असंभव...पहली बात तो ये है कि इतनी बड़ी आँखें उस छोटे बच्चे को फिट ही नहीं होगी और दूसरी बात यह है कि यह आँखें पहले ही बुक हो चुकी है।
निर्मल :  व्होट? दादा ये महिला क्या बक रही है?
श्यामल : ना..ना...यानि कि...यानि मैं ये कह रहा था कि.....
दूर्वा :    क्या ‘यानि-यानि’ कर रहे हो? तुम्हारा यह बुज़दिल स्वभाव अभी तक बदला नहीं? स्पष्ट बात करना कब सीखोगे श्यामल?
श्यामल : इनको मेरी दो आँखों की बहुत जरुरत है अपने पति के लिए।
निर्मल :  फिर यहाँ क्यों आईं है? आई बेंक में चले जाएँ, किसने रोका है?
दुर्वा:     आप चले जाइए न, आपको किसने रोका है?
निर्मल :  मैं क्यों जाऊं? ये मेरे सगे बड़े भैया है। उनकी आँखें लेना हमारा पारिवारिक मामला है।
दुर्वा :    सगे भैया? अब तक कहाँ था ये भातृप्रेम? बारह साल के बाद भाई याद आए?
निर्मल :  दादा, आपकी सहेली को कह दीजिए अभी इसी वक्त यहाँ से चली जाएँ, वर्ना मुझे लीगल कार्रवाई करनी पड़ेगी।
श्यामल : ओहो, मेरी मामूली दो आँखों के लिए ये क्या तूफ़ान मचाया है?
निर्मल :  मामूली नहीं है दादा, मैम को कह दीजिए कि आपकी आँखें उनकी पैतृक संपत्ति नहीं है। उत्तराधिकारी के तौर पर पहला हक़ मेरे बेटे का है। ज्यादा शोर मचायेगीं तो पुलिस स्टेशन जाना पड़ेगा।
दूर्वा :    क्या? आप मुझे जेल भिजवाएंगे?
निर्मल :  बिल्कुल भिजवाऊंगा। आप दादा के मेहमान हैं तो क्या अनड्यू एडवांटेज लेंगीं? इम्पोसिबल, इल्लीगल, अनटोलरेबल....दादा हमारे वंश की ये सुन्दर आँखों को इस तरह नष्ट करने का आपको कोई हक़ नहीं।
दूर्वा :    (रोने लगती है) श्यामल, तुम्हारे भाई ने मेरा अपमान किया है। मैं उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक ले जाऊँगी।
निर्मल :  तो क्या मैं आपको छोड़ दूंगा?
श्यामल : निर्मल तू अपना हक़ छोड़ दे।
निर्मल :  दादा, आपकी ये शिष्टता मुझे जरा भी पसंद नहीं। किसी महिला को देखकर यूँ फ्लैट हो जाते हो।
दूर्वा :    श्यामल, तुम्हारे इस दो नम्बरी भाई को कह दो, अब आगे एक शब्द भी बोले तो....
निर्मल :  क्या कर लेंगीं, आप क्या कर लेंगी? (दूर्वा के नजदीक पहुँच जाता है)
 
श्यामल : ओह, ये तुम लोगों ने क्या आतंक मचा रखा है?
निर्मल :  दादा, ये संपत्ति मेरी है। मैं उसका पजेशन लूंगा। मुझे कोई थर्ड पर्सन नहीं चाहिए।
श्यामल : लेकिन मैंने दूर्वा से वादा किया है।
निर्मल :  वादा करने वाले आप कौन होते हैं, बताइए? मेरी पत्नी ने कितनी उम्मीदों के साथ यहाँ भेजा है! सुनेंगे तो आप भी रो पड़ेंगे।
दूर्वा :    रो पड़ेंगे? श्यामल, ये मत भूल जाना कि उसी महिला ने तुम्हें एक दिन धक्के देकर अपने घर से निकाल दिया था।
निर्मल :  दादा, उस घटना के लिए हम शर्मिंदा हैं। मेरी पत्नी ने कहा है कि आपको अपने साथ ही लेकर आऊँ। आज से आपकी सारी ज़िम्मेदारी अब हमारी रहेगी।
दूर्वा :    हट जाइए..(श्यामल का हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचते हुए) श्यामल अब हमारे साथ रहेगा। हमारी बात हो चुकी है। चलो श्यामल, अभी इसी वक्त तुम मेरे साथ चलो।
निर्मल :  खबरदार! सिर फोड़ दूंगा अगर दादा को हाथ भी लगाया तो।
दूर्वा :    (रोने लगती है) तो क्या आप मुझे मारेंगे?
श्यामल : अरेरे...! मैं महिलाओं को रोते हुए नहीं देख सकता। निर्मल, प्लीज़..
निर्मल :  मैं अब कुछ भी सुनना नहीं चाहता। दादा, अब आपको ऐसी भयावह जगह पर एक मिनट के लिए भी नहीं रखा जा सकता। आप भोले हैं। नाउ बी रेडी। कपड़े और अन्य सामान ले लीजिए। कपडे तो शायद होंगे भी नहीं आपके पास। कोई बात नहीं फूटपाथ से खरीद लूंगा।
दूर्वा :    श्यामल, तुम्हारे पास पिस्तौल है?
श्यामल : पि...पि...पिस्तौल?
दूर्वा :    ना..ना..मेरा मतलब है तुम्हारे पास फ़ोन है?
श्यामल : फ़ोन? मेरे पास?
दूर्वा :    ओह! याद ही न रहा, तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है। क्या किया तुमने जीवनभर? अब मैं अनुपम को कैसे मेसेज दूँ कि...
निर्मल :  टेक्सी नहीं मिलेगी। रिक्शा बुलवाऊं?
दूर्वा :    चुप..
 
श्यामल : सुनो...सुनो...तुम दोनों मेरी बात ध्यान से सुनो। चिल्लाने से कुछ न होगा। तुम दोनों मेरे अपने हो। मैं किसीको भी नाराज नहीं करना चाहता। अगर मैं तुम दोनों को मेरी एक एक आँख दूँ तो कैसा रहेगा?
दूर्वा :    एक आँख से क्या होगा? नहीं-नहीं, सब मेरे पति को ‘काना’ कहकर संबोधित करेंगे।
निर्मल :  तो क्या मैं अपने बेटे को ‘काना’ कहलवाऊं?
श्यामल : मैं क्या कर सकता हूँ, बताओ। तुम दोनों आपस में समझौता कर लो या फिर दोनों में से एक को सेक्रिफाइस करना पड़ेगा। 
(दूर्वा रोने लगती है)
श्यामल : फिर से रोने लगी? अरेरे.. मैं महिलाओं को रोते हुए नहीं देख सकता!
दूर्वा :    तुम झूठे हो। तुमने मुझसे वादा किया था फिर भी..
निर्मल :  दादा, यु आर अ कावर्ड। एक सामान्य महिला की खातिर आप अपनी कानूनन संपत्ति से अपने वंशजों को वंचित कर रहे हैं। ये महिला आपकी दोनों आँखें उखाड़कर दरवान की मदद से धक्का देकर आपको घरसे बाहर करेंगी।
दूर्वा :    और आप क्या करेंगे? श्यामल मैं तुम्हारे भाई को अच्छे से जानती हूँ। तुम्हें अंधा बनाकर फूटपाथ के किनारे बिठाकर भीख मंगवाएंगे और अपने बेटे के नाम रिकरिंग अकाउंट खुलवाएंगे।
निर्मल :  शट अप!
दूर्वा :    यु शट अप!
निर्मल :  यु..
दूर्वा :    डब्ल्यू ...
(हिरेन का प्रवेश। कभी मोहल्ले का मस्तान था। अब भी दादागीरी ही उसका काम है। श्यामल का मित्र है।)
                               
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- मल्लिका मुखर्जी
 
रचनाकार परिचय
मल्लिका मुखर्जी

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