प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2018
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

गीत-

पतझर-सा यह जीवन जो था
शांत, दुखद, बेहाल।
उसमें तुम फागुन-सा आकर
प्रिय मल गए गुलाल।

ग़म को निर्वासित कर तुमने,
मेरा मोल बताया।
जो भी था अव्यक्त उसे,
अभिव्यक्त किया समझाया।
उत्तर तुम हो और तुम्हारे,
बिन मैं सिर्फ सवाल।

आज प्यार का स्वाद मिला है,
जिह्वा फिसल रही है।
थिरक रहे अंतर के घुँघरू,
चाहत मचल रही है।
चुप थे जो मधु-वचन हृदय के,
हुए पुन: वाचाल।

कहाँ बीतते थे दिन पल में,
युग जैसे दिन थे वो।
नहीं घड़ी की प्रिय वो सुइयाँ,
चुभते से पिन थे वो।
आए हो तुम तो लगता है,
पल-पल रखूँ सँभाल।


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गीत-

प्रश्न-चिह्नों में जीवन विफल मत करो,
मान अपना गले से लगाओ मुझे।

इस हृदय की शिला पर शिलालेख-सा,
हो गया नाम अंकित तुम्हारा पिया।
ध्येय तुमको बनाया चले जा रहे,
बस तुम्हें पा रुकेंगे, अडिग प्रण किया।
अब तुम्हें त्यागना प्राण संभव नहीं,
तोड़ बंधन न जग से मिटाओ मुझे।

पीर मेरी हरी, प्यार बन छा गए,
ज्यों शिशिर की निशा को मिली लालिमा।
थी अमित प्यास, मरुथल सदृश थे अधर,
तुम मिले तो जगी, प्रेममय-भंगिमा।
हर ख़ुशी का समर्पण तुम्हें कर रही,
प्रेम को अर्थ दो, मन बसाओ मुझे।

मैं नहीं जानती चाह के मंत्र को,
पर तुम्हीं कृष्ण हो, और मैं राधिका।
हैं सभी प्रार्थनाएं समर्पित तुम्हें,
हो पिया साध्य तुम, और मैं साधिका।
क्या पिया पुण्य है, क्या पिया पाप है,
मैं नहीं जानती, मत बताओ मुझे।


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गीत-

श्याम! तुमसे झर रहा है
प्यार का संगीत निर्मल

तुम बसे हो थपकियों में
स्वप्न में अँगडाइयों में
और बसते प्रेम-सा तुम
श्याम! माँ की लोरियों में
है तुम्हारी ही कृपा से
प्रेममय सारा धरातल

धड़कनों का राग तुम हो
प्रीति हो, अनुराग तुम हो
गीत सावन का तुम्हीं हो
मस्त-मौला फाग तुम हो
और तुम ही धड़कनों में
कर रहे हो श्याम! हलचल

खनक तुम ही छनछनाहट
पक्षियों की चहचहाहट
तुम मधुर बहता पवन हो
और मन की सुगबुगाहट
तुम अधर की बाँसुरी हो
और तुम ही बाँस-जंगल


- गरिमा सक्सेना
 
रचनाकार परिचय
गरिमा सक्सेना

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गीत-गंगा (1)