हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

बेहतरीन जदीद शायरी है 'आईना-दर-आईना'- नागेन्द्र मिश्र मणि

 




डी. एम. मिश्र जदीद शाइरी और हिन्दी ग़ज़ल के बेहतरीन शायर हैं। इनके शिल्प में अनुभूतियों की आत्माभिव्यक्ति के साथ समाज की बहुआयामी चेतना की निष्पति तो है ही, साथ ही साथ वह समय और समाज के अन्तर्विरोधों, आर्थिक विषमताओं, विद्रूपताओं, विसँगतियों व सांस्कृतिक विडम्बनाओं पर चिंतन के रूप में प्रवाहित वाग्धारा भी है ऐसा मैंने मिश्र जी के ग़ज़ल सँग्रह 'आईना-दर-आाईना'  का आस्वादन करते हुए अनुभव है। इन्होंने सामाजिक विसँगतियों का बेबाकी से पर्दाफाश किया गया है। इनकी ग़ज़लों में सामर्थ्यहीन किसानों व मजदूर तबके की स्वाभाविक पैरोकारी देखते ही बनती है। ग़ज़लों में प्रयुक्त बिम्बों व प्रतीकों मे आत्मिक सँवेदना का विस्ताार अत्यन्त गहन है। शायर की दृष्टि समाज में व्याप्त नाना प्रकार की गतिविधियों पर बनी हुई है। उनकी ग़ज़लों मे वह विद्रोहपन झलकता है, जो अदम गोंडवी और दुष्यंत की ग़ज़लों में है। या यूँ कहें, श्री मिश्र जी जनवाद की उस परम्परा को आगे बढाने में कामयाब हुए हैं। मिश्र जी की ग़ज़लों मे जहाँ कटु ययार्थ की सँवेदनात्मक अभिव्यक्ति है, वहीं आदर्शों का आग्रह भी कम नहीं है। उनके एहसास थोथे और बाहृय न होकर अभ्यंतर से प्रतिध्वनित प्रतीत होते हैं तथा वे अपनी ग़ज़लों में मानवता के सर्वोच्च भाव से संयुक्त होकर जीवन मूल्यों को सशक्त धरातल प्रदान करते हैं। उनकी ग़ज़लें बुद्धि से ज़्यादा हृदय के निकट हैं। हृदय मे बसे प्रेम और सौंदर्य के बूते न केवल ज़िन्दगी के ग़मों और खुशियों को बल्कि विद्रोह और इन्कलाब के विचारों को भी उन्होंने ग़ज़ल की विधा में उसी नज़ाकत के साथ सशक्त और प्रभावशाली तरीके से ढाला है। उनकी ग़ज़लें ग़ज़ल के व्याकरण- बहर, रदीफ, काफिये के पैमाने पर भी खरी उतरती हैं। मैं उनकी ग़ज़लों को लेकर बहरे रमल मुसम्मन महजूफ और बहरे रमल मुसद्दस महजूफ के पैमाने पर आज़माते हुए काफी संतुष्ट हुआ। देखे एक उदाहरण- बहृरे रमल मुसम्मन महजूफ़ फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन में-

बेवजह वह मुस्कुराता यह ख़बर अच्छी नहीं
दे रहा झूठा दिलासा यह ख़बर अच्‍छी नहीं


कौन कहता है कि वो फंदा लगा करके मरा
इस व्यवस्था को वो आईना दिखा करके मरा
मुफलिसों की आह से हैं जो तिजोरी भर रहे
उन लुटेरों को हकीकत तो बताकर के मरा


यह बात किसी हद तक.सही है कि ख़याल अल्फाज़ और काफिये व बहरो-वज्न की सरज़मीं पर ही शेर का ताजमहल तामीर होता है लेकिन सिर्फ बहरो-वज्न या ख़यालो-अल्फाज़ ही शाइरी नहीं। बल्कि उनकी आपस मे मुनासिबत भी ज़रूरी है। इसी तत्व को लेकर मिश्र जी ने ग़मे-दौरा और ग़मे-ज़िन्दगी के हालत को इस ख़ूबसूरती के साथ उतारा है, जिन्हें आम शाइर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। आपकी ग़ज़ल सोये हुए आदमी को झकझोरती हुई दौरे-हाज़िर की जदीद शाइरी मे आँचल को परचम बनाने की बखूबी सलाहियत रखती है। इसलिए न तो वह ख़ामोशी के शाइर हैं, न ही जलालो-जमाल के। वह एक बेहतरीन शायर हैं ज़िन्दगी की मुहब्बत के, इबादत के तभी तो आपकी तख्लीकात में अहसासात व ख्यालात की खुशबू को महफूज़ रखने के लिए गुलाब के मानिन्द घनी पत्तियों की टहनियों के काँटों की पहरेदारी नहीं, इंसानियत और मुहब्बत के दरबान खड़े किये हैं। जिससे इस रास्ते से गुज़रने वाला ज़िन्दगी से निराश नहीं होता। आपकी ग़ज़लें हमें आशावाद की तरफ ले जाती हैं। ये ग़ज़ल चाँदी-सोना के वर्क से ढकी हुई नहीं, बल्कि कच्ची मिट्टी के आब खोरों की मंद-मंद भीनी-भीनी खुशबू से तैयार की गयी हैं। बहरे रमल मुसम्मन महजूफ फायलातुन फायलातुन फायलातुन फायलुन का एक उदाहरण दे‍खें-

छू लिया मिट्टी तो थोड़ा हाथ मैला हो गया
पर, मेरा पानी से रिश्ता और गहरा हो गया


मिश्र जी की ग़ज़लें तमाम रिवायती फन्नी और इजहारी खूबियों के साथ-साथ तजुर्बों ताज़गी तगज्जुल की रौशनी से ज़ियावार हैं। एक और ख़ूबसूरत बानगी देखी जा सकती है-

वो समंदर है तो होने दीजिए
सीप ही काफी है मोती के लिए
छोड़िये माज़ी के सब रस्मो-रिवाज़
वक्त के हमराह चलना सीखिए


आप के कलाम में खुसूसियत यह भी है कि आप हिन्दी के साथ उर्दू लफ्जों को बेतकल्लुफी से इस्तेमाल करते हैं। ऐसा वह जान बूझकर करते हैं ताकि हिन्दी व उर्दू के लोग एक-दूसरे के करीब आयें और दोनों भाषाओं का दामन वसीह हो जाये।

सुनता नहीं फरियाद कोई हुक्मरान तक
शामिल है इस गुनाह मे आलाकमान तक
मिलती नहीं ग़रीब को इमदाद कहीं से
इस मामले मे चुप है मेरा संविधान तक


वोटरों के हाथ में मतदान करना रह गया
दल वही, झंडे वही, काँधा बदलना रह गया


ऐसे तमाम शेरों में मिश्र जी की जदीद शाइरी की ग़ज़लें अपने समय और समाज को ललकारती हैं। देश में बढते अपराध, राजनैतिक भ्रष्टाचार, सामाजिक विडम्बना के खिलाफ लड़ने के लिए जैसे इस शाइर/कवि ने कमर कस ली हो।
मिश्र जी ने ग़ज़लों के माध्यम से वर्तमान यथार्थ को बे-नकाब किया है। संत्रास और कोलाहल ने कवि के मन मे जिन अन्त:अनुभूतियो को उत्पन्न किया है, वह ग़ज़लों में बड़े  मार्मिक ढंग से व्यक्त हुई है-


सत्ता की कामयाबियों मे देखिये उसे
जनता की परेशानियों मे देखिये उसे


सटीक भावान्विति, सूक्ष्म सघनता एवं उक्ति वैचित्रय मिश्र के काव्य की विशेषता है। लोक संवेदना, जातीय संस्कार, युगीन सन्दर्भ, नवीन सौंदर्य बोध, जीवन के प्रति लोक मंगल की भावना के साथ मिश्र जी अपनी ग़ज़लों में समकालीन सरोकारों से संवाद स्थापित करते हुए बार-बार नज़र आते हैं। इसके लिए ग़ज़ल की प्रचलित बहरें, हिन्दी के  नये छन्दों एवं नूतन शब्दों को उन्होंने अपने द्वारा भी गढें नये शिल्पों में ढालते रहते हैं। लेकिन वह कभी ग़ज़ल का काव्यानुशासन शिथिल नहीं होने देते। मेरा निजी मत है कि वह ग़ज़ल कहीं ज़्यादा सार्थक होती है, जो छन्द और बहर- दोनों दृष्टियों से शुद्ध होती है। ऐसा मिश्र जी के यहाँ भरपूर है। वह बड़ी सहजता के साथ ग़ज़लगोई करते हैं। उनके पास भावों की गहराई, अनुभूतियों की सघनता और कथ्य की विविधता पर्याप्त है। देखिये बहरे मुजतस मुसम्मन मखबून मकतूअ मुफाइलुन फइलातुन मुफाइलुन फ़ेलुन-

घनी है रात मगर चल पड़े अकेले हैं
किधर से जायेंगे हर राह पर लुटेरे हैं
हमीं नहीं ये बात आप भी समझते हैं
वही समाज का दुश्मन उसी के चर्चे हैं


इनकी ग़ज़लों मे प्यार और श्रृंगार का सम्मिश्रण भी खूब देखने को मिलता है। कहीं  इन्द्रधनुषी सपने हैं, तो कहीं प्राणों में धधकती आग है, तो कहीं अधरों पर बजती बांसुरी। इनकी ग़ज़लों में बहर और कहन का अंदाज भले ही फारसी, उर्दू न हो लेकिन हिन्दी के मनोहरी परिधान और आत्मा की रसात्मकता के साथ ग़ज़लियत की सभी शर्तों पर खरी उतरती हैं। नज़ाकत और नफ़ासत मे बार-बार डूबने को जी चाहता है। ग़ज़ल का जन्म ही महबूब के साथ गुफ्तगू से हुआ है तो मिश्र जी भी अपनी ग़ज़ल वहीं से उठाते हैं। देखिये शेर बहरे रमल मुसद्दस महजूफ-

प्यार मुझको भावना तक ले गया
भावना को वन्दना तक ले गया


मिश्र जी के दिल से जो.धुआँ उठता है, वह सारे आलम को गिरफ्त में ले लेता है। उनके इस शेर को भी देखिये जो बहरे खफीफ मुसद्दस महजूफ में कहा है-

आदमी देवता नहीं होता
पाक दामन सदा नहीं होता


फाइलातुन मुफाइलुन फ़ेलुन की व्यवस्था पर बहुत कम शाइर ग़ज़लें कह पाते हैं। लेकिन मिश्र ने इस बहर में कई ग़ज़लें कही हैं। इसी के साथ यह कहना भी समीचीन होगा कि श्री मिश्र ने भाषा और विविधताओं की संकीर्णता से ऊपर उठकर छंद की आत्मा को ग़ज़ल के रूप, रस, गंध मे ढाल कर ग़ज़ल रची है। उनके शब्द बोलते, खनकते हैं और श्रोता/पाठक के दिलो-दिमाग़ में उतरते हैं। वे एक मौलिक ग़ज़लकार हैं। वे परम्पपराओं के खिलाफ नहीं हैं लेकिन समय-समय पर ज़रूरी परिवर्तन के पक्ष में भी हैं। वे लोगों को आगाह करते हुए कहते हैं- नया रास्ता तैयार करते रहो, लकीर का फकीर मत बनो उनका यह शेर देखे-

लीक से हट के चलोगे तो लोग बोलेंगे
लोक सदियों से पीटते लकीर होते हैं


मकबूल शायरों की तरह मिश्र जी अच्छे फनकार हैं।






समीक्ष्य पुस्तक- आईना-दर-आईना
प्रकाशक- नमन प्रकाशन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
संस्करण- प्रथम, 2016
मूल्य- 250 रूपये मात्र


- नागेन्द्र मिश्र मणि
 
रचनाकार परिचय
नागेन्द्र मिश्र मणि

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