प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -35

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते-स्वर

दर्द का श्रृँगार कर

वक्त की हर माँग को पहचान कर चलते रहो
दर्द का श्रृँगार कर सुख-दीप सा जलते रहो

अर्न्तकलह से दूर रहो हर साँस का एहसास कर
तू कर्म कर सब भूलकर तू ख़ुद में ही विश्वास कर
मजबूरीयों की डाल पर, हर वक्त तुम फलते रहो
वक्त की हर माँग को पहचान कर चलते रहो
दर्द का श्रृँगार कर सुख-दीप सा जलते रहो

हर एक बंदिश को तोड़कर तू काम को अँजाम दे
जो आजतक है ना हुआ! कर, दुनिया को पैगाम दे
इस बेपनाहों के शहर में, कफन पे पलते रहो
वक्त की हर माँग को पहचान कर चलते रहो
दर्द का श्रृँगार कर सुख-दीप सा जलते रहो

मुस्कुराने की वजह को ढूँढना मुश्किल यहाँ
ज़िन्दगी की दौड़ में हम भूल गये जाना कहाँ
जद्दोजहद की कंटकों में फूल-सा खिलते रहो
वक्त की हर माँग को पहचान कर चलते रहो
दर्द का श्रृँगार कर सुख-दीप सा जलते रहो


- लक्ष्मी तिवारी
 
रचनाकार परिचय
लक्ष्मी तिवारी

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उभरते स्वर (1)