प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- न्याय

कॉलेज से जब मैं वापस अपने हॉस्टल पहुँचा तो देखा वहाँ भीड़ जमा है। पुलिस भी आ चुकी है। मेरे रूम के सामने वाले रूम के दरवाज़े को तोड़ने की कोशिश की जा रही है। आसपास में लोग इकट्ठे हो गए थे और दबी ज़ुबान में कुछ-कुछ बातें कर रहे थे। पता चला अन्दर नीरज की लाश पंखे से झूल रही थी।

आत्महत्या के कारणों पर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं। कोई असफल एकतरफा प्रेम, तो कोई पढ़ाई में नाकामी, तो कोई परिवार से नाराज़गी की बात कर रहा था। जितने मुँह उतनी बातें। सुबह कॉलेज जाने के वक्त भी जब नीरज के रूम का दरवाज़ा नहीं खुला तब मकान मालिक ने उसका दरवाज़ा खटखटाया था। काफी देर आवाज़ देने पर भी जब दरवाज़ा नहीं खुला था तब खिड़की से झांक कर देखने पर उसके पंखे से लटक कर आत्महत्या करने की जानकारी मिली थी।


आनन फानन में पुलिस और उसके घर वालों को जानकारी दी गई थी। धड़ाम.... धड़ाम...धड़ाम .... दरवाजे को तोड़ने की आवाज आ रही थी। मेरे जेहन में नीरज का चेहरा और उससे साथ बिताए कुछ पल कौंध रहे थे। मेरी कोई खास जान पहचान नहीं थी उससे, इसके बावजूद कि हम एक ही हॉस्टल में रहते थे और वह भी बिल्कुल आमने सामने के कमरे में। कारण यह था कि हम दोनों अलग अलग विषय के छात्र थे और साथ ही दोनों अंतर्मुखी भी थे। पर परसो रात वह मेरे रूम में आया था।

‘एक मदद चाहिए।’- उसने कहा था। ’क्या?’- मैने पूछा था। ’एक समान दूंगा तुम्हें, रात भर के लिए रख लो। यदि मैं माँगू तो भी मत देना।‘
‘ऐसा कौन सा सामान दोगे और क्यों?’- मेरे जेहन में हथियार या ड्रग्स की तस्वीर कौंध गई। ’बस, एक अहसान करो आज रात भर के लिए’- इतना कह वह अपने कमरे में गया और  वापस आ कर एक रैट किलर ला कर मेरे हाथ में दे दिया। ’यह क्या है?’- मैंने पूछा। ’मेरे मन में तरह तरह के विचार आ रहे हैं। आत्महत्या करने की बड़ी इच्छा हो रही है। उसी उद्देश्य से मैंने इसे खरीदा भी था। डर है रात में कहीं इसे खा न लूँ। इसीलिए प्लीज, इसे आज रात भर के लिए रख लो, मैं माँगू भी तो मत देना।‘


मेरा मन उसके प्रति नफरत से भर गया। आत्महत्या..... मतलब......  भगोड़ा। बुजदिल कहीं का। ’आज रात भर के लिए क्यों, इसे मैं हमेशा के लिए रख लूँगाय मेरे रूम में चूहों को मारने के काम आएगा, आखिर है तो यह चूहों के लिए ही न।‘
शायद वह मुझसे यह उम्मीद कर रहा था कि मैं उसे आत्महत्या न करने के लिए मिन्नतें करूँगा, समझाऊँगा। पर मैंने  रैट किलर को अपने लिए उपयोगी बताकर बात समाप्त कर दी थी।    
‘ठीक है! चलता हूँ।‘ - वह अपने कमरे में चला गया। मैंने  भी अपने कमरे का दरवाजा बन्द कर लिया।


संयोग से सुबह बरामदे में रखे वाटरकूलर-कम-प्यूरिफायर से पानी भरने हम लगभग एक साथ पहुँचे। कभी कभी हम वहाँ साथ साथ पहुँचते थे, पर बातें नहीं होती थी हमारे बीच। चूंकि कल वह मेरे कमरे में आया था और उससे थोड़ा अलग तरह से ही, परिचय हो गया था, अतः मैंने उसे टोकना मुनासिब समझा।  
‘अब कैसे हो?’, मैंने पूछा था।
‘ठीक हूँ’, पानी बोतल में भर लेने के बाद वह मेरे बोतल के भरने की प्रतीक्षा करने लगा। जब मैं अपना बोतल भर कर अपने कमरे में आया तो वह भी मेरे पीछे पीछे आ गया।
‘बैठो’- मैंने कुर्सी की ओर इशारा किया।
वह बैठ गया। थोड़ी देर इधर उधर देखता रहा फिर मेरे चेहरे पर अपनी नजरें गड़ा दी और बोलने लगा, मुझे एक्टिंग का बहुत शौक था। बारह बरस का था मैं उसी समय से एक्टिंग का दिवाना हो गया था। बड़ा हो कर एक्टिंग की दुनिया में कदम रखना चाहता था। पर मेरे घर वाले राजी नहीं थे। मेरे पिताजी जज हैं। वे मुझे भी जज ही बनाना चाहते हैं। मैंने लाख मिन्नतें की कि मुझे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा या फिल्म इंस्टिट्यूट में दाखिला लेना है, पर घर वालों ने एक न सुनी। जबरदस्ती लॉ कॉलेज में डाल दिया। मैं एक्टिंग से इतना प्यार करता हूँ कि उसके बिना रह नहीं सकता। किसी और काम में जी नहीं लगता। क्या करूँ समझ नहीं आ रहा।‘ वह विक्षिप्त की तरह बड़बड़ाने लगा, ‘दिल चाहता है इस जीवन को ही समाप्त कर लूँ, न रहेगा बाँस न बजेगी बांसूरी।‘- उसकी आँखों से अविरल आँसू बहने लगे। बेचैनी से वह अपनी गर्दन इधर से उधर हिलाने लगा।


मुझे उसकी हालत देख दया सी आ गई, ‘देखो आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं  है। और फिर आत्महत्या कर लोगे तो तुम्हारे परिवार पर क्या बीतेगी? सोचो जरा! - मैने उसे समझाने की कोशिश की।
‘परिवार? हा.... हा.... हा....- एकाएक वह ठहाका लगा कर हंस पड़ा। परिवार तो मुझे न जाने कितने वर्षों से तिल तिल कर मार रहा है, मेरे अरमानों का गला घोंट रहा है’- उसकी आवाज कुछ कुछ वहशीपन लिए हुए थी।
‘देखो, तुम कुछ दिनों के लिए अपने घर चले जाओ और आराम करो। सब ठीक हो जाएगा। आवश्यकता पड़े तो किसी मनोविशेषज्ञ से सलाह लो- मैंने उसे समझाने की कोशिश की।
वह एकाएक उठ कर अपने कमरे की ओर चला गया, बगैर कुछ कहे।


मुझे उसकी स्थिति कुछ ठीक नहीं लगी। मेरे पास उसके घर वालों को कोई कॉंन्टैक्ट न.  नहीं था जिससे उन्हें  सूचित कर पाता। मैंने  मकान मालिक को सारी बात बता दी। मकान मालिक चिंतित हो उठा। शायद किसी की आत्महत्या की चिंता कम थी, उसके बाद होने वाली परेशानियों की चिंता अधिक थी। उसने मेरे सामने ही उसके घर वालों को फोन किया।
‘विचित्र घर वाले हैं,फोन पर बात करने के बाद उसने कहा, कह रहे हैं कि इस प्रकार की गीदड़ भभकी वह पहले भी दे चुका है। आप निश्चिंत रहें।
उसके बाद उससे मेरी मुलाकात नहीं हुई थी। मैं सुबह दस बजे कॉलेज के लिए निकल गया था। दो बजे वापस आया तो देखा हॉस्टल के सामने भीड़ लगी हुई है। आस पास के सभी लोग अपना काम छोड़ वहाँ तमाशा देखने पहुँच गए थे। नीरज के कमरे के दरवाजे को तोड़ने की कोशिश हो रही है।
मैं हतप्रभ हो गया। दो दिनों पहले ही उससे पहली बार बात हुई थी। कल भी काफी देर बाद मेरे कमरे में बैठा था। थोड़ी देर में एक गाड़ी आई। उसमें जज साहब और उनकी पत्नी उतरीं। साथ में एक अर्दली और कोई रिश्तेदार भी था। जज साहब के चेहरे पर अभी भी पिता के दुख के साथ साथ जज की गंभीरता टपक रही थी। पर उनकी पत्नी दहाड़  मार  कर रोए जा रही थीं- यह क्या किया बेटा तूने? अपनी माँ के साथ यह कैसा न्याय किया तूने......?
न्याय! यह शब्द अटपटा सा लगा मुझे। जज परिवार ने कौन सा न्याय किया था अपने बेटे पर उसकी इच्छा के विरुद्ध जज बनाने का निर्णय थोप कर। यदि उन्होंने उसकी पसन्द के अनुसार उसका नामांकन किसी ड्रामा या फिल्म संस्थान में करवा दिया होता तो शायद न्याय होता नीरज के साथ और शायद आज जो घटना हुई वह न हुई होती।


- विनय कुमार पाठक
 
रचनाकार परिचय
विनय कुमार पाठक

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कथा-कुसुम (1)