हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

तुम कहो तो

तुम कहो तो वंदना के पुष्प हैं, मनुहार हैं।
यदि नहीं तो गीत मेरे धूल हैं, बेकार हैं।।

दीप बन करते प्रतीक्षा रातभर जलते रहे,
आस के मोती हृदय के सीप में पलते रहे।
श्वास के आवागमन में प्राण! तुम ही हो बसे,
और तुम ही शब्द बनकर गीत में ढलते रहे।
कर इन्हें स्वीकार तुम अब निज हृदय पट खोल दो।
गीत मेरी प्रार्थनाएँ, प्राण के उदगार हैं।।

बाँसुरी की तान है, गोकुल यही, ब्रजधाम है,
भक्ति को संकल्प दे दे प्रेम ऐसा नाम है।
सात फेरों, बंधनों से मुक्त है, आकाश है,
प्रेम मीरा का भजन है, सत्य है, निष्काम है।
मीत बिन प्रिय मूल्य इसका कौन जग में दे सका!
गीत हैं अभिव्यंजनाएँ, ये सतत-अभिसार हैं।।

प्रिय! प्रणय के गीत श्लोकों की तरह हो जाएँगे,
शब्द-शक्ति को पिरोकर नेह को दर्शाएँगे।
गीत ये गीता सदृश हैं, जानने की देर है,
तुम अगर स्वर से लगा लो ये अमरता पाएँगे।
हम रहेंगें न रहेंगें गीत ये रह जाएँगे।
मीत मेरे गीत जीवन का सफल शृंगार हैं।।


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तुम गए गीत में बस व्यथा रह गई

गीत में हर खुशी बन तुम्हीं थे बसे,
तुम गए गीत में बस व्यथा रह गई।

कौन तुम बिन प्रिये! अश्रुओं से कहे,
मत बहो, मत बहो, होंठ से चूमकर।
कौन अपना कहे, ले गले से लगा,
कौन बातें करे स्वयं को भूलकर।
वह छुअन, वह लगन, बात अब वह नहीं,
साथ मेरे विरह की प्रथा रह गई।।

अब विधुर स्वप्न है, प्यास ही प्यास है,
न कोई हास है, व्यर्थ श्रृंगार है।
रट वही है, धूनी है वही प्रेम की,
फर्क बस है यही, साथ अंगार है।
मैं अधूरा रहा, तुम अधूरे रहे,
औ' अधूरी हमारी कथा रह गई।।

जी रहा हूँ तुम्हें मान कर जिन्दगी,
पर चुका जा रहा श्वाँस का स्नेह अब।
व्यर्थ ही यह रहेगी प्रतीक्षा प्रिये!
मानता है मगर यह हृदय बात कब।
भूल कर तुम गए प्यार के हर वचन,
पर तुम्हारे लिए आस्था रह गई।।


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मैंने कब चाहा था

मैंने कब चाहा था
उन आँखों का रोना
लेकिन जग की रीत यही है।

मैंने उसके, उसने मेरे
मन को देखा
सुनी धड़कनों को
सूने जीवन को देखा
प्यार भरी बातों में हमने
सीखा खोना
सच्चे मन की प्रीत यही है।

मैंने हँसने की, जीने की
चाह जगाई
मेरे अरमानों ने फिर से
ली अँगड़ाई
मिला मुझे उसके दिल में
इक छोटा कोना
प्रेमिल मन की जीत यही है।

लोकगीत की गंध
प्यार की मधुरिम आशा
लिखूं हँसी उसकी
इतनी-सी थी अभिलाषा
मगर गीत के भाग्य मिला
सुख का शव ढोना
बोझिल मन का गीत यही है।


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खुश रहो तुम

खुश रहो तुम ज़िन्दगी में प्राण! हरपल,
चाहतें अपनी विसर्जित कर रहा हूँ।

मानकर देवी, हृदय में बास देकर,
नित्य मैं करता रहा अभिसार तुमसे।
सुखद क्षण की आँधियों में खो गया मैं,
और जुड़ता ही रहा संबंध गम से।
वर्जनाओं में निहित पीड़ा हृदय की,
आँसुओं में मैं प्रवाहित कर रहा हूँ।।

अर्थ क्या पत्रों का यदि तुम ही नहीं हो,
चुभ रहे हैं शब्द इनके शूल बनकर।
क्या करूं उपहार को घर में सजाकर,
दर्द का उपहार जब रहता हृदय-घर।
विरह-अग्नि को मेरे उर में बसाकर,
अग्नि को उपहार अर्पित कर रहा हूँ।।

भूल थी अपराध था जो ही मगर था,
है यही निष्कर्ष गम को भोगना है।
मानता हूँ भूलना तुमको असंभव,
पर चिता से व्यर्थ जीवन माँगना है।।
हो नहीं कलुषित जगत में प्रेम साथी,
वेदना से शक्ति अर्जित कर रहा हूँ।।


- राहुल शिवाय
 
रचनाकार परिचय
राहुल शिवाय

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गीत-गंगा (1)