प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

स्मृति

इक दिन तू अपने आप को मरते हुए भी देख: मोहम्मद अल्वी


लोकप्रिय शायर मोहम्मद अल्वी का सोमवार 29 जनवरी को अहमदाबाद में देहांत हो गया। अल्वी आधुनिक शायरों में शुमार थे। उन्होंने सरल शब्दों में गहरे एहसास की ग़ज़लें और नज़्में लिखी हैं। अल्वी को कविता संकलन 'चौथा आसमान' के लिये 1992 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
इनका जन्म 10 अप्रैल 1927 को अहमदाबाद में हुआ था। इन्होंने प्राथमिक शिक्षा यहीं प्राप्त की। दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से उच्च शिक्षा हासिल की। इनकी प्रकाशित कृतियाँ- ख़ाली मकान (1963), आख़िरी दिन की तलाश (1967), तीसरी क़िताब (1978), चौथा आस्मान (1991), रात इधर उधर रौशन (1995) हैं। इन्हें साहित्य अकादमी और गुजरात उर्दू अकादमी के पुरस्कार भी हासिल हुए।

हस्ताक्षर परिवार उनके निधन पर श्रद्धांजलि अर्पित करता है।



मोहम्मद अल्वी की कुछ रचनाएँ

ग़ज़ल-

दिन इक के बाद एक गुज़रते हुए भी देख
इक दिन तू अपने आप को मरते हुए भी देख

हर वक़्त खिलते फूल की जानिब तका न कर
मुरझा के पत्तियों को बिखरते हुए भी देख

हाँ देख बर्फ़ गिरती हुई बाल-बाल पर
तपते हुए ख़याल ठिठुरते हुए भी देख

अपनों में रह के किस लिए सहमा हुआ है तू
आ मुझ को दुश्मनों से न डरते हुए भी देख

हैरान मत हो तैरती मछली को देख कर
पानी में रौशनी को उतरते हुए भी देख

देखा न होगा तू ने मगर इंतिज़ार में
चलते हुए समय को ठहरते हुए भी देख

तारीफ़ सुन के दोस्त से 'अल्वी' तू ख़ुश न हो
उस को तेरी बुराइयाँ करते हुए भी देख


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ग़ज़ल-

सफ़र में सोचते रहते हैं छाँव आये कहीं
ये धूप सारा समंदर ही पी न जाये कहीं

मैं खुद को मरते हुए देखकर बहुत खुश हूँ
ये डर भी है की मेरी आँख खुल न जाये कहीं

हवा का शोर है, बादल हैं और कुछ भी नहीं
जहाज़ टूट ही जाये, ज़मीं दिखाए कहीं

चला तो हूँ मगर इस बार भी ये धड़का है
ये रास्ता भी मुझे फिर यहीं न लाये कहीं

ख़ामोश रहना तुम्हारा बुरा न था 'अलवी'
भुला दिया तुम्हें सबने न याद आये कहीं


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ग़ज़ल-

आया है एक शख़्स अजब आन-बान का
नक़्शा बदल गया है पुराने मकान का

तारे से टूटते हैं अभी तक इधर-उधर
बाक़ी है कुछ नशा अभी कल की उड़ान का

कालक-सी जम रही है चमकती ज़मीन पर
सूरज से जल उठा है वरक़ आसमान का

दरिया में दूर-दूर तलक कश्तियाँ न थीं
ख़तरा न था हवा को किसी बादबान का

दोनों के दिल में ख़ौफ़ था मैदान-ए-जंग में
दोनों का ख़ौफ़ फ़ासला था दरमियान का

'अल्वी' किवाड़ खोल के देखा तो कुछ न था
वो तो क़ुसूर था मेरे वहम-ओ-गुमान का

 

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नज़्म-

कभी दिल के अंधे कुएं में पड़ा चीखता है
कभी खून में तैरता डूबता है
कभी हड्डियों की सुरंगों में बत्ती जला कर यूँ ही घूमता है
कभी कान में आके चुपके से कहता है
'तू अब तलक जी रहा है?'
बड़ा बे-हया है
मेरे जिस्म में कौन है यह
जो मुझ से ख़फ़ा है!


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नज़्म-

ये बदन
जिसे मैं
बेहतरीन ग़िज़ाएँ खिलाता रहा
पानी की जगह
शराब पिलाता रहा
यही बदन
मुझ से कहता है
जाओ
दफ़ा हो जाओ
जन्नत के मज़े उड़ाओ
कि दोज़ख़ के अज़ाब उठाओ
मेरी बला से
मैं तो अब
क़ब्र में सो रहूँगा
मिट्टी हूँ
मिट्टी का हो रहूँगा!


- मोहम्मद अल्वी
 
रचनाकार परिचय
मोहम्मद अल्वी

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