प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

सरेआम मुझको मुझी से चुराकर
गया कौन दिल की ग़ज़ल गुनगुनाकर

ख़ुदा खैरमक़दम करे है किसी का
रखे चाँद तारे फ़लक पर सजाकर

ये आँसू करे चुगलियाँ तब ही आके
रखूं तेरी यादों को जब भी छिपाकर

तुझे देवता अपना मैंने बनाया
मिला है कहाँ कुछ भी सर को झुकाकर

कहाँ से कहाँ ले के तू आ गया है
इशारे-इशारे में मुझको रिझाकर


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ग़ज़ल-

बात छेड़ो नहीं मुहब्बत की
राह काँटों भरी है उल्फ़त की

आप यूँ आँख से हुए ओझल
हाथ से ज्यों लकीर किस्मत की

नित नए ज़ख्म आ रहे दिल पर
कोई उम्मीद है न राहत की

कब्र पर आके मार दी ठोकर
वज्ह क्या है बताओ नफ़रत की

देख ली आपकी ये दुनिया तो
चलके देखें बहार जन्नत की


- रेणु मिश्रा
 
रचनाकार परिचय
रेणु मिश्रा

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ग़ज़ल-गाँव (2)