प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते-स्वर

तब समझो प्यार हुआ हमको

जब आस मिलन की जागी हो
जब हृदय बने अनुरागी हो
जब मदहोशी-सी छा जाए
और ख़ामोशी भी आ जाए
जब एक नाम ही रमते हों
बस उसी की माला जपते हों
जब तन से अर्पण कर बैठे
मन से भी समर्पण कर बैठे
जब याद का दरिया नदी बने
जब एक-एक पल सदी बने
पतझर भी बहार लगे हमको
तब समझो प्यार हुआ हमको

जब ख़ुद को बहुत सजाएँ हम
ख़ुद से भी बहुत लजाएँ हम
जब भूख भी कम-कम लगती हो
आँख रात भर जगती हो
जब चमन रोज़ मधुमास लगे
और रोज़ मिलन की आस जगे
सावन सब हमको माह लगे
जब आलिंगन की चाह जगे
जब बातों में तकरार लगे हमको
तब समझो प्यार हुआ हमको

जब खोने से रोज़ डरे उसको
बाहों में रोज़ भरे उसको
जब कोलाहल एकांत लगे
सागर भी हमको शांत लगे
हो दर्द उसे और चीखें हम
सौ बार आईना देखें हम
जब गीत में उसको गुनते हों
बस ख़्वाब उसी के बुनते हों
जब चाहत इक खुमार लगे हमको
तब समझो प्यार हुआ हमको

ख़्वाबों का अम्बर सजाएं हम
रूठें और मनाएं हम
दुनिया की फ़िक्र नहीं करते
औरों का ज़िक्र नहीं करते
उसमें ही दुनिया देखें हम
झूम उठे बिन पीके हम
जब नाम उसी का आता हो
और ध्यान उसी का आता हो
वो बातों में शुमार लगे हमको
तब समझो प्यार हुआ हमको


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कैसे उसे भिखारी कह दूँ

एक रोज़ वो मुझसे बोला
तेरे दर पर आया हूँ
दो रोटी ही दे दो बाबा
बड़ी दूर से आया हूँ

उसकी काया देख देख
मेरा मन भी डोल गया
कृतज्ञ भाव से इन शब्दों को
जब वो मुझसे बोल गया

उसकी काया ऐसी थी
माना सदियों का भूखा है
यकीं नहीं मै कर पाया था
लगा नज़र का धोखा है

उसे देख मैं कुछ सकुचाया
आह मेरी निकल पड़ी
हालत उसकी देख-देख कर
आँखें मेरी छलक पड़ीं

मैंने उसको दी रोटी
दिल को तब आराम मिला
ख़ुद के अंदर ही दर्शन का
मुझे पुण्य तब धाम मिला

दुआ ख़ुशी की देकर मेरे
दुःख को हरकर चला गया
कैसे उसे भिखारी कह दूँ
जो झोली भरकर चला गया

दो रोटी का मूल्य बड़ा या
उसकी लाख दुआओं का
नहीं आज तक उत्तर पाया
अपने मन के भावों का

अपने मन के कई सवालों से
मैं अब तक जूझ रहा हूँ
कोई भी मुझको बतला दे
सबसे ही मैं पूछ रहा हूँ

हममें तो बस स्वार्थ भरा है
असली तो वो पेशेवर हैं
उनकी दिल की एक दुआ पर
सारा धन भी न्यौछावर है

एक कौर के बदले में जो
लाख दुआ दे जाते हैं
सच्चे देने वाले वो हैं
हम हाथ बंधे रह जाते हैं


- राहुल प्रसाद
 
रचनाकार परिचय
राहुल प्रसाद

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