प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2015
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

'समय' की फ़ितरत
समय और इंसान का चोली-दामन का नाता है! इंसान जन्म लेता है तब लोग समय देखते हैं, इंसान जब तक जीता है हर समय; समय देखता है और मरता है तब फिर लोग समय देखते हैं! हर बात, हर काम, हर परिस्थिति, हर जरुरत, हर कर्तव्य और हर अधिकार के लिए समय का इंतजार..तो कभी अच्छे दिनों का इंतजार! साथ ही जाने कितने इल्ज़ाम..जैसे:- समय ख़राब है,..समय ही गलत है,..जाने सही समय कब आएगा,.. सही समय कभी समय पर नहीं आता, इत्यादि. पर मुझे ऐसा लगता है कि हमारी इच्छाएं ही ऐसी होती हैं जो समय के अनुरूप नहीं होती! बच्चे जब पैदा होते हैं तब से शुरू होते हैं इंतज़ार के सिलसिले...बच्चे की पहली मुस्कान का, पहले कदम का, पहले शब्द का, स्कूल के पहले दिन का, फिर बच्चे के बड़े होने का, परीक्षा का, परिणाम का, जवानी का, काम का, शादी का, फिर खुद के परिवार का, जिम्मेदारियों के निर्वाह का और अंततः वृद्धावस्था में जीवन यापन और फिर मृत्यु! हर अवस्था के लिए हम पहले से ही इंतजार करते हैं. हर वक़्त आने वाले कल और आने वाले पल के इंतजार में गुजरता है!
 
कभी सोचती हूँ कि क्यूं नहीं हम वर्तमान में जीते ? क्यूं नहीं होता हमारा प्रयास कि जो आज है उसे जी भर कर जी लिया जाए? पर जानती हूं "कहना आसान है करना कठिन", जब समय अपनी फितरत नहीं बदलता तो इंसान अपनी आदत कैसे बदले??
 
समय की फितरत यही है वो कभी रुकता नहीं है,
समय की आदत यही है वो कभी झुकता नहीं है,
इंसान की जरुरत है रुकना-चलना और इंतज़ार करना,
समय की मंज़िल नहीं है और वो कभी थकता नहीं है..!
 
मुझे ऐसा लगता है कि न बदले समय अपनी आदत या फितरत तो न सही! कुछ आदतें इंसान को बदल लेनी चाहिए! आने वाले समय का इंतजार करते हुए उतावलापन न दिखाते हुए थोड़ा संयमित और संतुलित रहना चाहिए! बच्चों के भविष्य की परवाह करते हुए भी हम बच्चों को उनका बचपन जीने दें बल्कि हम खुद बच्चों के साथ उनका बचपन जियें क्योंकि समय तो अपनी गति से चलेगा ही ये तय है! बच्चा अपनी उम्र के अनुसार बढ़ेगा ही! हम अपनी अपेक्षाओं का अतिरिक्त बोझ लादकर न केवल उनका वर्तमान बोझिल बनाते हैं बल्कि अपना आज भी चिंता से भर लेते हैं. ये बिलकुल वैसा ही है जैसे परीक्षा की चिंता में पढ़ाई भी नहीं कर पाए और परीक्षा परिणाम की फ़िक्र में छुट्टियां भी एन्जॉय नहीं कर पाए! काश, आने वाले कल की फ़िक्र कुछ यूं करते कि बेहतर परिणाम के लिए जब समय मिला था तब अच्छी से अच्छी तैयारी करते और परीक्षा के बाद परिणाम आने तक छुट्टियों का मज़ा निश्चिन्त होकर उठाते!
 
अक़्सर अपने आसपास ये देखा है कि बचपन में समय बहुत होता है पर समय के सामन्जस्य और सदुपयोग की समझ नहीं होती, जवानी में समझ और क्षमता दोनों पर्याप्त होती है पर भविष्य की बड़ी-बड़ी योजनाओं के चलते लोग अपने जीवन का वो समय जब पैसा भी था शारीरिक क्षमता भी सिर्फ भविष्य के निर्माण लिए व्यतीत करते है, जिस मकान गाड़ी और पूंजी का संग्रह वृद्धावस्था के लिये किया जाता है जब वास्तव में उसके उपभोग के लिए समय मिलता है तब तक तनावयुक्त जीवन शैली के कारण शारीरिक क्षमता इतनी क्षीण हो जाती है कि घर से ज्यादा अस्पताल में रहना पड़ता है, घूमने से ज्यादा गाड़ी का उपयोग अस्पताल जाने के लिए होता है और नियोजित पूंजी का व्यय भी सिर्फ अस्पताल के लिए होता है!
 
ध्यान रहे मैंने सिर्फ एक उदाहरण दिया है...ऐसा सब के साथ हो यह जरुरी नहीं है पर समय रहते इन उदाहरणों से हम सचेत हो कर भविष्य में जब पैसा और समय होगा तब क्षमता न होने की वजह से दुखी होने की बजाय आज अपने दैनिक जीवन में जरा सा परिवर्तन और समय का सही नियोजन करके आज को बेहतर और कल को चिन्ता मुक्त रखने की कोशिश कर सकते हैं!
मैं अपनी सोच किसी पर थोपने की पक्षधर नहीं हूं यहां मैं सिर्फ अपनी सोच आप सबके सामने रख रही हूँ. समय का चक्र अपनी गति से चल रहा है या यूं कहें कि भाग रहा है. अक्सर इधर-उधर कहीं न कहीं, किसी न किसी से ये सुनने को मिलता है कि क्या करें समय ही नही मिलता,. वास्तव में हम निरंतर गतिमान समय के साथ कदम से कदम मिला कर चल ही नही पाते और पीछे रह जाते हैं. समय जैसी मूल्यवान संपदा का भंडार होते हुए भी हम हमेशा उसकी कमी का रोना रोते रहते हैं क्योंकि हम इस अमूल्य समय को बिना सोचे समझे खर्च कर देते हैं.
 
इसलिए आज मैंने ये तय किया है आज से मैं अपनी दैनिक दिनचर्या में बिना किसी विशेष परिवर्तन के हर घंटे दो मिनट की बचत करुंगी, ठीक वैसे ही जैसे अपनी क्षमतानुसार अपने आय-व्यय के बाद बचाती हूँ. भविष्य के लिए नाममात्र भविष्य निधि क्योंकि आय कम है और व्यय अधिक. इसलिए कभी-कभी इस जमा निधि का उपभोग या आहरण आकस्मिक कार्यों की व्यवस्था में कर लेती हूँ. इस तरह प्रतिदिन बचेंगे अड़तालीस मिनट जिसे मैं जमा करुंगी भविष्य निधि की तरह और बीच-बीच में जरुरत और परिस्थिति के अनुसार आहरित करुंगी ताकि जो काम समय न होने के कारण छूट जाते हैं वो समय दूंगी खुद को निखारने और संभालने में, वो समय व्यतीत करुंगी अपने अपनों के साथ. हो सकता है कल मेरे समय नियोजन की सफलता से प्रेरित होकर मेरे अपने भी मेरे लिए समय निकालें!
एक बात और साझा करना चाहूंगी सबसे! मुझे आज फिर ज़रुरत महसूस हो रही है..
 
आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों।
इतनी भी क्या जल्दी है,जीना है जब बरसों।।
 
इस मानसिकता को फिर से पुरानी सोच में बदलना होगा क्योंकि आदर्श अनुभव की कसौटियों पर कसे जाने के बाद ही स्थापित होते हैं. आज फिर से मन इस सोच पर चलना चाहता है कि
 
काल करे सो आज कर,आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।।
अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए आप सब से शुभकामनाओं की अपेक्षा है!

- प्रीति सुराना