प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -35

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

ज़िन्दा रहेगा प्रेम

क्रूर अमानवीय यातनाओं के बीच
जैसे कायम है चहचहाती-फुदकती चिड़ियों का वजूद
जैसे बीहड़ जंगल में कुलांचे भरते मृगछौनों के दल
मृत्यु के ख़तरों से वाकिफ़ होकर भी बेखबर।

पूरी ताज़गी के साथ जैसे ज़िन्दा हैं हरसिंगार के फूल
और बैलों के गले में बंधी घंटियों की मधुर आवाज़
कार्तिक मास में भिनसहरे 'कतकी' गाती
गंगा स्नान को जाती कुँआरी किशोरियों के समूह।

जैसे आदिम गुफाओं के भित्ति चित्रों में
चट्टानों की छीजती परतों पर
धूसर रंगों में उकेरी शिकार गाथाएं
जैसे गांवों की चौहद्दी में घुले विवाह के मंगलगीत
जैसे सदियों-सदियों से हर बूढ़ी आंखों में
साँसें लेता ज़िन्दा है शहर बनारस

ठीक वैसे ही जिंदा रहेगा प्रेम
हमारे-तुम्हारे बाद भी।


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अब जाने हम-तुम कहाँ मिलेंगे

तुम्हें याद है न
आम का वो बाग़
जहाँ तुमने मुझे पहली बार
बुलाया था मिलने के लिए
तुम्हें याद है न...!

वो मदमाता बसन्त था और
तुम उस पेड़ के नीचे बैठी
अपना दुपट्टा उंगलियों में उलझा रही थी
तुम्हारी देह से आम के बौर की महक आ रही थी।
हम दोनों बाग़ में उस आम के पेड़ के नीचे
घन्टों बैठे रहे चुपचाप
एक-दूसरे की गंध में खोए
महसूसते रहे एक-दूसरे को
उस आम के पेड़ के नीचे...।

जानती हो!
वो बाग़ उजड़ गया
उन्होंने काट डाले सारे पेड़
उस पेड़ को भी नहीं छोड़ा
जिस पर तुमने बांधा था
हमारे प्रेम के रंग में रंगा
एक रेशमी धागा...।

उन्होंने एक बार भी न सोचा
उसे बेरहमी से काट डाला
और वहाँ खड़ा कर दिया
काला-विषैला धुआं उगलता
एक विशालकाय कारखाना।

जब वो बाग़ रहा, न वो पेड़
तब..सोचो हम-तुम कहाँ मिलेंगे..?
अब..जाने हम-तुम कहाँ मिलेंगे..??

तुम्हें याद है न
गाँव के बाहर बहती-बलखाती
वो बरसाती नदी।
अक्सर साँझ ढले जिसके किनारे
मेरे आमंत्रण पर मुझसे मिलने तुम आती थीं।
जानती हो, वही नदी अब नहीं रही...!
उसकी अकाल मौत हो गई
उन्होंने घोंट डाला नदी का गला।
धीरे-धीरे पाट डालीं झीलें, मिटा दिए तालाब
और वहाँ खड़ी कर दीं ऊंची अट्टालिकाएं।

जब वो नदी रही ना उसका किनारा
तब..सोचो हम-तुम कहां मिलेंगे..?
अब..जाने हम-तुम कहां मिलेंगे..??

तुम्हें याद है न
वो सर्पीली पगडंडियां, वो लहलहाते खेत
सरसों के खिलखिलाते पीले फूलों पर टिकी ओस
जिन्हें अलसुबह एक-एक कर हमारी आँखें चुनती थीं
नील गगन को तकते-तकते जीवन के सतरंगी सपने बुनती थीं।
जानती हो, अब ऐसा कुछ भी नहीं रहा..!
उन्होंने ख़त्म कर दिए खेत
बेच डाली फूलों की मुस्कान, खेतों की हरियाली
और वहाँ तान दिए बे-जान मकान।

जब वो खेत रहे ना सरसों के फूल
तब..सोचो हम-तुम कहां मिलेंगे..?
अब..जाने हम-तुम कहां मिलेंगे..??

तुम्हें याद है न
वो गर्वीला-विशाल पहाड़
जो सूरज ढलने पर अक्सर
हमको पास बुलाता था
अपनी बूढ़ी आंखों से जो
हम पर नेह बरसाता था।
वही जिसने हमें बताया था,
अपनी उस कंदरा का पता
जहाँ हजारों-हजार साल पहले
उसने ही आदिम प्रेम को दी थी जगह।
वहीं जहाँ बहते उस झरने ने
हमें प्रेम का आदिम राग सुनाया था।
उस निविड़-शांत-एकांत जगह पर
प्रेम करना प्रकृति ने हमें सिखाया था।

जानती हो, अब वो सब कुछ नहीं रहा...!
उन्होंने बारूद लगाकर उजाड़ दिए पहाड़
ज़िन्दा पहाड़ को तोड़-तोड़कर
राजधानी में बनवा दीं निष्प्राण प्रतिमाएं।
जो भी सत्ता में आया,
अपने पुरखों की निशानी के लिए,
बेचारे पहाड़ को ही निशाना बनाया।

उन्होंने ख़त्म कर दिया सब कुछ
बाग़-बग़ीचे, नदियां-तालाब,
खेत-हरियाली, जंगल-पहाड़।
हमारे प्रेम से जुड़ी सारी स्मृतियाँ
तहस-नहस कर डालीं।
बंद-बेजान कमरों के सिवाय
कोई जगह नहीं छोड़ी प्रेम के लिए...।
तब..सोचो हम-तुम कहाँ मिलेंगे..?
अब..जाने हम-तुम कहाँ मिलेंगे..??


- अनुपम निशान्त
 
रचनाकार परिचय
अनुपम निशान्त

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