प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2015
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कलाम साहब की दो कविताएँ
(अबुल पाकिर जैनुल आबदीन अब्दुल कलाम यानि भारत के मिसाइल मैन कलाम साहब अब हमारे बीच नहीं हैं, विश्वास करना मुश्किल है। पिछले दिनों वे संसार को अलविदा कह गये। यह सार्वभौमिक सत्य है कि जो इस दुनिया में आया है, वो एक दिन जायेगा। लेकिन कलाम साहब इस तरह चले जायेंगे, किसी ने सोचा भी न था। हालाँकि उम्र के आंकड़ों से देखा जाये तो निश्चित ही 83 के पार थे, मगर उनके हाव-भाव, कार्य क्षमता व सक्रियता पर इन आंकड़ों का कोई असर नहीं पड़ा था। हमने जब भी कलाम साहब को देखा, एक नौजवान के रूप में देखा और जब कोई नौजवान हमारे बीच से अचानक चला जाता है, तो दुःख कई गुना बढ़ जाता है। कलाम साहब को दुनिया महान वैज्ञानिक के तौर पर जानती है। उन्होंने तकनीकी शिक्षा से सम्बंधित संस्थानों में अध्यापन भी किया। भारत के महामहिम पद को भी सुशोभित किया, तो देश और देश से बाहर करोड़ों युवाओं को सपने साकार करने की प्रेरणा भी देते रहे।
इन सब से परे हम यह भी जानते हैं कि वे एक बढ़िया लेखक व कवि भी थे। आज के अंक में हम उन्हें श्रद्धांजली स्वरूप उनकी ही दो कविताएँ अपने पाठकों के लिए लाये हैं। हम ख़ुदा से दुआ करते हैं कि जिस शख्स ने दुनिया में शांति और सुकून के लिए अपनी पूरी ज़िन्दगी समर्पित कर दी, उसे तू अपने पास ऊँचे दर्जे से रखना.....आमीन!!!)
 
 
 
मेरी माँ
 
समंदर की लहरें,
सुनहरी रेत,
श्रद्धानत तीर्थयात्री,
रामेश्वरम् द्वीप की वह
छोटी-पूरी दुनिया।
सब में तू निहित,
सब तुझमें समाहित।
 
तेरी बांहों में पला मैं,
मेरी क़ायनात रही तू।
जब छिड़ा विश्वयुद्ध, छोटा-सा मैं
जीवन बना था चुनौती,
ज़िन्दगी अमानत
मीलों चलते थे हम
पहुँचते किरणों से पहले।
 
तेरी उँगलियों ने
निथारा था दर्द मेरे बालों से
और भरी थी मुझमें
अपने विश्वास की शक्ति
निर्भय हो जाने की, जीतने की।
जिया मैं
मेरी माँ!
(साभार- अमर उजाला, राष्ट्रीय समाचार पत्र)
 
 
 
देश वन्दना
 
भव्य वह दृश्य था
स्वतंत्र भारत के जन्म का
मध्यरात्रि को
दो सदियों के शासक का ध्वज उतरा था
राष्ट्रगान के मध्य
तिरंगा लाल किले पर फहराया
स्वतंत्र भारत के
प्रथम स्वप्न का उदय हुआ था।
 
चारों तरफ फैला हुआ
जब हर्ष और आनंद था।
करूण पुकार थी एक, 
कहां हैं राष्ट्रपिता?
श्वेत वस्त्रधारी पुण्यात्मा,
दुःख दर्द में डूबी हुई थी जहां घृणा
और अहम् से उपजा
जातिगत संघर्ष था।
राष्ट्रपिता, महात्मा
नंगे पांव चले
शान्ति और सद्भाव के लिए
गलियों में बंगाल की
उस धन्य आत्मा की
शक्ति से प्रेरित हो
मैं करूं प्रार्थना,
कब होगी उत्पत्ति दूसरे स्वप्न की?
जन-जन का मन
चिंतनमय हो
उनके विचार फिर हो पाएँ साकार
जन और उनके प्रतिनिधियों में बोध जगे
राष्ट्र व्यक्ति से ऊपर है हर बार।
देश के नेतृत्व को दो शक्ति
राष्ट्र को शान्ति और समृद्धि का वर दो
कोटि-कोटि जन में 'मन की एकता' लाएँ
यह सामर्थ्य हमारे धर्म गुरूओं को दो।
 
हे सर्वशक्तिमान!
हम करें परिश्रम, विकासशील से
विकसित हो जाएँ,
देशवासियों को यह वर दो
जन्म लें दूसरा स्वप्न हमारे पसीने से
हमारे नव युवाओं को विकसित भारत दो।
(साभार- अनुभूति, हिंदी वेब पत्रिका)

- डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम
 
रचनाकार परिचय
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