प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यात्रा वृत्तांत / पर्यटन-स्थल

 

नागालैंड के पर्यटन स्थल
 

विभिन्न विद्वानों, समाजशास्त्रियों एवं नृविज्ञानियों ने "नागा" शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में भिन्न- भिन्न मत व्यक्त किए हैं I कुछ विद्वानों का मत है कि "नोक"(NOK) शब्द से "नागा" शब्द की उत्पत्ति हुई है जिसका अर्थ "लोग" है I  कुछ विद्वानों का मानना है कि नागा शब्द कछारी भाषा के शब्द "नांगरा " से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ "योद्धा" है I कुछ विद्वान मानते हैं कि संस्कृत में "नाग" का अर्थ "पर्वत" होता है और नागा का अर्थ पर्वत पर निवास करनेवाले मानव है I कुछ लोगों की मान्यता है कि नागा शब्द बर्मा भाषा के "नाका" से आया है जिसका अर्थ होता है "कान की बाली I नागालैंड के लोग कानों में बाली धारण करते हैं I  इसलिए इन्हें नागा कहा गया I  नागालैंड राज्य असम की ब्रह्मपुत्र घाटी और बर्मा के बीच पर्वतीय क्षेत्र की संकरी पट्टी में स्थित है I इसके पूर्व में म्यांमार की अंतराष्ट्रीय सीमा, दक्षिण में मणिपुर, उत्तर और पश्चिम में असम एवं उत्तर- पूर्व में अरुणाचल प्रदेश स्थित है I इसे जनवरी 1961 में राज्य का दर्जा दिया गया I 01 दिसंबर 1963 को नागालैंड राज्य का विधिवत उद्घाटन हुआ I Top of Formनगालैंड पूर्वोत्तर का एक प्रमुख राज्य है I यहाँ की लगभग सम्पूर्ण आबादी जनजातीय है I नागालैंड का क्षेत्रफल 16,579 वर्गकिलोमीटर है तथा कुल जनसंख्या 1,980,602 है जिनमे पुरुष 1,025,707 और महिला 954,895 है I राज्य में जनसंख्या का घनत्व 120 प्रति वर्गकिलोमीटर  तथा लिंगानुपात ( प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या ) 931  है I साक्षरता  दर 80.11 प्रतिशत है I राज्य के प्रमुख शहर कोहिमा, दीमापुर, वोखा, किफिरे, मोकोकचंग एवं प्रमुख भाषाएँ चाकेसांग, अंगामी, जेलियांग, आओ, संगतम , चिमंगचुर,चांग, सेमा, खेमुन, रेंगमा, कोन्यक, नागामीज, हिंदी इत्यादि है I प्रदेश की राजधानी कोहिमा है I राज्य में बहनेवाली नदियाँ हैं – धनश्री, दोयांग, दिखू, झांजी आदि I यहाँ का समाज अनेक आदिवासी समूहों एवं उपजातियों में विभक्त है। नागालैंड की प्रमुख जनजातियाँ हैं- चाकेसांग, अंगामी, जेलियांग, आओ, संगतम, चिमंगचुर, चाड., सेमा, लोथा, खेमुन, रेंगमा, कोन्यक इत्यादि । प्रत्येक समुदाय वेश-भूषा, भाषा-बोली, रीति-रिवाज और अपनी जीवन शैली की दृष्टि से पृथक है लेकिन इतनी भिन्नता के बावजूद नागा समाज में परस्पर भाईचारे और एकता की सुदृढ़ भावना है तथा वे एक-दूसरे की जीवन-शैली का सम्मान करते हैं। नागालैंड में एक गांव की भाषा पड़ोसी गांव के लिए अबूझ है। इसलिए नागालैंड के निवासियों ने एक संपर्क भाषा विकसित कर ली है जिसका नाम है नागामीज। यह असमिया, नागा, बांग्ला, हिंदी और नेपाली का मिश्रण है। नागामीज की न कोई लिपि है, न ही सुनिश्चित व्याकरणिक नियम। नागालैंड में केवल एक हवाई अड्डा है जो कोहिमा से 74 किमी दूर दीमापुर में स्थित है। यह कोलकाता व गुवाहाटी से जुड़ा है। निकटतम रेलवे स्टेशन दीमापुर है। कोहिमा के लिए दीमापुर, इंफाल, गुवाहाटी व शिलांग से बसें आती-जाती हैं। ठहरने के लिए यहां कई तरह के होटल व लॉज हैं। विदेशी पर्यटकों को यहां प्रवेश हेतु प्रतिबंधित क्षेत्र परमिट और भारतीयों को इनरलाइन परमिट लेना जरूरी है।

 

कोहिमा कोहिमा नागालैंड की राजधानी है जो दीमापुर से लगभग 75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है I यह समुद्र तल से 1500 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है I यह शहर नागालैंड के इतिहास और संस्कृति का साक्षी है I कोहिमा नागालैंड का सबसे आकर्षक पर्यटन स्थल है। वाणिज्यिक केंद्र होने के बावजूद कोहिमा ने अपना प्राकृतिक आकर्षण बरक़रार रखा है और राज्य के सबसे अधिक करिश्माई स्थलों में से एक है। प्राचीनता और आधुनिकता के मिश्रण से यह शहर एक दिलचस्प प्रभाव छोड़ता है I शहर में अनेक दर्शनीय स्थल हैं I  यह शहर द्वितीय विश्व युद्ध का स्मरण कराता है I कोहिमा में अधिकतर अंगामी जनजाति के लोग रहते हैं I अतः यहाँ अंगामी समुदाय की जीवन शैली का अवलोकन किया जा सकता है I यदि आपको प्राचीनता और नवीनता को एक स्थान पर दर्शन करने हों तो कोहिमा अवश्य जाएँ I नागालैंड राज्य में तीन नगर परिषद- कोहिमा, दीमापुर और मोकोकचुंग हैं I कोहिमा नाम आधिकारिक रूप में अंग्रेजों द्वारा दिया गया था क्योंकि वे अंगामी नाम ‘केवहीमा’ अथवा ‘केवहीरा’ का उच्चारण नहीं कर सकते थे । अंगामी भाषा में ‘केवहीमा अथवा केवहीरा’ का अर्थ है - केवही पुष्प की भूमि I पहले कोहिमा को थिगोमा के नाम से भी जाना जाता था I कोहिमा शहर का इतिहास गौरवपूर्ण है I 1840 के दशक के आरम्भ में स्वतंत्रता प्रेमी नागाओं ने ब्रिटिश घुसपैठ का कठोरपूर्वक प्रतिरोध किया था I

 

राज्य संग्रहालय- यद्यपि नागा समुदाय का कोई भी लिखित दस्तावेज या इतिहास उपलब्ध नहीं है लेकिन राज्य की राजधानी कोहिमा में नागालैंड संग्रहालय को देखने के बाद नागा लोगों की विरासत के बारे में एक समझ विकसित होती है । शहर से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर बायवू हिल पर स्थित इस संग्रहालय में प्रत्येक नागा जनजाति की कलाकृतियों का एक दुर्लभ संग्रह मौजूद है। राज्य संग्रहालय में प्रामाणिक कीमती नागा पत्थरों को भी प्रदर्शित किया गया है। यहां नागा द्वारा उपयोग किए जाने वाले सबसे मूल्यवान हार देख सकते हैं। यहाँ नागा मोरंग / झोपड़ी मॉडल को भी प्रदर्शित किया गया है। इस मॉडल को देखने से ज्ञात होता है कि नागा गांव पहाड़ी पर किस प्रकार बसे होते हैं । मोरंग नागा समुदाय का सार्वजानिक शयनागार या युवागृह हैं I विभिन्न जनजातियों के बीच वास्तुकला में भिन्नता के नमूनों को देखा जा सकता है I यहाँ नागा जनजातियों के वाद्ययंत्र भी प्रदर्शित किए गए हैं। विभिन्न वाद्ययंत्रों को देखने से मालूम होता है कि संगीत नागा जीवन का अभिन्न होता है । लॉग ड्रम, ताती और अन्य वाद्ययंत्र बांस और भैंस सींग से बने होते हैं जिनका त्यौहारों और अन्य सामाजिक समारोहों के दौरान उपयोग किया जाता है। कला प्रेमियों के लिए राज्य संग्रहालय में एक आर्ट गैलरी है जहाँ विभिन्न स्थानीय कलाकारों द्वारा संग्रहित चित्र मौजूद हैं। इनका थीम पारंपरिक से लेकर आधुनिक तक हैं।

 

मोकोकचुंग - मोकोकचुंग नागालैंड की सांस्कृतिक और बौद्धिक राजधानी है I यहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य और पारंपरिक नृत्य पर्यटकों का मन मोह लेता है I यहाँ मुख्य रूप से आओ जनजाति के लोग रहते हैं I धीरे धीरे मोकोकचुंग नागालैंड के एक प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित होता जा रहा है I मोकोकचुंग को नागालैंड का सबसे सुंदर और जीवंत जिला माना जाता है I  यह अपने आतिथ्य, समृद्ध परंपराओं और त्योहारों के लिए जाना जाता है I उंगमा गाँव नागालैंड में सबसे पुराना आदिवासी गांव है I यहाँ पुराने लॉग ड्रम अभी भी मौजूद है जिसके द्वारा प्राचीन समय में गाँव के लोगों को संदेश दिया जाता था I मोकोकचुंग के अन्य लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण हैं - मोपुंगचुके गाँव, मोकोकचुंग का मदर चर्च, जिला पार्क आदि।

 

लोंगखुमयह स्थान प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग है । ऐसा लगता है मानो छोटी पहाड़ियां  इस स्थान का श्रृंगार कर रही हों I नागा कहावत के अनुसार लोंगखुम की एक बार यात्रा करना पर्याप्त नहीं है। ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि जब पहली बार कोई यहां आता है तो उनकी आत्मा यहां रह जाती है। इसलिए अपनी आत्मा वापस लाने के लिए दोबारा लोंगखुम आना पड़ता है । यह बहुत खूबसूरत स्थल है और पर्यटक यहां आकर इसके जादुई प्रभाव में खो जाते हैं । यहां पर हथकरघा और हस्तशिल्प की शानदार कलाकृतियां भी देखी जा सकती हैं । ये कलाकृतियां पर्यटकों को बहुत पसंद आती हैं और वह इन्हें स्मृति चिह्न के रूप में खरीदकर ले जाते हैं। लोंगखुम गांव के कुछ निवासी लीमापुर धर्म में विश्वास रखते हैं और लोंगलंपा त्सुंग्रेम भगवान की पूजा करते हैं।

 

दीमापुर- धनसिरी नदी के किनारे स्थित दीमापुर को यूरोपीय विद्वान और अहम शासक 'ईंट सिटी' के रूप उल्लेख किया है I दीमापुर दिमासा कछारी समुदाय की प्राचीन राजधानी और यह एक स्वतंत्र राष्ट्र था जो एक समय सम्पूर्ण उत्तर-पूर्व भारत में एक शक्तिशाली और प्रबल राष्ट्र था । दीमापुर नाम की उत्पत्ति के बारे में दो तरह के मत हैं I कुछ विद्वानों का मानना है कि 'दीमापुर' नाम दिमासा कछारी से लिया गया है जिसका अर्थ है महान नदी के निकट का शहर I 'दि' का अर्थ है पानी, 'मा' का अर्थ है बड़ा और 'पुर' का अर्थ है शहर या बस्ती I कुछ विद्वानों की मान्यता है कि दीमापुर हिडिंबापुर का भ्रष्ट या विकृत रूप है I हिडिम्बा का जन्मस्थान दीमापुर माना जाता है I भीम ने हिडिम्बा से विवाह किया था I घटोत्कच हिडिम्बा और भीम का पुत्र था जिसने महाभारत युद्ध में अपने पराक्रम का प्रदर्शन कर भगवान श्रीकृष्ण को भी आश्चर्यचकित कर दिया था I दीमापुर को नागालैंड का प्रवेश द्वार माना जाता है I नागा भाषा में दीमापुर का अर्थ है 'एक महान नदी के पास का शहर।' इसकी एक ओर धनसिरी नदी और दूसरी ओर घने जंगल हैं I दीमापुर कछारी जनजाति की पूर्व राजधानी था । यहां कई मंदिर और स्मारक हैं। यह शहर पूर्वोत्तर का प्रमुख व्यावसायिक केंद्र है। दीमापुर में जूलॉजिकल पार्क, आओ बैपटिस्ट चर्च, डीजेफे क्राफ्ट ग्राम, नागालैंड साइंस सेंटर, ग्रीन पार्क जैसे कई आकर्षण हैं I नागालैंड का एकमात्र हवाई अड्डा और रेलवे स्टेशन दीमापुर में है। यह शहर सभी अर्थों में आधुनिक होने के बावजूद यहाँ भारत के अतीत में झाँकने के लिए अनेक खंडहर मौजूद हैं जो दिमासा कछारी साम्राज्य के अवशेष हैं I ऐसा कहा जाता है कि दीमापुर मध्यकाल में दिमासा कछारी साम्राज्य की राजधानी था । दीमापुर के इतिहास से जुडा एक और अनोखा तथ्य यह है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहाँ ब्रिटिश भारत और इंपीरियल जापान में युद्ध हुआ था । इस शहर में आधुनिकता और परम्परा का संगम देखने को मिलता है I इतिहास में रूचि रखनेवाले पर्यटक यहाँ पर 10 वीं शताब्दी के कछारी वंश के ध्वंसावशेष का अवलोकन कर सकते हैं I निचुगार्ड ग्राम, कुकी दालोंग ग्राम, चुमुकेदीमा, सेटेकीमा ग्राम और मेडीजीफेमा जैसे स्थान प्रकृति के वरदान हैं और प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो गए हैं I शहर में स्थित रंगापहाड़ रिजर्व वन दीमापुर का मुख्य आकर्षण है I यहां औषधीय पौधों और दुर्लभ जानवरों की अनेक प्रजातियाँ हैं । नागालैंड के विभिन्न आदिवासी समूहों जैसे, अंगामी, लोथा, चाकेसांग, सुमी, संगतम, आओ, जेलियांग आदि की संस्कृति की झलक दिफुपहार में देखने को मिलती है I दीमापुर रेल, सड़क और वायु मार्ग से जुडा हुआ है I

 

मोनइस स्थल को कोन्याक नागा की भूमि के रूप में जाना जाता है I नागालैंड में मोन एक दिलचस्प जगह  है।  कोन्याक समुदाय के लोग स्वयं को नूह के वंशज बताते हैं I मोन जिले के सबसे बड़े गांव लोंगवा म्यांमार की सीमा पर स्थित है I लोंगवा का चीफ अपनी 60 पत्नियों के साथ अपने घर में रहता है जो लोंगवा में एक प्रमुख आकर्षण है। अगर आप अप्रैल के महीने में मोन की यात्रा करते हैं तो आपके पास कोन्यक नागा के जीवंत कृषि त्योहार को देखने का एक अच्छा मौका है जिसे आओलंग मोन्यू त्योहार कहा जाता है। यह एक सप्ताह तक धूमधाम के साथ मनाया जानेवाला त्योहार है I इस त्योहार में पशु- पक्षियों की बलि दी जाती है I

 

वोखा –नागालैंड को प्रकृति का अनुपम उपहार है वोखा I पहाड़, नदी और रंग -बिरंगे पेड़-पौधों व पुष्पों से सुसज्जित वोखा प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग है। कोहिमा से लगभग 4 घंटे की दूरी पर  स्थित यह स्थान प्रकृति को उसके अनछुए रूप में देखने के लिए एकदम सही जगह है। वोखा जिले में स्थित रिफीम नामक गाँव पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण है I यहाँ से डोन्यान नदी पर बने बांध का अद्भुत दृश्य दिखाई देता है। वोखा लोथा जनजाति की भूमि है और यहां पर इस समुदाय की पारंपरिक कला और शिल्प को देखकर गौरव की अनुभूति होती है। नौ दिनों तक चलनेवाला लोथा समुदाय का मुख्य कृषि त्योहार टोखु इमोंग नवंबर महीने में आयोजित किया जाता है I यह समय वोखा भ्रमण के लिए सबसे उत्तम है।

 

किफिरे -नागालैंड में किफिरे जिला को एक विस्मयकारी जिले की संज्ञा दी गई है। पर्यटकों के लिए यह एक रोमांचकारी स्थल है I साहसी और उत्साही लोगों के लिए भी यह एक आदर्श स्थान है I रोमांच प्रेमी पर्यटक यहाँ ट्रेकिंग और राफ्टिंग जैसी गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं। किफिरे में नागालैंड की सबसे ऊंची चोटी सारामती (3841 मी) स्थित है जहां एक ट्रैकर तीन दिन की यात्रा का आनंद ले सकता है I यहाँ को पुंगरो, सालमी और मिमी जैसे प्राकृतिक गांव हैं जो विशेष आकर्षण के केंद्र हैं I ऐसा विश्वास है कि इनमें से मिमी और सलुमी कौमार्य भूमि है। इन गांवों में कई गुफाएं और झरने हैं जो बहुत खूबसूरत हैं और किफिरे के सौन्दर्य एवं आकर्षण में चार चाँद लगा देते हैं। मिमी गांव की गुफाएं, मिमी और खोंगा गांव के बीच में स्थित जलप्रपात, साल्ट नदी मिहिकी, किस्तोंग गाँव और फकीम वन्यजीव अभयारण्य किफिरे के दर्शनीय स्थल हैं I

 

खोनोमा ग्रीन विलेज- खोनोमा ग्रीन विलेज को देखकर नागा जनजाति के पर्यावरण प्रेम और दायित्व - बोध का परिचय मिलता है। कोहिमा से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित खोनोमा ग्रीन विलेज भारत में अपनी तरह का एक अनूठा गाँव है। यह गांव अंगामी जनजाति का निवास क्षेत्र है जिन्होंने शिकार करना छोड़ दिया है और अपने जीवन निर्वाह के लिए केवल कृषि (झूम खेती) का कार्य करते हैं I खोनोमा में गृह निर्माण के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया जाता है जो अंगामी समुदाय का प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति जागरूकता प्रदर्शित करने का एक तरीका है। इस हरित गाँव में कृषि के साथ- साथ टोकरी बनाने एवं बुनाई के कार्य भी किए जाते हैं । खोनोमा निस्संदेह हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है जो हमें प्रकृति के एक कदम निकट ले जाता है और अपने प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण के लिए पहल करने को उत्साहित करता है। इस स्थल पर प्रवाहित होनेवाली ऊर्जा को सभी लोग महसूस करते हैं।

 

जुकु वैली नागालैंड की राजधानी कोहिमा से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित जुकु वैली (2438 मीटर) का सौन्दर्य मंत्रमुग्ध कर देता है। यह भव्य घाटी ट्रैकर्स के लिए आकर्षण का केंद्र है और इसे देश में सर्वश्रेष्ठ ट्रेकिंग सर्किट माना जाता है। नागालैंड की जुकु वैली के सम्मुख उत्तराखंड की फूलों की घाटी कुछ भी नहीं है I यह घाटी नागालैंड के प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सकता है परन्तु अभी तक इसका अपेक्षित प्रचार- प्रसार नहीं हो सका है I यहाँ पुष्पों की अनेक प्रजाति उपलब्ध है I यहाँ जाने का सबसे अच्छा समय वसंत ऋतु है जब पूरी घाटी फूलों की सुगंध से महक उठती है I

 

पेरेन- जेलियांग्रोंग और कूकी जनजातियों की भूमि पेरेन नागालैंड के एक प्रमुख पर्यटन गंतव्य के रूप में विकसित हो गया है I अपनी बेजोड़ प्राकृतिक सुंदरता के अलावा पेरेन नागालैंड का एक समृद्ध सांस्कृतिक केंद्र है। बेरू और माउंट पौना गांव पेरेन के प्रमुख आकर्षण केंद्र हैं I प्रकृतिप्रेमियों के लिए माउंट पौना घाटी के भव्य सौन्दर्य का अवलोकन स्वर्गिक सुख प्रदान करता है I यह स्थल घने वनों से आच्छादित है । यहाँ जेलियांग्रोंग और कुकी जनजातियों की समृद्ध परंपरा और संस्कृति के दर्शन होते हैं। आवास के रूप में मेहमानों को प्रकृति के करीब लाने के उद्देश्य से पेड़ के नीचे पारंपरिक शैली में झोपड़ियों का निर्माण किया गया है। नटांग्की राष्ट्रीय उद्यान, माउंट किसा और पुइल्वा गांव की गुफाएं पेरेन के अन्य दर्शनीय स्थल हैं। पेरेन का निकटतम रेलवे स्टेशन दीमापुर है जो पेरेन से 77 किलोमीटर दूर है I

 

त्वेनसांग - त्वेनसांग नागालैंड का पूर्वी जिला है I यह चांग नागाओं का निवास क्षेत्र है। यहाँ चांग समुदाय के लोगों का बाहुल्य है लेकिन अन्य अनेक जनजातियाँ  भी यहाँ रहती हैं I यह क्षेत्र  नागालैंड की अनेक संस्कृतियों और परंपराओं का संगम स्थल है। टूनसंग अपने हथकरघा, हस्तशिल्प, कलाकृति और आभूषण निर्माण के लिए मशहूर है। चांगसांगमोको, चिलीज़, चुन्ग्लीमिति और त्सदांग गांव का परिभ्रमण करते समय अनेक रोचक किंवदंतियां  सुनने को मिलती हैं I ये गांव त्वेनसांग के सबसे दिलचस्प स्थानों में शामिल हैं। त्वेनसांग का निकटतम रेलवे स्टेशन असम का मरिआनी या आमगुरी है I वहां से सड़क मार्ग से त्वेनसांग की यात्रा की जा सकती है I दीमापुर स्टेशन से भी सड़क मार्ग से त्वेनसांग तक की यात्रा की जा सकती है I

 

लोंगलेंग- लोंगलेंग 32 किमी साहसिक सड़क यात्रा के लिए जाना जाता है जो रोमांचप्रेमी पर्यटकों  को बहुत पसंद है। लोंगलांग फोम नागाओं की निवास भूमि है I यहाँ के निवासी बर्तन बनाने, बांस के काम और कताई- बुने में अत्यंत कुशल माने जाते हैं I लोंगलेंग का बाजार यहाँ का प्रमुख आकर्षण है जिसने आज तक अपनी पुरातन परंपरा को संरक्षित रखा है। फोम समुदाय अपने त्योहारों और कलाकृतियों के माध्यम से अपनी परंपराओं और संस्कृतियों को संरक्षित करने का प्रयास करता है I यहाँ मनाया जाने वाला मुख्य त्योहार मोन्यू है जो शीत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत का प्रतीक है। यह छह दिनों तक आयोजित किया जानेवाला त्योहार है जिसमे लोंगलेंग संस्कृति का सर्वोत्तम प्रदर्शन होता है। इस उत्सव के अवसर पर लोंगलेंग का भ्रमण अधिक उपयोगी होता है I दिखू नदी इस क्षेत्र का प्रमुख आकर्षण है जिसके रेतीले तट पिकनिक के लिए मशहूर हैं।

 

फेक - फेक में पर्यटक आकर्षण के अनेक केंद्र हैं I हरित पहाड़ियों के बीच में स्थित मेलुरी नागालैंड के फेक जिले का हिस्सा है। यह छोटा - सा  गांव किफिरे जिले के माउंट सरामती की ओर जानेवाले मार्ग में स्थित है।

 

मेलुरी - मेलुरी में दिलचस्प रॉक संरचनाएं पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण है। इस छोटे गाँव में दो झील हैं- जुडु और शिल्लोई I ऐसा विश्वास है कि इन  झीलों में अलौकिक शक्तियां निवास करती हैं I इन झीलों में से एक शिल्लोई झील लोकप्रिय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो गया है I जुडु झील के आसपास स्थित ज़ैनीबू पीक से नागालैंड के बड़े हिस्से का दृश्य और माउंट एवरेस्ट को देखा जा सकता है। मेलुरी का निकटतम हवाई अड्डा दीमापुर (98 किमी) है। मेलुरी के निकट तीन रेलवे स्टेशन हैं - दिमापुर (104 किमी), रंगापहाड़ सीआरएस (104 किमी) और डिब्रूगढ़ टाउन (225 किमी) है । इन स्टेशनों से टैक्सी द्वारा मेलुरी तक की यात्रा की जा सकती है I

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


- वीरेन्द्र परमार
 
रचनाकार परिचय
वीरेन्द्र परमार

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