हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

कश्मीर के निर्गुण संत कवि शेख नुरुद्दीन नूरानी का एकात्म मानव दर्शन- अम्तुल राबिया

भारत देश के जम्मू- कश्मीर राज्य में ‘कश्मीर’ संसार के एक प्रमुख पर्यटन क्षेत्र के रूप में जाना जाता है | जम्मू-कश्मीर के पर्यटन स्थल केवल गर्मियों में ही नहीं बल्कि सर्दियों में भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं | चारों ओर बिछी बर्फ की सफ़ेद चादर, देवदार तथा चीड के पेड़ों से गिरते बर्फ के टुकड़े सच में यहाँ आने वालों को नई दुनिया का आभास कराते हैं | कश्मीर अपनी सुंदरता और प्राकृतिक दृश्यों के कारण पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है | यही कारण है कि इस धरती को स्वर्ग माना जाता है| इस धरती की सुंदरता को लेकर अमीर खुसरो ने यूँ कहा है कि-
“अगर फिरदौस बररुए ज़मीन अस्त
हमीं अस्तो हमीं अस्तो हमीं अस्त”1
 अर्थात धरती पर यदि कहीं स्वर्ग है तो वह यहीं कश्मीर में है |


पर्यटन स्थलों के अतिरिक्त जम्मू-कश्मीर का एक और रूप भी है जो ज्ञान, दर्शन, योग, शैवमत और कश्मीरियत को समर्पित रहा है | हमारी कश्मीर घाटी को पिर वअरि, रेश वअरी आदि जैसे नामों से भी जाना जाता है | एक तरह से कहा जाए तो कश्मीर आध्यात्मिकता और दार्शनिकता का गढ़ रहा है, जहाँ कई महान सूफी संत रहते हैं और उनके धार्मिक स्थल भी हैं | इन तीर्थ स्थलों पर हिन्दू, मुसलमान आदि सभी धर्मों के लोगों की आस्था है और हजारों लाखों की संख्या में लोग यहाँ दूर-दराज़ क्षेत्रों से दर्शन करने आते हैं | इन धार्मिक स्थलों का धार्मिक महत्व के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्त्व भी है | कुछ धार्मिक स्थल विश्व प्रसिद्ध हैं जैसे बाबा जैनुद्दीन वली (र.अ)अश्मुकाम, बाबा हैदर ऋषि (र.अ)अनंतनाग, बाबा दावूद घोनी (र.अ) विलो, हज़रत नूर शाह बगदादी (र.अ) कुण्ड, हज़रत शेख सयिद सिमनानी (र.अ) कुलगाम, बाबा नसीबुद्दीन घाज़ी (र.अ) बिजबिहारा, हज़रत बाबा ऋषि साहब (र.अ) गुलमर्ग, हज़रत पीर-ए-दस्तगीर शेख सैयद अब्दुल कादिर जिलानी (र.अ) खानयार श्रीनगर आदि | इसी श्रेणी में कश्मीर के महान ऋषि, अलमदार-कश्मीर शेख नुरुद्दीन नुरानी (र.अ) (चरार-ए-शरीफ) का नाम कश्मीर के अध्यात्म एवं साहित्य में शीर्षस्थ स्थान पर आता है | उन्हें नुन्दरेशी, अलमदारे कश्मीर जैसे नामों से भी जाना जाता है | उनकी जन्म तिथि विवादास्पद है | कुछ लोग उनका जन्म “1375 ई.पूर्व”2 में मानते हैं | आपकी माँ का नाम सदर मोज और पिता का नाम सलारुद्दीन था | जब आपका जन्म हुआ तो कई दिनों तक आपने अपनी माँ का दूध नहीं पिया | लोक कथा है की जब लल आरफा (लल देद) ने यह सुना तो उन्होंने आकर आपके कान में कहा कि जब आप इस दुनिया में आने से नहीं शरमाए तो दूध पीने से क्यों शरमाते हो | कहा जाता है की ज्यों ही लल देद ने नुन्दरेशी से यह कहा तो उन्होंने दूध पीना शुरू किया था | आपके जन्म पर आपके सभी रिश्तेदार बहुत खुश हुए | उन्होंने प्यार से आपका नाम ‘नुन्द’ रखा | ‘नुन्द’ का अर्थ होता है सुंदर | नुन्दरेशी के माता-पिता ज़िला कुलगाम के एक गाँव कायमू में रहते थे | नुन्दरेशी का जन्म भी वही पर हुआ था | कश्मीर में ऋषि-संप्रदाय का अविर्भाव 14वीं शताब्दी से माना जाता है | इस संप्रदाय पर इस्लाम धर्म का विशेष प्रभाव है| नुन्दरेशी कश्मीरी ऋषि-संप्रदाय के प्रवर्तक संत कवि हुए हैं | ऋषि-संप्रदाय का कश्मीर के धार्मिक-संरचना के विकास-क्रम में महत्वपूर्ण स्थान रहा है | “‘ऋषि’ मूलतः संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है मंत्रद्रष्ट, वेदमंत्रों का साक्षात्कार और प्रकाशन करने वाला, बहुत बड़ा तपस्वी, मुनि आदि |”3 इस संप्रदाय के अनुयायी प्रायः विवस्त्र रहते हैं, घर-गृहस्थी से मुख मोड़ लेते हैं, एकांत प्रिय होते हैं तथा अत्यधिक भावुक होने के कारण कविताएँ भी लिखते हैं |


नुन्दरेशी एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक और नैतिक कवि के रूप में पग-पग पर लोगों का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं | उनका मानना है कि हमें दुनिया के मोह-मोक्ष, लोभ आदि में नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि इससे मनुष्य ईश्वर से दूर हो जाता है | उनका कहना है कि-
“नफसी काढुस अटी अटी
नफसी करुस पशेमान
नफस छु मदहोस हान्कल चटे
नफस यमि रोट सु वोत लामकान |”4
अर्थात अपनी वासनाओं (स्व) ने मुझे किसी काम का नहीं रखा | यह एक हाथी की तरह होता है | जिसे किसी ने भी अपने अंतर्मन को वश में कर लिया वही सफलता की चोटी तक पुहुँच सकता है |

 

नुन्दरेशी सदैव सामाजिक विषमताओं और विकृतियों यथा-जाति-पाति, भेद-भाव, ऊँच-नीच, छुआछुत, दिखावा, पाखंड आदि का विरोध करते रहे हैं | उन्होंने मनुष्य को सदैव अच्छे लोगों के साहचर्य में रहने की सलाह दी है-
नुन्दन साती खवे करिज़े
रति बंद रोए किब्लस कुन
रतेन साती दोह्दन बरज़े
ज़न दितुथ शाह वुल्गे कंज़ |”5
अर्थात अच्छे लोगों के साहचर्य में रहो और उनसे प्यार रखो | यह वही लोग हैं जो हर समय ईश्वर की आज्ञा का पालन करते रहते हैं | अच्छे लोगों का साथ दिल को रोशन और बुरों का साथ दिल को अंधकारमय कर देता है |
    नुन्दरेशी ने विशेष रूप में समसामयिक सामाजिक समस्याओं को अपने काव्य का आधार बनाया है | उन्होंने तत्कालीन समाज में प्रचलित विभिन्न मतों के अलगाव का विरोध करते हुए मानवीय एकता के भाव का प्रचार किया | वह सदा ही जीवन के प्रत्येक स्तर पर मानवहित, शांति तथा भाईचारे की कामना करते थे | उन्होंने स्पष्ट रूप में सभी को एक ही माता-पिता की संतान मानते हुए धार्मिक द्वेष का विरोध किया है | उदहारण-
“अकिस मालिस माजि हन्दुयन
तिमन दपत्रविथ त क्याहा |
मुसलमान क्यो हान्दयन
कर बन्दन तोशि खोदाय |”6
अर्थात एक ही माता-पिता की संतानें होते हुए भी एक-दुसरे से अंजान क्यों हैं? हिंदु और मुसलमान एक ही आदिम की संतानें हैं तो यह द्वेष क्यों है |


नुन्दरेशी केवल इस्लाम के उपदेशक ही नहीं थे अपितु वे एक कवि, दार्शनिक और वैज्ञानिक भी थे | उन्हें सभी धर्म के लोग आदर्शवादी मानते हैं | आपने सभी धर्मों के लोगों को मिल-जुलकर रहने की सलाह दी है | उदहारण-
“ सअरी समितव तह अकिस्स्य रज्ज़ी लमितव
अध्ह मालि राविहा कहन गाव |”7
अर्थात यदि हम सब एक हो जाते तो किसी की क्या मजाल थी कि वह हमें अलग करता |
 नुन्दरेशी की कविताओं में एकता की भावना सर्वोपरि है | ऊँच-नीच, भेद-भाव आदि की उन्होंने कड़ी निंदा की है | हिंदु-मुस्लिम एकता के विषय में उनका कहना है की-
“बड़ीथ क्रय करिथ नह हकान्य
पत्ताह नुन्द क्या धाम ध्यान्य
सुल्ली कौन: करुथ ज्ञाननह
असल हियौंध मुसल्मानाह |”8
अर्थात बूढ़े होके क्या कर पाओगे फिर नुन्द | इसलिए इससे पहले तुम बूढ़े हो जाओ और कोई काम योग्य न हो, हिंदू-मुस्लिम एक हैं, इस बात का ध्यान रखो |

 

नुन्दरेशी  ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच परस्पर प्रेम व साम्य का संबंध स्थापित करने का ही प्रयास किया है | हिंदु-मुस्लमान के भेद को मिटाने तथा दोनों को समीप लाने का प्रयास करते हुए वे कहते हैं -   
“अकुय खोदा नाव लछा,
ज़िक्री रोस कांह कछा मो”9
अर्थात खुदा एक है परंतु उसके नाम लाखों हैं तथा स्मरण के बिना उसकी प्राप्ति असंभव है |
    नुन्दरेशी ने अपनी वाणी में जन मानस को सावधान करते हुए यह संदेश दिया कि हमें धर्म बेचने वाले दिखावटी मुल्लाओं, साधुओं, ऋषियों  के पाखंडों से बचना चाहिए | उन्होंने सीधे-सपाट रूप से भी और व्यंग्य द्वारा भी मुल्लाओं, साधुओं आदि के आडम्बरों का विरोध करते हुए कहा है कि-
“नसर बाबा रेश हा रेशिथ पाल्हन
संग गाल्हन कर यिहंज़ आशे
नसर बाबा रेश छीना रेशिथ पालन
पान छी गालान चख़, बुगज़ सीती”10
अर्थात ए नसर बाबा (नुन्दरेशी के शिष्य) यदि यह ऋषि वास्तव में ऋषियों सा जीवन बिताते तो यह अपनी साधना एवं तपस्या से पत्थर को भी चूर-चूर कर लेते | परंतु अफ़सोस ए बाबा यह लोग ऋषि भी नहीं बन पाते हैं, बल्कि वह अपना सारा जीवन आपसी द्वेष, बैर आदि द्वारा बर्बाद कर देते हैं |

 

शेख नुरुद्दीन (र.अ) वर्तमान समय के मुल्लाओं पर भी व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि-
“मल ढून्ठुम मोंशी खेवान
हाकस दपान यि छु कछ
बाकिर खेवान डाकर त्रावान
मशीदन दपान यति छु यछ |”11
अर्थात मैं ने मुल्ला को बैंस का गोश्त खाते देखा, क्योंकि साग और चावल पर उसका गुज़ारा नहीं हो | वह साग को गास-फूस समझता है | उसका काम केवल घी पर तली हुई रोटियों को खा कर डकार मारना है | इतना सब खाने के बावजूद भी वह मस्जिदों में नहीं जाता बल्कि वह कहता है कि वहाँ भूत-प्रेत रहते हैं | अर्थात मुल्ला धर्म के नाम पर तो जनता को लूटता है परंतु स्वयं धर्म का पालन नहीं करता है |


एक और स्थान पर वे कहते हैं कि-
“मल हा दपज़ीति मोलवी रूमी (र.अ)
नत मल वुछिथी पर्ज़ी इस्तिग्फार
सदरस तार दितुई तेमी
पानय पानस सपुन यार |”12
अर्थात यदि वास्तव में कोई मुल्ला है तो वह केवल मोलाना रूमी हैं | वरना मुल्लाओं की ओर देखते ही तोबा करना चाहिए और ईश्वर से यह प्राथना करनी चाहिए कि वह हमें उनके प्रकोप से बचाए रखे |

 

निष्कर्षतः  कहा जा सकता है कि वास्तव में तो नुन्दरेशी अपने ईश्वर के सच्चे सेवक थे, परंतु इसके बावजूद वे पहले एक समाज सुधारक थे | उन्होंने स्वयं को जाति, धर्म, आडम्बर जैसे पाखंडों से परे रखा और समस्त मानव दर्शन के पक्षधर बने रहे | उन्होंने ईश्वर से तादात्म्य स्थापित करने में इन सभी तथाकथित अमानवीय व्यवस्थाओं को बाधक माना है | वे सदैव ज्ञान व कर्म के महत्व को प्रतिपादित करते नज़र आते हैं |


संदर्भ ग्रंथ
1.    नेट, htpp://all poetry.com/couplet-7
2.    Unity in diversity, Prof. B.N.Parimoo,p.no. 12,1984.
3.    ज्ञान शब्द कोश, पृ.926.
4.    कलाम शेखुल आलम, कादरी सैफुद्दीन, पृ.13, सं.2006.
5.    ‘वही’, पृ.11
6.    ‘वही’, पृ.91
7.    नूरनामा, मुहम्मद अमीन कामिल, पृ.194.
8.    ‘वही’, पृ.147.
9.    ‘वही’, पृ.42
10.    कलाम शेखुल आलम, कादरी सैफुद्दीन, पृ.183, सं.2006.
11.    ‘वही’, पृ.300
12.    ‘वही’, पृ.303


 


- अम्तुल राबिया
 
रचनाकार परिचय
अम्तुल राबिया

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